चीन में माओ की क्रांति का क्या हुआ ?

वर्तमान चीन में कोई भी आदमी उतना दुखी नहीं है जितने गांव के लोग और किसान हैं. जब वे विस्थापित होकर शहर में फैक्ट्री में काम करने के लिए आते हैं तो उन्हें गंदगी में रहना पड़ता है.

इसलिए प्रश्न यह है कि चीन में माओ त्से तुंग की उस कम्युनिस्ट क्रांति का क्या हुआ जिसमें ग्रामीणों की जिंदगी में तब्दीली लाने की बात थी?

दक्षिण-पश्चिम चीन का झियांझी क्षेत्र पठारों और नदियों से घिरा है जो देखने में तो बहुत ही खुबसूरत लगता है लेकिन वह चीन का सबसे गरीब इलाका रहा है.

इसीलिए माओ त्से तुंग सत्ता संभालने से दो दशक पहले उस क्षेत्र में महीना भर आकर रुके थे. लगभघ 1500 की आबादी वाले उस गांव में आकर वो इसलिए रुके थे जिससे कि वो देख सके कि वहां वर्ग व्यवस्था कैसे काम करती है ?

घर बना स्मारक

जिस घर में आकर माओ रुके थे, उसे अब म्युजियम में तब्दील कर दिया गया है. दर्शक जब वहां जाते हैं तो लोहे की छड़ से घिरे उस बिस्तर को निहारते हैं जहां माओ सोया करते थे. साथ ही वो उस टेबल और कुर्सी को भी निहारते हैं जिस पर बैठकर वो लोगों से मिलकर बातचीत करते थे.

वहां बैठकर वो किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, शाही विद्वानों और यहां तक कि असंतुष्ट युवाओं से भी मिलते थे और उनसे हुई बातचीत को समझकर लिख कर रख लेते थे.

जो वहां माओ त्से तुंग की मदद कर रहे थे, उन 24 वर्षीय युवक का नाम गु बो था और उनके दादा जमींदार थे. उनके परिवार के लोग विद्वान थे जो राजशाही की सेवा करते थे. लेकिन गु बो की इच्छा थी कि देश में परिवर्तन हो.

गु बो के पड़पोता गु आनजिंयान का कहना है, “पुरानी व्यवस्था के बारे में मेरी सोच ठीक नहीं थी, इसलिए जब मैं कम्युनिस्ट क्रांति में शामिल हुआ तो मैंने अपने दादाजी वाला घर जला दिया था.”

'लांग मार्च'

वे बताते हैं कि उनके साथ-साथ उनके भाई भी चीन में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए प्रतिबद्घ थे. उनके चार भाई माओ के साथ ‘लांग मार्च’ में शामिल हुए थे. उनमें से तीन मारे गए और गु बो 1935 में एक हमले में मारे गए.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी जनता से वायदा करके सत्ता में आई थी कि जब उनका राज होगा तो वे देश में मौजूद वर्ग संरचना को खत्म कर देंगें. लेकिन जब सत्ता परिवर्तन हुआ तो वर्ग संरचना दूसरे रुप में सामने आई.

पहले के विशेषाधिकार प्राप्त लोग जिसमें-विद्वान, जमींदार और व्यापारी वर्ग शामिल थे- के अधिकार छीन लिए गए और अनेक ऐसे लोगों की तो हत्या तक कर दी गई. हालांकि कुछ दिनों के लिए ही सही, किसानों को बेहतर अवसर भी उपलब्ध कराया गया.

मजदूरों की दुर्दशा

उसके बाद साठ साल से अधिक का वक्त बीत गया है लेकिन अब एक बार फिर से किसान और मजदूर समाज के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज चीन में एक विशालकाय मध्यम वर्ग पैदा हो गया है. इतना ही नहीं, सबसे बड़ी बात यह है कि दुनिया में चीन ऐसा पहला देश है जहां लोगों की आमदनी में सबसे अधिक अंतर हो गया है.

गु के परिवार के अधिकतर सदस्य विद्वान के रूप में राजशाही की सेवा में थे. लेकिन आज उनके परिवार में एक भी ऐसा सदस्य नहीं है जो 15 साल की उम्र के बाद शिक्षा ग्रहण कर पाया हो.

