स्वर्णिम काल से अब तक

चीन ने पिछले एक दशक में अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर लिया है इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption चीन ने पिछले एक दशक में अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर लिया है

ब्रिक की अवधारणा को सामने आए अब एक दशक गुज़र चुका है. भले ही वैसे ये काफ़ी लंबा समय न लगे मगर इस दौरान विश्व अर्थव्यवस्था और राजनीति ने काफ़ी उतार-चढ़ाव देख लिए हैं.

पुरानी विकसित अर्थव्यवस्थाएँ संकट से गुज़र रही हैं और उनकी चमक फीकी पड़ रही है. वहीं ब्रिक देशों का विकास तेज़ी से हुआ और दुनिया की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान बढ़ता जा रहा है.

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से ही कई जगह संघर्ष का उबाल आता रहा और आने वाले वर्षों में वो सामने भी आया. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का संकट गंभीर होता ही जा रहा है.

हालाँकि इस दौरान कोई विश्व युद्ध तो नहीं छिड़ा, क्षेत्रीय सैनिक संघर्ष कभी भी थमा नहीं. अमरीका से शुरू हुआ आर्थिक संकट एक वैश्विक संकट में तब्दील हो गया.

अभी लोग उस आर्थिक संकट के समाप्त होने की उम्मीद लगाए बैठे थे कि तब तक यूरोपीय ऋण संकट ने पैर पसार लिए.

एक तरफ़ दुनिया भर के देश राजनीतिक और आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे थे तो ब्राज़ील, भारत, रूस और चीन जैसे विकासशील देश अपने विशेष संसाधनों, जनसंख्या और बाज़ार के ज़रिए अवसरों का फ़ायदा उठा रहे थे.

ब्रिक के चारों देश- ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन एकजुट होकर काम कर रहे थे और बाद में दक्षिण अफ़्रीका भी उसमें जुड़ गया जिससे ब्रिक्स का प्रभाव और बढ़ा.

चीन का विकास

चीन ने पिछले 30 वर्षों में जो उदारीकरण की नीति लागू की है उसकी वजह से उसका कायाकल्प ही हो गया. इक्कीसवीं सदी में चीन उसके पिछले 30 वर्षों से पूरी तरह अलग है.

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Image caption चीनी उत्पादों ने दुनिया भर में धूम मचाई है

चीन ने ख़ासतौर पर पिछले 10 वर्षों में बहुत कुछ ऐसा हासिल किया है जो करने में कई देशों को दशकों का समय लग गया.

चीन का सकल घरेलू उत्पाद 10 खरब से भी कम से 40 खरब युआन तक जा पहुँचा है. दुनिया में उसकी अर्थव्यवस्था छठे से उठकर दूसरे नंबर पर आ चुकी है.

उसका विदेशी व्यापार 500 अरब से बढ़कर 3000 अरब तक जा पहुँचा है.

इससे भी ऊपर चीन एक समय ऐसा देश था जो पूँजी, प्रौद्योगिकी और सारा ज्ञान बाहर से आयात करता था और वहाँ से अब वह ऐसा देश बन गया है जो पूँजी के साथ ही उत्पाद निर्यात करता है जिसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका प्रभाव और मज़बूत हो गया है.

चुनौतियाँ

मगर चीन को इस विकास की राह में कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा. चीन की मुद्रा युआन की मूल्य वृद्धि काफ़ी तेज़ी से हुई है जिसकी वजह से चीन के निर्यात को नुक़सान पहुँचा है.

इसके अलावा तेल आयात पर निर्भरता भी काफ़ी है और जनसंख्या काफ़ी बड़ी है.

इसके अलावा सही काम के लिए सही व्यक्ति के चुनाव की कोई सही प्रक्रिया भी नहीं है और बेरोज़गारी का दबाव काफ़ी ज़्यादा है.

घरों की चढ़ी क़ीमतों पर महँगाई की ऊँची दर का असर है और शेयर बाज़ार अस्थिर बना है. इन सबके अलावा पर्यावरण से जुड़ी चुनौती भी गंभीर है.

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Image caption चीनी मुद्रा पर दबाव बना हुआ है

हमें वैसे लगता है कि चीन इन सभी मुश्किलों का हल ढूँढ़ लेगा. चीन के पास काफ़ी ख़ास फ़ायदे हैं जैसे बेहतर स्तर का मानव संसाधन, मिट्टी की गुणवत्ता और प्राकृतिक संसाधनों का प्राचुर्य तथा एक बड़ा आंतरिक उपभोक्ता बाज़ार.

इन सबसे बड़ी बात ये है कि चीन ने आपसी फ़ायदे की विदेशी नीति अपनाई है और अन्य देशों के साथ अच्छा आर्थिक और राजनीतिक सहयोग किया है.

इसमें विकसित देशों के साथ भी अच्छे संबंध हैं जिसमें ख़ासतौर पर चीन के पड़ोसी देश शामिल हैं.

विश्व में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है और ब्रिक्स देशों में उसकी भूमिका और बड़ी हो रही है.

ब्रिक्स के अन्य देशों का विकास भी तेज़ी से हो रहा है. भारत की वार्षिक विकास दर साढ़े छह प्रतिशत से ज़्यादा है.

रूस भी अब आगे बढ़ रहा है, ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था दक्षिण अमरीका में सबसे आगे है और दक्षिण अफ़्रीका के आ जाने के बाद से ब्रिक्स का दायरा और व्यापक हो गया है.

दुनिया की 42 प्रतिशत जनसंख्या, दुनिया की 30 प्रतिशत ज़मीन इन्हीं ब्रिक्स देशों के पास हैं. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि 2015 तक ब्रिक्स देशों का सकल घरेलू उत्पाद पूरी दुनिया का 22 प्रतिशत हो जाएगा.

जिस तरह से ब्रिक्स की आर्थिक शक्ति बढ़ रही है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी भूमिका भी अब और प्रभावी होना तय लगता है.

(लेखक समाज विज्ञान की चीनी अकादमी में प्रोफ़ेसर हैं और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ाइनेंस ऐंड इकॉनॉमिक्स में चाइना इंस्टीट्यूट फ़ॉर कोल इकॉनॉमिक रिसर्च के निदेशक हैं.)

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