जीपीएस को टक्कर देगी चीनी बेईदू प्रणाली

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Image caption बेईदू प्रणाली का नेटवर्क फैलाने की मंशा से चीन 2020 तक 25 और उपग्रह अंतरिक्ष में भेजेगा.

चीन की उपग्रह नैविगेशन प्रणाली बेईदू चालू हो गई है.

प्रोजेक्ट के प्रवक्ता रान चेंग ने बताया कि बेईदू, चीन और उसके आस-पास के हिस्सों को स्थान, समय और नैविगेशन के बारे में जानकारी देती है.

अमरीकी सरकार के ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस का विकल्प ढूंढ़ रहा चीन इस प्रणाली पर वर्ष 2000 से काम कर रहा है.

इस प्रणाली के इस्तेमाल से चीन की सेना की विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है.

नेटवर्क बढ़ाने की योजना

इस महीने की शुरुआत में बेईदू के दसवें उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में भेजा गया. चीन की योजना है कि वो 2020 तक पूरी दुनिया में ये प्रणाली स्थापित करने के लिए कुल 35 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजेगा. इनमें से इस प्रणाली को एशिया के ज़्यादातर हिस्सों में स्थापित करने के लिए वर्ष 2012 तक छह उपग्रह भेजे जाएंगे.

दावा है कि बेईदू का इस्तेमाल कर नागरिक दस मीटर के दायरे तक की सटीक पोज़िशनिंग या स्थान की जानकारी पा सकते हैं. इसके अलावा ये गति को शून्य दशमलव दो सेकंड तक माप सकती है.

चीन की सेना को तो इससे भी ज़्यादा सटीक जानकारी मिलेगी.

अमरीका के मैसाच्यूसेट इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ता जेफ़री फ़ोर्डेन के 2004 के एक अध्ययन के मुताबिक़ अगर ताइवान के लिए युद्ध होता है तो बेईदू का इस्तेमाल ताइवान के ख़िलाफ़ क्रूज़ मिसाइल तैनात करने के लिए किया जा सकता है. ऐसे में अमरीका के जीपीएस बंद करने की सूरत में भी चीन को ख़ुद की प्रणाली होने का फ़ायदा होगा.

एक वेबसाइट, डिफ़ेंस पॉलिसी डॉट ओआरजी की 2011 की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर चीन पर हमला होता है, तो इस प्रणाली का इस्तेमाल ड्रोन विमानों को विदेशी नौसेना को तबाह करने के लिए किया जा सकता है.

लेकिन बेईदू बनाने वाले वैज्ञानिक आम लोगों को इसके इस्तेमाल से होने वाले रोज़मर्रा के फ़ायदों पर भी ज़ोर दे रहे हैं.

रान चेंग का ये भी कहना था कि ये प्रणाली दुनिया के दूसरी नैविगेशन प्रणालियों के अनुरूप है और उनकी जगह काम कर सकता है.

अन्य नैविगेशन प्रणालियां

जीपीएस के अलावा भी ऐसी जानकारी के लिए कुछ और प्रणालियों या नेटवर्क का इस्तेमाल होता है. मसलन, रूस ग्लोनास नेटवर्क का इस्तेमाल करता है. वहीं यूरोपीय संघ भी गैलिलियो नाम की प्रणाली विकसित कर रहा है. उसका पहला उपग्रह अक्तूबर 2011 में पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हुआ.

इस बीच सैन्य साज़ो-सामान बनाने वाली कंपनी लॉकहीड मार्टिन अमरीकी प्रणाली जीपीएस तीन को अपग्रेड करने पर काम कर रही है.

कंपनी ने अगली पीढ़ी के उपग्रह के प्रोटोटाइप को बनाना शुरु कर दिया है.

अमरीकी वायुसेना का कहना है कि नई प्रणाली पहले से ज़्यादा बेहतर होगी जिससे दुश्मनों को उसे जाम करना और भी ज़्यादा मश्किल हो जाएगा. इतना ही नहीं, उसके सिगनल शहरों और घने जंगलों में भी ज़्यादा अंदर तक भेद कर सकेंगे.

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