2016- बॉलीवुड ने ऐसे उठाई औरतों की आवाज़

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बॉलीवुड में बनने वाली हिंदी फ़िल्मों की अक्सर इस बात पर आलोचना की जाती है कि इन फ़िल्मों में महिलाओं को दूसरा दर्जा दिया जाता है.

नायक के इर्द गिर्द ही कहानी का पूरा ताना-बाना बुना जाता है और अभिनेत्रियों को रोमांस, आइटम सॉन्ग या फिर हीरो को हमदर्दी देने वाला रोल दिया जाता रहा है.

महिलाओं के मुद्दों पर बनने वाली फ़िल्में या तो आर्ट फ़िल्में हो जाती हैं या फिर उनपर 'लीक से हटकर' बनी फ़िल्म का ठप्पा लग जाता है लेकिन धीरे धीरे यह चलन बदला है और हिंदी फ़िल्मों में नायिकाओं का उदय हुआ है.

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साल 2014 में जहां महिलाओं के मुद्दों या उनके नज़रिए से बात करती 4 फ़िल्में बनीं (गुलाब गैंग, क्वीन, मर्दानी और मैरी कॉम) तो वहीं साल 2015 में ऐसी 5 फ़िल्में रिलीज़ हुई. (दम लगा के हईशा, एन एच 10, पीकू, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स, एंग्री इंडियन गॉडेस)

लेकिन साल 2016 में बॉलीवुड में महिलाओं की कहानियों को अच्छी जगह मिली और महिलाओं की कहानियों को कहती हुई ऐसी 10 से भी ज़्यादा फ़िल्में इस साल रिलीज़ हुई जिन्होंने 'नायक प्रधान' हो चले बॉलीवुड की परिपाटी को तोड़ा.

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दंगल

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23 दिसंबर को रिलीज़ हुई इस फ़िल्म के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल की गई लाइन- "म्हारी छोरियां, छोरो से कम हैं के?" फ़िल्म के कथानक को स्पष्ट कर देती हैं.

निर्माता आमिर ख़ान और निर्देशक नितेश तिवारी की इस फ़िल्म में एक पहलवान पिता का कुश्ती जैसे 'मर्दों' के खेल में अपनी बेटियों को लाना, लड़कियों के लिए बनाई गई सामाजिक रीतियों और बंधनो को तोड़ना बड़ी ख़ूबसूरती से दिखाया गया है.

कैसे पूरे गाँव और समाज के विचारों व नियमों के विरुद्ध जाकर एक पिता अपनी बेटियों को पहलवानी सिखाता है और किस तरह एक लड़की को क़दम क़दम पर उसके लड़की होने के कारण रोक टोक का सामना करना पड़ता है. यह फ़िल्म बखूबी अपना संदेश दर्शकों तक पहुंचाती है.

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नीरजा

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1986 में हाईजैक हुए एक विमान के यात्रियों की सुरक्षा के लिए अपनी जान दाँव पर लगाने वाली एयरहोस्टेस नीरजा भनोट की ज़िंदगी पर बनी इस फ़िल्म ने दिखाया कि कैसे मुश्किल परिस्थिति में भी एक 'लड़की' अपना आपा नहीं खो सकती है और एक 'लड़का' भयभीत हो सकता है.

विमान परिचारिकाओं को लेकर एक आम सोच है कि वो बस ख़ूबसूरत होती हैं लेकिन निर्देशक राम माधवानी की फ़िल्म इसी 'सोच' को तोड़ती है और एक लड़की की दास्तां दिखाती है जो खूबसूरत होने के साथ साथ साहसी भी थी.

फ़िल्म दर्शाती है कि किसी विज्ञापन में नाज़ुक दिखने वाली महिला वक़्त आने पर अपने सर पर बंदूक भी रखवा सकती है.

कहानी 2

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साल 2012 में निर्देशक सुजॉय घोष और अभिनेत्री विद्या बालन की सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म कहानी का सीक्वल 'कहानी 2' बच्चियों के साथ घर की चारदीवारी में होने वाले यौन शोषण जैसे गंभीर विषय पर आधारित है.

निर्माता निर्देशक सुजॉय घोष दिखाते हैं कि किस तरह 'सुरक्षित' माने जाने वाले घर में भी एक लड़की सुरक्षित महसूस नहीं कर सकती और कैसे एक बलात्कार या शोषण से ग़ुज़रने वाली बच्ची आजीवन सामान्य होने कि कोशिश करती रहती है लेकिन हो नहीं पाती.

फ़िल्म के एक दृश्य में असुरक्षा की इस भावना और समाज की बेबसी का बखूबी चित्रण उस समय किया गया है जब पुलिस इंस्पेक्टर बने अर्जुन रामपाल बच्ची के साथ हुए बलात्कार कि घटना को जानने के बाद अपनी बच्ची की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो उठते हैं.

हालांकि इस फ़िल्म में बॉलीवुड मसाला भी बखूबी डाला गया है और कुछ चीज़ें नाटकीय की गई हैं लेकिन इसी फ़िल्म से जुड़ी एक चर्चा के दौरान अभिनेत्री सोनम कपूर ने अपने साथ बचपन में हुए एक यौन शोषण की घटना को खुल कर बताया था.

