रीटेल एफ़डीआई: तर्कों के तराजू में

 मंगलवार, 18 सितंबर, 2012 को 16:39 IST तक के समाचार
टेस्को

अमरीकी वॉलमार्ट और ब्रितानी टेस्को जैसी कम्पनियां लंबे समय से भारत में व्यापार करना चाहती हैं.

देश में रीटेल पर एफ़डीआई पर सिर फुट्टवल मचा हुआ और वॉलमार्ट जैसे दुकानदारों से फ़ायदे या नुकसान पर बहस शबाब पर है.

अगर रीटेल के क्षेत्र में भारत सरकार 51 फ़ीसदी स्वामित्व के साथ विदेशी निवेश को अनुमति मिल गई तो इस क्षेत्र में दिग्गज अमरीकी वॉलमार्ट और ब्रितानी टेस्को जैसी कम्पनियां भारत में आ पाएंगीं.

रीटेल में विदेशी निवेश के पक्षधर इस फ़ैलसे को साल 1991 में आर्थिक उदारीकरण लागू होने के बाद से सबसे अहम् फ़ैसला बता रहे हैं. उनका मानना है कि इस फैसले से देश में कोई भी बड़ा निर्णय लेने की रुकी हुई प्रक्रिया फिर से आरंभ होगी.

भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा, के हिसाब से भारत 475 अरब अमरीकी डॉलरों के बराबर के रिटेल के क्षेत्र में विदेशी निवेश चहुँमुखी विकास लाएगा. शर्मा जोर दे कर कहते हैं कि इसकी वजह से उपभोक्ताओं को लाभ होगा और किसानों का भाग्य बदलेगा.

किसानों को लाभ?

इस मामले में आकंडे बहस को आसान नहीं बनाते. कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत में एक तिहाई फल सब्जियां और खाने पीने की चीज़ें हर साल नष्ट हो जाती हैं क्यों कि उन्हें सुरक्षित ढंग भंडारों में नहीं रखा जा सकता.

अगर वॉल मार्ट और टेस्को जैसी बहु राष्ट्रिय कम्पनियां भारत आती हैं तो तो वो अगले तीन से पांच साल तक हर साल तीन से पांच अरब डॉलर तक भण्डारण क्षमता को विकसित करने और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को मज़बूत करने में लगाएंगी.

सुपर मार्केट

वॉल मार्ट का सूत्र वाक्य है " लोगों के पैसे की बचत जिससे वो बेहतर ज़िन्दगी जी पायें'.

इसकी वजह से किसानों का माल कम सड़ेगा और और वो ज़्यादा बेच पाएगें. विदेशी व्यापारी किसानों का शोषण करने वाले दलालों से किसानों को मुक्ति दिलाएंगे और उनसे सीधे माल खरीदेंगे.

इस प्रस्ताव का विरोध करने वालों का कहना है कि यह हसीन सपने कभी पूरे नहीं होंगे.

इस फैसले के विरोधी कहते हैं कि रीटेल के क्षेत्र में काम करने वाली बड़ी-बड़ी भारतीय कंपनियों ने ऐसा कुछ नहीं किया. आम तौर पर बड़े बड़े भारतीय रिटेलरों ने कोल्ड स्टोरेज में कोई खास निवेश नहीं किया और ज़्यादातर मौजूदा दलालों या थोक बाज़ार से खरीदते हैं.

'द हिन्दू' अखबार में छपे अपने एक लेख कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा कहते हैं "अमरीका में भी रीटेल के क्षेत्र की बड़ी कंपनियों ने किसानों की कोई मदद नहीं की . बस वो दलालों की एक नई पंक्ती ले आए जो की मुनाफे के नए दावेदार हो गए."

क्या उपभोक्ता का लाभ होगा ?

इस पक्ष पर फैसले के समर्थकों का कहना है कि किसानों को ज़्यादा दाम देने के बावजूद बड़ी रीटेल कंपनियां उपभोक्ताओं को कम दामों में सामान बेच पाती हैं क्योंकि वो दलालों को चलता कर देती हैं.

वॉलमार्ट जिसका सूत्र वाक्य "लोगों के पैसे की बचत जिससे वो बेहतर ज़िन्दगी जी पाएं' है. वॉलमार्ट साल भर में अपनी 10,000 दुकानों के ज़रिये 450 अरब डॉलर का कारोबार करती है. वॉलमार्ट इन सभी दुकानों पर तुलनात्मक रूप से बेहद सस्ता सामान बेचती है.

लेकिन भारत में सर्वाधिक लाभ मध्य और उच्च मध्य वर्ग के उपभोक्ताओं को ही होगा.

इस फैसले के विरोधियों का दावा है कि इसकी वजह से छोटे दुकानदार तबाह हो जायेगें.

रीटेल के क्षेत्र में सलाह देने वाली कंपनी टेक्नोपार्क के अरविंद सिंह कहते हैं भारत के अभी रीटेल में संगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी महज़ 4.2 फीसदी है.

उद्योग व्यापार के संगठन फिक्की के महासचिव राजीव कुमार का मानना है कि अगर अगले बीस सालों में ये हिस्सेदारी चार गुणा बढ़ कर 17 फ़ीसदी भी हो जाती है तब भी साल 2032 में 900 अरब डॉलर के बाज़ार में इसका हिस्सा केवल 150 अरब डॉलर का होगा.

तार्किक रूप से विदेशी रीटेल कंपनियां आरंभ में केवल बड़े शहरों में अपनी दुकानें खोलेंगी क्योंकि इन शहरों के उपभोक्ताओं के पास ज़्यादा पैसा है.

अभी प्रस्तावित सरकारी नीति में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ केवल उन्ही शहरों में दुकान खोल सकेगीं जहाँ आबादी दस लाख से ज़्यादा है.

रीटेल की राजनीति

पिछले दस महीनों में ये दूसरी बार है जब कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार यह फ़ैसला लागू करने की कोशिश कर रही है.

नवंबर 2011 में यह फ़ैसला इसलिए नहीं लागू हो सका था क्योंकि सरकार के कई साथी और विपक्षी दल इसके पक्ष में नहीं थे.

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार जैसे कई राज्य कह चुके हैं कि वो अपने यहाँ बहुराष्ट्रीय रीटेल कंपनियों को नहीं आने देंगे.

दिल्ली, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, असम, मणिपुर और उत्तराखंड जैसे नौ छोटे बड़े राज्य इस फैसले को अपने यहाँ लागू करने के लिए तैयार हैं.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.