चीन में धर्म

 सोमवार, 12 सितंबर, 2011 को 17:24 IST तक के समाचार
चीन में चर्च

चीन में चर्चों में भीड़ बढ़ती जा रही है.

चीन में ईसाइयों की बढ़ती संख्या के साथ ही वहां की चर्चों में भी भीड़ बढ़ती जा रही है. क्या इसकी वजह तेजी से फैलता पूंजीवाद है?

ये कहना असंभव है कि चीन में ईसाइयों की संख्या कितनी है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी तादाद में बेतहाशा वृद्धि हो रही है.

सरकार कहती है कि चीन में एक करोड़ अस्सी लाख प्रोटेस्टेंट और 60 लाख कैथोलिक्स यानि कुल ढाई करोड़ ईसाई हैं. स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार ये आंकड़ा इससे कहीं अधिक है. एक अनुमान के अनुसार चीन में छह करोड़ ईसाई हैं.

रविवार के दिन चीन की चर्चों में यूरोप की चर्चों की तुलना में अधिक लोग मौजूद रहते हैं. ईसाई धर्म के नए अनुयायी ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और शहरों की मध्यम वर्ग से आ रहे हैं.

'नज़रों से दूर'

दार्शनिक की राय

"धन की उपासना कुछ लोगों के जीवन की एकमात्र वजह बन गई है."

प्रोफ़ेसर हे गुआंघु, रेनमिन विश्वविद्यालय में दर्शन के अध्यापक

पश्चिम में चीन के ईसाई मत के ढांचे की जटिलता की समझ बहुत कम है. जैसे कि चीन में सरकार कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट को अलग-अलग धर्म मानती है.

बीसवीं सदी में चीन में ईसाई धर्म को पश्चिमी साम्राज्यवाद से जोड़कर देखा जाता था. वर्ष 1948 में कम्यूनिस्टों की जीत के बाद ईसाई मिशनरियों को देश निकाला दे दिया गया था.

लेकिन कम्यूनिस्ट पार्टी के प्रति वफ़ादारी के बदले ईसाइयों को सरकारी चर्चों में अपने धर्म का पालन करने की इजाज़त थी.

दूसरी ओर माओ धर्म को ‘ज़हर’ बताते थे. और 1960 और 70 के दशक में धर्म का अस्तित्व मिटाने की कोशिश की गई थी. उस दौरान लुके-छिपे ही सही ईसाई अनुयायियों की संख्या बढ़ी. 1980 के दशक से धर्म को मानने की अनुमति मिल गई और आधिकारिक चर्चों ने धीरे-धीरे अपने लिए अधिक स्थान बनाना शुरू कर दिया.

चीनी चर्चें ‘स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन फ़ॉर रिलिजियस अफ़ेयर्स’ के अधीन आती हैं. उनपर अपने अराधना स्थल के बाहर किसी भी धार्मिक गतिविधि में हिस्सा लेने की मनाही है.

और उन्हें ‘देश से प्यार – अपने धर्म से प्यार ’ के नारे पर भी अपनी सहमति देनी होती है. कम्यूनिस्ट पार्टी स्कूलों में नास्तिकवाद को बढ़ाता देती है लेकिन पार्टी ‘जब तक धर्म स्वयं ही ग़ायब नहीं हो जाता जब तक धर्म की रक्षा और सम्मान’ करने की बात भी कहती है.

घर में चर्चें

अच्छा लगता है

"इस चर्च में 50 युवा पेशेवर आते हैं. सब अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास मिलने-जुलने का भी वक्त नहीं. लेकिन चर्च में आकर उन्हें अच्छा लगता है. उन्हें लगता है कि लोग उनसे प्यार करते हैं और इसी वजह से वो यहां आते हैं."

एक युवा चीनी पेशेवर

प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक दोनों ही आधिकारिक और ग़ैर-आधिकारिक चर्चों में विभाजित हैं. आधिकारिक कैथोलिक पेट्रियोटिक एसोसिएशन स्वयं अपने बिशप नियुक्त करती है और उसे वेटिकन के साथ कोई संबंध रखने की अनुमति नहीं है. हांलाकि कैथोलिक लोगों को पोप की अध्यात्मिक अगुवाई को मानने की इजाज़त है.

