'अब विलेन की ज़रूरत किसे है?'

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एक वक़्त के बाद कई बार अभिनेता के लिए किसी किरदार की इमेज से बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाता है.

ऐसे भी कई उदाहरण हैं जब कोई लोकप्रिय किरदार को निभाने के बाद कलाकार खुद को किसी एक इमेज में बंधा हुआ पाता है.

हालांकि बॉलीवुड के "बैड मैन" गुलशन ग्रोवर इस इमेज में बंधने को बुरा नहीं मानते, बल्कि एक विलेन के लिए इसे अच्छा मानते हैं.

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बीबीसी को दिए एक ख़ास इंटरव्यू में गुलशन ग्रोवर ने बताया,"देखिए इमेज में बंधना हीरो का रोल निभाने वाले अभिनेता के लिए तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, क्योंकि वो हमेशा एक ही फ़िल्म और एक ही किरदार नहीं कर सकता है. लेकिन एक विलेन का रोल करने वाले के लिए ये किसी वरदान की तरह होता है."

गुलशन ग्रोवर समझाते हैं, "देखिए जीवन से लेकर प्राण, प्रेम चोपड़ा, रंजीत, अमजद ख़ान या अमरीश पुरी का एक ऐसा किरदार कभी न कभी आया है जिसने लोगों के मन में उनकी नकारात्मक छवि बना दी और इस छवि का फ़ायदा एक विलेन को इस तरह होता है कि निर्देशक को बिना कोई प्लॉट बनाए दर्शक को फ़िल्म में ले जाना आसान होता है, हमारे आते ही पब्लिक समझ जाती है कि यही है, बैड मैन!"

गुलशन ग्रोवर बताते हैं कि वो कभी भी फ़िल्मों में हीरो बनने के लिए नहीं आए थे और न ही उन्हें राजनीति का शौक था.

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वो कहते हैं,"मुझे खुशी है कि मैं बॉलीवुड के उन कुछ विलेन्स में से हूं जिन्हें पर्दे पर देखकर दर्शक के मन में भय, शोक, गुस्से के भाव आते हैं और वो हीरो के साथ, फ़िल्म की भावना के साथ, ख़ुद को जोड़ लेते हैं."

गुलशन एक पुराने रेडियो इंटरव्यू को याद करते हैं जब वो राम लखन के बैड मैन किरदार के लोकप्रिय हो जाने के बाद स्टूडियो में आए. उनके आने पर सन्नाटा छा गया और फिर उन्हें ही सबको हंसाना पड़ा.

गुलशन ग्रोवर बॉलीवुड के उन कुछ कलाकारों में से थे जिन्होंने हॉलीवुड में काम किया और हॉलीवुड में आज भारतीय कलाकारों की बढ़ती तादाद को लेकर वो बेहद खुश हैं.

उन्होंने बताया,"जब मैं वहां गया था तब हमारी इंडस्ट्री के लिए यह अजूबा था. बड़े-बड़े कलाकार यहां थे और मैं, एक विलेन वहां पहुंच गया. लेकिन सच यह है कि वहां पहुंचना बहुत मुश्किल है और आज जो लोग वहां काम कर रहे हैं, मैं उन्हें सच्चा एक्टर मानता हूं."

गुलशन बताते हैं, "हॉलीवुड में काम करना या काम मिलना वाकई मुश्किल है. आप यहां कितने भी बड़े कलाकार हों, वो आपकी इज़्ज़त करेंगे, लेकिन अगर आपका काम अच्छा नहीं है तो एक हॉलीवुड निर्देशक आपको पहले ही शॉट में परख लेगा और स्टूडियो से बाहर खड़ा सकता है."

गुलशन बिना किसी का नाम लिए कहते हैं कि यही कारण है कि हॉलीवुड में विश्व सिनेमा से कुछ ही लोग आ पाते हैं और बड़े बड़े नाम कभी कभी वहां अपना जलवा नहीं दिखा पाते.

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इस बार भी गुलशन ग्रोवर एक एनिमेशन फ़िल्म 'महायोद्धा राम' में काम कर रहे हैं और ज़ाहिर सी बात है कि यहां भी वो बैड मैन, यानि रावण बने हैं.

गुलशन ने बताया कि भारत में एनिमेशन की तकनीक को अभी बहुत उपर उठना है लेकिन निर्देशन के स्तर पर इस फ़िल्म में कई हॉलीवुड स्तर के प्रयोग हुए हैं,"आमतौर भारत में एनिमेशन फ़िल्मों को पहले एनिमेट कर लिया जाता है और फिर किसी अभिनेता की आवाज़ डब की जाती है लेकिन इस बार महायोद्धा राम के एनिमेशन से पहले मेरी आवाज़ रिकॉर्ड की गई."

वो आगे बताते हैं,"12 कैमरा मेरे हावभाव नोट कर रहे थे ताकि जब रावण का किरदार एनिमेट हो तो मेरे चेहरे के भाव, मेरी बॉडी लैंगवेज वहां लाई जा सके और एक सजीव एनिमेशन किया जा सके."

गुलशन ग्रोवर मानते हैं कि अब बॉलीवुड की फ़िल्मों में विलेन के किरदार नहीं लिखे जाते हैं. वो कहते हैं, "पहले विलेन का किरदार मज़बूत बनाया जाता था, उसे इतना कठोर बनाया जाता था कि जब हीरो उसे हराए तो वो 'हीरो' लगे."

वो कहते हैं, "आप घातक के कांत्या, मिस्टर इंडिया के मोगैम्बो, शान के शाकाल या गब्बर को भूल सकते हैं? नहीं न ! क्योंकि वो उतनी ही मेहनत से लिखे गए थे जितनी मेहनत से हीरो के किरदार."

गुलशन ग्रोवर को लगता है कि आजकल हीरो को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है और फिर उसके किरदार में ही ग्रे शेड डाल दिया जाता है, ऐसे में विलेन की ज़रूरत किसे है?

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