'मिर्ज़या' प्रेम कहानी में आर्टिस्टिक टच

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'मिर्ज़या' न सिर्फ़ दो स्टार किड्स हर्षवर्धन कपूर और सैय्यामी खेर के लॉंच, और 'भाग मिल्खा भाग' के बाद राकेश ओमप्रकाश की अगली फ़िल्म होने की वजह से चर्चा में रही है बल्कि इसलिए भी क्योंकि इसकी पटकथा गुलज़ार ने लिखी है.

राकेश ने बीबीसी को पहले दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था, "ये पंजाबी प्रेम कहानी 'मिर्ज़ा साहिबान' पर आधारित है और इसमें मैंने और ग़ुलज़ार साहब ने ये जानने की कोशिश की है कि आख़िर साहिबा ने, मिर्ज़ा के तीर क्यों तोड़ दिए थे."

आप में से जो लोग इस पंजाबी लोककथा से परिचित नहीं है उन्हें बता दें कि मिर्ज़ा और साहिबा दो प्रेमी थे और दोनों साहिबा के परिवार वालों से बचकर इधर-उधर भाग रहे थे.

एक रात जब मिर्ज़ा सो रहा था तो साहिबा इस डर से मिर्ज़ा के सारे तीर तोड़ देती है कि कहीं मिर्ज़ा के हाथों उसके भाई न मारे जांए, पर वह यह भूल जाती है कि मिर्ज़ा को कौन बचाएगा?

अब आते हैं फ़िल्म पर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने इस फ़िल्म में बड़ी कमाल की सिनेमैटोग्राफ़ी के साथ 'मिर्ज़ा-साहिबान' की इस कहानी को दिखाने की कोशिश की है.

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लेकिन इसे एक सरल फ़िल्म बनाने की जगह वो फ़िल्म में कहानी को तीन अलग ट्रैक पर चलाते हैं और यहीं से फ़िल्म आम दर्शक के 'मीटर' से बाहर जाने लगती है.

राजस्थान के जोधपुर में दो स्कूली बच्चे मोनिश और सुचि एक साथ-साथ रहते हैं, हर काम साथ करते हैं.

फिर एक विचित्र घटनाक्रम में मोनिश के हाथों एक क़त्ल हो जाता है और दोनों अलग हो जाते हैं.

बड़े होकर जब यह दोनों मिलते हैं तो जहां सुचि एक राजघराने की बहू बनने वाली होती है वहीं मोनिश उस राजघराने के अस्तबल का केयरटेकर होता है.

प्रेम अपना रास्ता ढूंढ लेता है और घोड़ों, अस्तबल, लोहारों की बस्ती और सुंदर लोकेशन के बीच से होते हुए कहानी मिर्ज़ा-साहिबा की कहानी में तब्दील होती जाती है.

लेकिन अगर मामला इतना ही रहता तो ठीक था, यह एक सुंदर और लाजवाब फ़िल्म होती, लेकिन फ़िल्म को इतना आर्टिस्टिक टच दिया गया है कि आप परेशान हो सकते हैं.

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फ़िल्म में साथ-साथ एक पुरानी मिर्ज़ा साहिबा की कहानी भी चल रही है, जहां घोड़े पर बैठ कर तीर चलाता मिर्ज़ा है और उसका पीछा करते साहिबा के भाई हैं.

फिर एक ट्रैक है जिसमें लोहारों की बस्ती को 'लोहार गलीट कहा गया है. इस गली में बैठे कुछ लोग मिर्ज़ा साहिबा की कहानी को नाटक या रंगमंच की तरह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.

समझ में नहीं आता कि यह हिस्सा फ़िल्म में क्यों रखा गया है, क्योंकि यक़ीन मानिए उस हिस्से को विस्तार से नहीं दिखाया जाता, वो केवल एक सपोर्टिंग ट्रैक ही है.

बुरा मत मानिएगा फ़िल्म का संगीत कानफोड़ू है. बहुत दिनों बाद दलेर मेंहदी की आवाज़ किसी फ़िल्म में सुनाई पड़ती है और वो एक बहुत मुश्किल आलाप लेते हैं लेकिन यह आलाप आपको एक समय बाद अपने कानों पर हाथ रखने को मजबूर कर देगा.