डिर ज़िंदगी

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25 नंवबर को रिलीज़ हुई निर्देशक गौरी शिंदे की इस फ़िल्म में एक महिला निर्देशक का नज़रिया और इसी कारण एक ताज़गी थी.

एक युवा कैमरावूमन जो ख़ुद की एक फ़िल्म निर्देशित करना चाहती है लेकिन किसी 'गॉडफ़ादर' का सहारा नहीं है, जिसके काम को उसके माता पिता समझते नहीं क्योंकि वो 9 से 5 दफ़्तर नहीं जाती, जो परिवार से शादी के दबावों को झेल रही है और मुंबई जैसे महानगर में सिंगल होने के कारण किराए के घर से निकाल दी गई है.

गौरी शिंदे इस फ़िल्म में ख़ूबसूरती से दर्शकों को एक लड़की की मनोदशा से मिलवाती है और डॉक्टर जहांगीर ख़ान (शाहरूख़ ख़ान) के किरदार के ज़रिए समझाती हैं कि कभी कभी महिलाओं को सिर्फ़ एक साथ की ज़रूरत होती है, जिसके मिल जाने पर वो उड़ सकती हैं.

पिंक

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इस फ़िल्म में अमिताभ के कहे एक डॉयलॉग ने नारीवाद से जुड़े कई सवालों पर विराम लगा दिया था. अमिताभ पर्दे पर कहते हैं, "नो' अपने आप में एक वाक्य है और इसे किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं."

फ़िल्म की थीम में निर्देशक अनिरूद्ध रॉय चौधरी ने यह दिखाया है कि किस तरह पुरुषवादी मानसिकता के लोग महिलाओं के हंसने बोलने और उनके पुरुषों के साथ उठने बैठने या देर रात घर आने को आसानी से महिलाओं के चरित्र से जोड़ देते हैं.

पिंक हमारे समाज और हमारी मानसिकता में गहरी पैठ बना चुके लैंगिक भेदभाव पर करारी चोट करती है और समाज की ओर से "अच्छी महिलाओं" के लिए बना दिए गए एक खाँचे पर सवाल उठाती है.

पार्च्ड

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23 सितंबर को रिलीज़ हुई लीना यादव कि इस फ़िल्म के चर्चा में आने का कारण रहा फ़िल्म में अभिनेत्री राधिका आप्टे का एक टॉपलैस दृश्य.

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में पितृसत्ता, बाल विवाह, दहेज, विवाहेत्तर बलात्कार जैसे गंभीर विषयों को दिखाती इस फ़िल्म में जब राधिका के अर्धनग्न दृश्य को मीडिया की ओर से हाईलाईट किया जाने लगा तो राधिका आप्टे ने भी मीडिया की सोच की कड़ी निंदा की थी.

लीना यादव ने इस कहानी में दिखाया है कि कैसे डिजिटल हो रहे भारत में अभी भी महिलाएं कुरीतियों का शिकार हैं और सभ्य समाज में रहते हुए भी दूसरे दर्जे का जीवन जीने को मज़बूर हैं.

की एंड का

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एक अप्रैल को रिलीज़ हुई निर्देशक आर बाल्की की इस फ़िल्म में भारतीय समाज में लड़के और लड़कियों के लिए निर्धारित भूमिकाओं पर सवाल उठाया है. इस फ़िल्म की अच्छी बात यह भी है कि यह फ़िल्म न सिर्फ़ सवाल उठाती है बल्कि उसका समाधान भी दिखाती है.

फ़िल्म का हीरो अपनी मां की तरह एक घर चलाने वाला शख़्स बनना चाहता है और वहीं फ़िल्म की हीरोईन घर से बाहर निकल कर पैसे कमाने वाली भूमिका में है.

निर्देशक ने दिखाया है कि कैसे हमारे समाज के लिए एक लड़के का घर बैठना और एक लड़की का काम पर जाना असहनीय हो जाता है, लेकिन ऐसा हो जाने में कोई बुराई नहीं है और अगर एक काम करने और घर को चलाने का अधिकार किसी लिंग विशेष के लिए ही नहीं है.

ये वो प्रमुख फ़िल्में हैं जिन्होंने लैंगिक भेदभाव पर और पितृसत्ता पर करारी चोट की लेकिन इन फ़िल्मों के अलावा भी साल 2016 में बॉलिवुड ने ऐसी कई फ़िल्में दर्शकों को दी जिनमें महिलाओं को लीड रोल या उनका नजरिया सामने आया.

एक महिला मुक्केबाज़ या खिलाड़ी के समक्ष आने वाली परेशानियों को दिखाती 'साला खड़ूस', एक महिला की ज़िंदगी में शिक्षा की ज़रुरत को दर्शाती 'निल बटे सन्नाटा', अपनी धुनों को तलाश करती एक महिला संगीतकार की कहानी 'जुगनी' या फिर पुलिस की वर्दी पहने 'जय गंगाजल' की प्रियंका चोपड़ा, साल 2016 इसलिए भी याद रखा जाएगा कि इस साल में महिलाएं 70 एमएम के पर्दे पर सिर्फ़ शोपीस नहीं रही.

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