मुल्ला जी से बच के!

देवबंद
Image caption हाल में देवबंद में जमीयते-उलेमा-हिंद का तीसवां अधिवेशन हुआ

'हम मुसलमान हैं, हमें आधुनिक शिक्षा नहीं चाहिए. अगर ग़लती से कभी शिक्षा के बारे में सोचा तो किसी ऐसे स्कूल में बच्चों को नहीं भेज सकते जहाँ वंदे मातरम् गाया जाता है. कारण यह कि वंदे मातरम् पढ़ा नहीं कि इस्लाम ख़तरे में पड़ा.

फिर, यदि ऐसे आधुनिक इंगलिश मीडियम स्कूल में बच्चो को भेजा जहाँ लड़के-लड़कियाँ साथ पढ़ते हों तो निसंदेह बच्चे बिगड़ जाएंगे और अगर हमारी मुस्लिम बच्चियाँ दसवीं के बाद किसी ऐसे स्कूल में चली गईं जहाँ परदे का माक़ूल इंतज़ाम नहीं तो तौबा-तौबा बड़ा कुफ्र हो जाएगा'.

ये है देवबंद में होने वाले जमीयते-उलेमा-ए-हिंद (महमूद गुट) के अधिवेशन का मुसलमानो को संदेश. अब सवाल यह है कि सरकारी स्कूल मे वंदे मातरम् का डर और अंग्रेज़ी मीडियम स्कूलों में ईमान बिगड़ने का भय तो फिर मुसलमान बच्चे पढ़ें तो पढ़ें कहाँ...

बच्चे घर बैठें इससे बेहतर तो यही होगा कि हम उनको मदरसे भेज दें. लेकिन जमीयत के आदेशानुसार बच्चा किसी ऐसे मदरसे में नहीं जाना चाहिए जो किसी सरकारी बोर्ड से जुड़ा हो, क्योंकि ऐसे मदरसों में धर्म का ज्ञान कम और आधुनिक ज्ञान ज़्यादा दिया जाता है.

तब ही तो जमीयत ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की मदरसा बोर्ड स्थापित करने की पहल रद्द कर दी.

राय

अब प्रश्न ये है कि इस आधुनिक युग में जो बच्चे मदरसे से पढ़ कर निकलेंगे तो उनका भविष्य क्या होगा?

सच पूछिए तो इस संबंध में मेरी अपनी कोई राय नही है. हाँ, मैं मदरसों की उपयोगिता के बारे में मौलाना अबुल आला मौदूदी के विचार प्रस्तुत कर देता हूँ. मौलाना मौदूदी पाकिस्तान जमाते- इस्लामी के संस्थापक और एक महान इस्लामी विचारक भी थे.

अब देखिए मौलाना मौदूदी मुस्लिम मदरसों के बारे में अपने एक लेख में क्या लिखते हैं: "जो लोग इस निज़ामे-तालीम (मदरसों) से पढ़ कर निकल रहे हैं उनका कोई मसरफ़ (उपयोगिता) नहीं है, वह केवल कोई मस्जिद पकड़ कर बैठें, या कोई मदरसा चलाएं या फिर वाज़गोई (धार्मिक प्रचार प्रसार) का पेशा इख़्तियार और तरह-तरह के मज़हबी झगडे़ छेड़ते रहें ताकि क़ौम को उनकी ज़रूरत महसूस होती रहे.’’

अब आप समझे मुल्ला क्या चाहते है? ऐसे स्कूल मत जाओ जहाँ वंदे मातरम् पढ़ना पड़े, लड़कियों को दस साल बाद पर्दे में बैठा दो और बच्चों को किसी ऐसे मदरसे में भी मत भेजो जिसका संबंध सरकारी बोर्ड से हो क्योंकि ऐसे मदरसे सें आधुनिक शिक्षा लेकर बच्चा आधुनिक युग का एक व्यक्ति बन सकता है.

मुल्ला जगत में सारी समस्या आधुनिकता की है. मुसलमान किसी प्रकार से आधुनिक युग से जुड़ने ना पाए. समस्या यह है कि उलेमाए-दीन (धर्म गुरू) अपने को एक ऐसी इस्लामी सभ्यता का संरक्षक समझते हैं जिसका पतन 1857 में मुग़ल सम्राज्य के बिखरने और अंग्रेज़ों के उदय के साथ हो गया था.

वर्ष 1857 तक इस उप-महाद्वीप में एक बादशाही राजनैतिक परंपरा थी. शिक्षा-दीक्षा के लिए मदरसे थे. न्याय पालिका में इंसाफ़ के लिए क़ाज़ी थे. सारांश यह कि 1857 तक मुसलमान का अपना एक जगत था जो अंग्रेज़ों के आने से छिन्न-भिन्न हो गया.

Image caption इसे मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था

मतलब यह है कि 1857 के बाद मुसलमानों ने सदियों से जो एक सभ्यता बनाई थी वह सभ्यता और उसके मूल्य सब बेमानी हो गए, हारे हुए मुसलमानों ने अपनी पुरानी सभ्यता को बचाने के लिए 1860 के दशक में देवबंद में एक मदरसा खोला जो पुराने मूल्यों को बचाने की एक तहरीक थी. उसी मानसिकता ने आगे जमीयते-उलेमा-ए-हिंद का रूप धारण कर लिया.

आधुनिकता का विरोध

इस प्रकार देवबंद और जमीयत अंग्रेज़ और उसकी आधुनिक सभ्यता के विरूद्ध खड़े हो गए. अंग्रेज़ तो चले गए लेकिन आधुनिक सभ्यता के ख़िलाफ़ जेहाद आज भी जारी है. पिछले डेढ़ सौ वर्षों में दुनिया बदल गई पर देवबंद की मानसिकता नहीं बदली.

एक समय था जब मुसलमान के लिए अंग्रेज़ी पढ़ना हराम था. अब यह बात खुल कर नहीं कही जा सकती है. उसी बात को अब देवबंद और जमीयत यूँ कहती हैं कि वंदे मातरम् वाले स्कूल में बच्चें को मत भेजो, लड़कियों को परदे वाले स्कूल में रखो, मदरसों मे आधुनिक शिक्षा का समावेश कम से कम करो, सरकारी मदरसा बोर्ड को मत मानो. क्या यह सब आधुनिकता का विरोध नहीं है?

अब मुस्लिम समाज को यह तय करना होगा कि मुल्ला जिस आधुनिकता का विरोध कर रहे हैं, वह उसके हक़ में हैं या नहीं! अतीत और भविष्य की इस खींच-तान में इसको मुल्ला और आधुनिकता में से एक को चुनना होगा. अगर उसने अब भी यह फ़ैसला नहीं किया तो मुल्ला वंदे मातरम् जैसे झगड़े खड़ा करता रहेगा. आख़िर में भारतीय मुसलमानो की छवि भी तालेबानी मुसलमान की छवि बनकर रह जाएगी. इसलिए, ज़रा मुल्ला जी से बच के...!

( इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. बीबीसी उन के लिए ज़िम्मेदार नहीं है )

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