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Image caption किसानों और मजदूरों की जिंदगी बेहतर करने का वायदा भी शामिल था क्रांति में

माओ ने पूंजीवाद के खात्मे की कोशिश की थी, लेकिन गु आनजिंआन के छोटे भाई पूंजीपति हैं. वो विदेश में स्टील का व्यापार करता हैं. बीबीसी ने उनसे पूछा कि अगर बु गो जिंदा होते तो उनके पूंजीपति बनने पर वो क्या सोचते?

उनका जवाब बहुत ही रक्षात्मक था. उन्होंने कहा, “मैं कैसे बता सकता हूं कि वो क्या सोचते? वैसे भी क्या फर्क पड़ता है क्योकि जहां मैं काम करता हूं वह तो सरकार की ही कंपनी है?”

पूंजीपति बने कम्युनिस्ट

लेकिन चीन में, अगर आप पूजीपति हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप कम्युनिस्ट नहीं हैं या राज्य सत्ता का हिस्सा नहीं है. देश की संपत्ति पर नजर रखने वाली ‘द ह्युरन रिपोर्ट’ के अनुसार चीन में नब्बे फीसदी से अधिक लोग कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं.

चीन का राष्ट्रगान भले ही कहे ‘गुलामी नहीं करने वाले उपर उठते हैं’, लेकिन आज के हालात ये है कि जो लोग उपर उठना चाहते हैं और अमीर होना चाहते हैं, वे सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होते हैं.

मजेदार बात यह भी है कि पार्टी भी चाहती है कि अमीर लोग पार्टी में शामिल हों. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ‘नेशनल पीपुल्स कांग्रेस’ के 75 लोगों की संपत्ति एक अरब बीस करोड़ अमरीकी डॉलर है.

लेकिन गु बो के परिवार के सदस्य इतने अमीर नहीं हैं. हो सकता है कि उनके बेटों को कुर्बानी देनी पड़ी हो, लेकिन उन्हें इस बात का कतई अभिमान नहीं है कि उनके परिवार के लोग ‘लांग मार्च’ में शामिल हुए थे.

'अभिमान नहीं'

गु आनजिंआन का 36 वर्षीय बेटा इस बारे में पूछे जाने पर चिढ़ जाता है. वह कहता हैं, “किस अभिमान की बात करते हैं, इसमें अभिमान की क्या बात है. अगर यह अभिमान की बात होती तो हम यहां नहीं रह रहे होते.”

इसी तरह उनके परिवार के दूसरे सदस्य 34 वर्षीय गु यूसेंग उस जगह से विस्थापित होकर वहां से 375 किलोमीटर दूर डॉनगॉन शहर की एक स्वेटर फैक्ट्री में काम किया है.

वो बताते हैं, “सही पूछिए तो मुझे शहर पसंद नहीं है क्योंकि यहां के लोग विस्थापित लोगों को काफी हीन भावना से देखते हैं.” उनका कहना है, “यहां मजदूरों को इतनी कम मजदूरी मिलती है और उन्हें इतना ज्यादा काम करना पड़ता है कि हड़ताल और विरोध सामान्य बात हैं. जबकि चीन में अलग से ट्रेड युनियन बनाना गैर कानूनी है.”

विस्थापितों का बुरा हाल

वे आगे बताते हैं, “अगर आप विस्थापित मजदूर हैं तो वहां आप बहुत उपर नहीं जा सकते, क्योंकि अच्छी नौकरी स्थानीय लोगों को ही मिलती है.”

इसलिए कुछ पैसा कमाने के बाद गु यूसेंग वापस अपने घर लौट आए और वहीं पर उन्होंने स्वेटर की फैक्ट्री खोल ली है. वो कहते हैं कि जब बहुत काम होता है तो वे अपने गांव के 120 लोगों को काम पर रख लेते हैं.

उन्हें इस बात की खुशी है कि वे अपने गांव के लोगों की जरूरत पड़ने पर मदद कर देते हैं. लेकिन वे बताते हैं, "मैं उनके साथ बुरा बर्ताव नहीं करता हूं क्योंकि मैंने खुद उस अपमान को झेला है."

लेकिन जिस तरह लोगों की जरुरतें और अपेक्षाएं बढ़ रही हैं, उन्हें इस बात का शक है कि क्या अगली पीढ़ी बिना पढ़े लिखे अपनी अपेक्षा को पूरा कर पाएगी?

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