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लाईव मंच पर किसी गायक का आलाप जितनी राहत देता है, सिनेमा हॉल की बंद दीवारों पर वही आलाप आपको तीर सा चुभ सकता है. ये , इसका एहसास होता है.

राजस्थान के परिदृश्य में बनी इस कहानी में शंकर एहसान लॉय का संगीत बैकग्राउंड स्कोर को छोड़कर, कहीं भी राजस्थान की याद नहीं दिलाता.

लेकिन शंकर एहसान लॉय कमाल का कंटेपरेरी संगीत बना सकते हैं, राजस्थानी नहीं.

फ़िल्म कई मायनों में उलझाती भी है, जैसे एक राजघराने की बहू कैसे घंटों बिना किसी निगरानी के अस्तबल में बैठी रहती है और अस्तबल के मैनेजर के साथ घूम रही होती है.

कैसे एक होने वाली राजकुमारी, एक रात अस्तबल में ग़ुज़ार लेती है और किसी को पता नहीं चलता.

अभिनय के क्षेत्र में सैय्यामी खेर वाकई निराश करती हैं उनके चेहरे पर एक ही तरह का भाव रहता है और वो है 'ओह वाऊ!' वाला भाव.

अभिनेता अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर फ़िल्म के कुछ दृश्यों में अच्छे, कुछ में बच्चे और कुछ में कच्चे नज़र आते हैं लेकिन गंभीर होने वाले कुछ दृश्यों में उनका अभिनय अच्छा लगता है.

फ़िल्म में ओम पुरी भी हैं जो शायद पहले नैरेटर की भूमिका निभाने वाले थे लेकिन बीच फ़िल्म में ही निर्देशक का मन बदल जाता है और नैरेट करती ओमपुरी की आवाज़ गायब हो जाती है.

इसके अलावा फ़िल्म में आर्ट मलिक, के के रैना और अनुज चौधरी भी बड़ी भूमिकाओं में हैं और वो काफ़ी रंगमंच सरीखा अभिनय कर रहे हैं.

ऐसे में आप को वो पसंद आ भी सकते हैं और नहीं भी.

फ़िल्म को जो दो स्टार मिले हैं उसकी वजह है फ़िल्म की भव्यता और कैमरा वर्क है. जिस खूबसूरती से इसे फ़िल्माया गया है, वो लाजवाब है.

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फ़िल्म में एक दृश्य है, जहां एक शेर आता है, वाह! इतना असल ग्राफ़िक आपने शायद ही हिंदी सिनेमा में देखा हो.

लद्दाख़, रेगिस्तान, घोड़े, कितना सुंदर लगता है सबकुछ, लेकिन सुंदरता देखने तो हम हॉल में नहीं गए, फ़िल्म देखने गए हैं, यहीं मिर्ज़या मात खाती है.

वीकेंड पर हज़ार रुपयों तक की टिकट ख़रीद कर आप इसे देखें ऐसी सलाह हम आपको नहीं दे सकते. लेकिन मना भी नहीं कर सकते है. यह आपकी निजी पसंद है.

हम आपको विक़ल्प ज़रुर बता सकते हैं, इस फ़िल्म के साथ रिलीज़ हो रही हैं हॉलीवुड फ़िल्म 'मिस परजरीनस होम फ़ॉर पेक्युलर चिल्ड्रन' जो कि एक एक्शन एडवेंचर फ़िल्म है.

इसके अलावा एम एस धोनी भी एक विकल्प है और हां, बाबा राम रहीम की फ़िल्म एमएसजी भी है.

मिर्ज़या के बारे में अंतिम बात, राकेश ने बीबीसी से कहा था कि वो ढूंढना चाहते थे कि साहिबा ने मिर्ज़ा के तीर क्यों तोड़े?

राकेश को कहानी का अगला हिस्सा पढ़ना चाहिए था, जवाब वहीं लिखा है, फिर वो फ़िल्म नहीं बनाते.

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