लेकिन आधिकारिक कैथोलिक चर्च की तुलना में अंडरग्राउंड चर्च बहुत बड़ी है और उसे वेटिकन का समर्थन हासिल है. धीरे-धीरे वेटिकन और सरकार एक-दूसरे को स्थान देने की दिशा में बढ़ रहे हैं.

अधिकतर बिशपों को दोनों ओर से मान्यता दी गई है लेकिन दोनों ही पक्ष एक-दूसरे का अधिपत्य स्वीकार नहीं करते. इसके बावजूद पिछले कुछ महीनों से चीनी सरकार का रवैया सख़्त हो गया है. सरकार विशपों की नियुक्ति वेटिकन के विरोध के बावजूद कर रही है. और जवाब में वेटिकन ने इनमें से एक बिशप को चर्च से बहिष्कृत कर दिया है.

लेकिन चीन में सरकारी चर्च को महज़ दिखावा कहना ग़लत होगा.

'धार्मिक विश्वास'

एक चर्च में प्रार्थना करती एक बच्ची

मैंने बीजिंग के पश्चिम के पहाड़ी इलाक़े में स्थित ‘हो सांजु’ गांव का दौरा किया जहां 14वीं सदी से एक कैथोलिक चर्च मौजूद है.

इन लोगों की धार्मिक विश्वास जापान के आक्रमण और कम्यनिस्टों की सांस्कृतिक क्रांति के बावजूद अडिग है. इस गांव में स्थित क्लीनिक नन चलाती हैं जिनमें से एक इनर मंगोलिया से है जोकि कैथोलिक मत का गढ़ है.

ऐसे ही गांवों से कैथोलिक चर्च पादरी बनाने के लिए युवाओं को तैयार करती है. लेकिन आधिकारिक प्रोटेस्टेंट चर्च की कैथोलिक चर्चों से कहीं अधिक रफ़्तार से आगे बढ़ रही है. ईस्टर के दिन बीजिंग में मैंने पांच सर्विस देखे और हर बार चर्च के भीतर डेढ़ हज़ार श्रद्धालु मौजूद थे. सड़कों पर ख़ूब भीड़ थी. लेकिन ये संख्या ग़ैर-आधिकारिक ‘घर में चर्च ’ कहीं कम है जोकि सारे चीन में तेज़ी से फैल रही हैं. ऐसी चर्चों के प्रति सरकारी कार्रवाई का डर हमेशा मौजूद रहता है.

सरकार घर में मौजूद चर्चों के सरकारी अधिपत्य से इंकार को बिल्कुल स्वीकार नहीं करती. सरकार को डर है कि ऐसी चर्चों पर अमरीकी धर्मप्रचारकों का प्रभाव पड़ सकता है. लेकिन आमतौर पर ये चर्चें स्थानीय ही हैं जिन्हें युवा और ऊर्जावान लोग चला रहे हैं.

एक पढ़े-लिखे युवा चीनी ईसाई ने अपनी चर्च के बारे में मुझे बताया, “इस चर्च में 50 युवा पेशेवर आते हैं. सब अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास मिलने-जुलने का भी वक्त नहीं. लेकिन चर्च में आकर उन्हें अच्छा लगता है. उन्हें लगता है कि लोग उनसे प्यार करते हैं और इसी वजह से वो यहां आते हैं. ”

चीनी सरकार के एक नज़दीकी शिक्षाविद ने मुझे बताया कि सरकार घरों में मौजूद चर्चों को सहन कर सकती है क्योंकि इन्हें सरकार फ़ालुन गोंग की तरह ख़तरा नहीं मानती. लेकिन चर्च अगर सड़कों पर उतर आती है तो सरकार कार्रवाई करेगी.

मैंने चीन में लोगों को अध्यात्मिक संकट के बारे में बार-बार बात करते सुना है. इस जुमले का प्रयोग प्रधानमंत्री वे जियाबाओ भी करते हैं. युवाओं में अमीर बनने की होड़ के चलते पीढ़ियों के बीच रिश्ते टूटते जा रहे हैं.

और जैसे कि वर्तमान चीन के विख्यात दार्शनिक बीजिंग की रेनमिन विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर हे गुआंघु कहते हैं, “ धन की उपासना कुछ लोगों के जीवन की एकमात्र वजह बन गई है. ”

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