आँद्रेइ वायदा: 'महान सिनेमा का आखिरी आदमी'

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सिनेमा की नवयथार्थवादी धारा का असर ऋत्विक घटक, गुरुदत्त और मृणाल सेन जैसे भारतीय फ़िल्मकारों पर पड़ा था.

पोलैंड के महान फिल्मकार आँद्रेइ वायदा इसी धारा के अहम फ़िल्मकार थे. इसलिए उनके बारे में जानना और उनके सिनेमा को समझना भारतीय समाज के लिए ज़रूरी है.

नब्बे वर्ष की उम्र में आँद्रेइ वायदा का देहांत सहसा विश्व सिनेमा के उस दौर की याद दिलाता है जब बहुत से देशों में कई बड़े फिल्मकार परदे पर महान कृतियों की रचना कर रहे थे. वो विश्व सिनेमा का स्वर्ण-काल था और सन 1950 से 1960 के दशक में जिन फिल्मों की रचना हुई उन्होंने सिनेमा को महाकाव्य जैसी ऊंचाइयों तक पंहुचाया.

यह भी उल्लेखनीय है कि जब स्वीडन में इंगमार बेयरमान, स्पेन और मेक्सिको में लुईस बुन्वेल, इटली में फेदेरीको फेल्लीनी और मिकेलान्जेलो अन्तोनिओनी, फ्रांस में क्लोद शाब्रोल, ज्यां लुक गोदार, फ्रांसुआ त्रुफो, पोलैंड में आंद्ज़ेई वायदा, हंगरी में मिक्लोस यान्चो और मिलोस फोर्मान, जापान में अकीरा कुरोसावा और यासुजिरो ओजू विश्व सिनेमा की तस्वीर बदल रहे थे, अपने यहाँ सत्यजित रॉय 'पथेर पांचाली' (1955) और 'अपराजितो' और ऋत्विक घटक भी 'अजांत्रिक' और 'मेघे ढका तारा' आदि के ज़रिये एक नए सिनेमा की शुरुआत कर रहे थे.

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बेयरमान की 'वाइल्ड स्ट्रॉबेरीज़' और 'द सेवेंथ सील', बुन्वेल की 'लोस ओल्विदादोस और 'नाजारीन' ,फेल्लीनी की 'ला स्त्रादा' और 'ला दोल्चे वीता', अन्तोनिओनी की 'लावेंतुरा', कुरोसावा की 'राशोमोन' और 'सेवेन समुराई' और ओजु की 'तोक्यो स्टोरी ', सत्यजित रे की 'पथेर पांचाली और अपराजितो' ऋत्विक घटक की 'अजांत्रिक' और 'मेघे ढाका तारा' आदि इस स्वर्णिम युग की शाहकार फ़िल्में हैं.

इन्होंने सिनेमा को मनुष्य के सामाजिक-मानसिक संबंधों की पड़ताल का माध्यम बनाया और सिनेमा को मनोरंजन से हटा कर एक संपूर्ण कला विधा के तौर पर प्रतिष्ठित किया.

ये फिल्में उस नव-यथार्थवाद का अहम पड़ाव थीं जिसकी शुरुआत इटली के वित्तोरियो देसीका की 'बाइसिकल थीफ' और लूचीनो विस्कोन्ती की 'ला तेरा त्रेमा' जैसी फिल्मों से हुई. इस सिनेमा के पीछे साहित्यिक प्रेरणाएं सक्रिय थीं. आगे चलकर यह नव-यथार्थवाद कई नए सिनेमाई शिल्पों में व्यक्त हुआ.

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एक दौर में ये फिल्में अपने यहाँ भी कई शहरों में गठित फिल्म सोसायटियों और विदेशी सांस्कृतिक केन्द्रों में दिखलाई गयीं और हिंदी में 'दिनमान ' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं ने उन पर नियमित रूप से समीक्षाएं प्रकाशित कीं. दरसल उस दौर के बौद्धिक और साहित्यिक माहौल को समृद्ध करने में इन फिल्मों और उनकी समीक्षाओं का बड़ा योगदान है.

सिनेमा की नव-यथार्थवादी धारा का प्रभाव भारतीय और खास कर हिंदी सिनेमा पर भी पड़ा. बिमल रॉय की 'दो बीघा ज़मीन' और 'परिणीता', गुरुदत्त की 'प्यासा' और कागज़ के फूल' और उनके बाद 'शहर और सपना', 'जागते रहो' जैसी कई फिल्मों पर साफ़ दिखता है.

सत्यजित रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन के बारे में तो माना जाता है कि वे नव-यथार्थवाद के परदे से ही निकल कर आये. बाद में हिंदी और दूसरी कई भाषाओँ में 'नयी धारा' या समांतर सिनेमा की शुरुआत हुई जिसने कुछ अलग हटकर शैलीकृत मुहावरे निर्मित किये लेकिन यथार्थवाद की छायाएं उस पर भी देखी जा सकती हैं. यह भी एक तथ्य है कि हमारा समान्तर सिनेमा ज़्यादातर साहित्यिक कृतियों पर आधारित रहा.

आँद्रेइ वायदा की अपनी तीन आरंभिक फिल्मों 'अ जनरेशन', 'केनाल' और 'ऐशेज़ एंड डायमंड्स' से चर्चित हुए थे. ये तीनों फ़िल्में पोलैंड में नात्सी कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध आन्दोलन के बारे में थीं. इनमें 'ऐशेज़ एंड डायमंड्स' को महा यथार्थवादी कृति माना जाता है जो येर्ज़ी आंद्ज़ेइवस्की के एक उपन्यास पर आधारित थी (इस उपन्यास का अनुवाद कवि रघुवीर सहाय ने 'राख और हीरे' शीषक से साहित्य अकादेमी के लिए किया था).

वायदा ने नात्सियों के विरुद्ध 'पोलिश विद्रोह' में हिस्सा लिया था और उस पर फ़िल्में भी बनाईं. वे पोलैंड पर सोवियत संघ के हस्तक्षेप के खिलाफ थे और पोलैंड में समाजवादी सत्ता को लेकर उन्होंने 'मेन ऑफ़ मार्बल' नाम से फिल्म बनाई थी.

बाद में उन्होंने सॉलिडेरिटी के नेता लेख वावेम्सा पर केन्द्रित दो फिल्मों- 'मैन ऑफ़ आयरन' और 'मैन ऑफ़ होप' का निर्माण किया. लेकिन समाजवादी सरकार के कठोर आलोचक होने के बावजूद उनके काम करने की आज़ादी नहीं छीनी गयी.

पूर्वी यूरोप में समाजवाद के विघटन के बाद जो पूँजीवादी युग शुरू हुआ, उसने बहुत सी चीज़ों के साथ सिनेमा की बड़ी और कलात्मक परम्परा को भी ध्वस्त कर दिया. इससे उपजे खालीपन पर हॉलीवुड की फिल्मों ने क़ब्ज़ा जमा लिया जिसके नतीजे में फिल्मकार भी व्यावसायिक मुहावरे अपनाने को बाध्य हो गए. यह सिनेमा से कला और समझौता-विहीन कल्पनाशीलता की विदाई का समय था.

आज पूर्वी यूरोपीय देशों में सिनेमा कम बन रहा है या फिर अमेरिकी फिल्मों के असर में बन रहा है और उसमें वह मार्मिक, साहित्यिक और मानवीय संवेदना नज़र नहीं आती है जिसके कारण इन देशों की फिल्मों की अलग और कलात्मक पहचान बनी थी. वायदा विश्व फिल्मकारों की उस महान और गैर-व्यावसायिक पीढ़ी के आखिरी प्रतिनिधि थे.