ब्लॉग: ओम पुरी से और क्या चाहिए...? बाबा जी का ठुल्लू!

जाने किसने किससे पूछा था कि स्टार और अभिनेता में क्या फ़र्क है. जवाब मिला स्टार अपने ज़माने में ज़िंदा रहता है और अभिनेता आने वाले ज़मानों में भी ज़िंदा रहता है.

जब दिलीप साहब आखिरी बार कराची आए तो सरकारी टेलीविजन के एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि आपको अपनी किस फिल्म की एक्टिंग आज भी याद आती है.

सवाल बहुत अजीब था मगर दिलीप साहब का जवाब इससे भी ज्यादा अजीब था, मियां हमने कभी एक्टिंग नहीं की. एक्टिंग कोई अच्छी चीज़ नहीं है.

हमने तो बस इतनी कोशिश की है कि जो भी किरदार मिले, उसमें ढल जाएं.

इसी से मिलती जुलती बात नसीरुद्दीन शाह ने कही कि एक नाकाम और कामयाब अदाकार का फ़र्क ये है कि नसीरुद्दीन शाह अगर किसान का किरदार अदा करे तो देखने वाले को नसीरुद्दीन शाह नहीं, किसान याद रहे.

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अगर ऐसा नहीं है तो ये नक्काली तो हो सकती है, अदाकारी नहीं. मसलन ओम पुरी को देख लें, वो ऐक्टर थोड़े ही हैं, वे तो पानी हैं. जैसा बर्तन हो, वैसा हो जाता है.

हर कोई ये चमत्कार नहीं कर सकता है. आप मेरी गिनती भी उन पागलों में कर सकते हैं जिसे एक ज़माने तक जिसने जो फिल्म कही, देख ली.

मगर 80 के दशक में नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, फारुख शेख, शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल, सुप्रिया पाठक, और फिर ओम पुरी, इन सबने मुझ जैसे पागलों के साथ ये ज़ुल्म किया कि हर फ़िल्म देखने की आदत छुड़वा दी.

हम यूनिवर्सिटी हॉस्टल में रहते थे और वीकेंड पर सत्यजीत राय, श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी, सुधीर मिश्रा और केतन मेहता की जो फिल्म भी मिलती, उठा लाते.

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एक के बाद एक पूरे 24 घंटों में आठ फिल्मों के वीडियो पलक झपकाये बगैर देखते और फिर थक कर वहीं ढेर हो जाते.

जब आंख खुलती तो इन फ़िल्मों की अच्छाइयों और बुराइयों पर बात होती और अक्सर ऐसा होता कि 'आक्रोश' का सीन 'पार' में और 'मंथन' का 'खंडहर' में और 'मंडी' का 'बाज़ार' में घुसेड़ देते और बाकी दोस्त खूब रिकॉर्ड बजाते.

हम चार-पांच दोस्त हॉस्टल में इस बात के लिए मशहूर हो गए कि इनके साथ बैठकर सिर्फ वही फ़िल्म देखी जा सकती है जिसका हीरो बदशक्ल हो.

और फिर पैरलल सिनेमा या आर्ट मूवी का ज़माना का ख़त्म हो गया. मगर कहां खत्म हुआ.

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अगर ख़त्म हो जाता तो पंकज मिश्रा, आमिर खान, अजय देवगण, मनोज वाजपेयी, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, इरफान ख़ान, तब्बू, फरहान अख्तर, विद्या बालन, विनय पाठक, सौरभ शुक्ला, परेश रावल, राजपाल यादव, गुलजार साहब, अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, मीरा नायर और बहुत से दूसरे जुनूनियों को नए-नए रिस्क लेने और तजरबे करने का हौसला कहां से मिलता.

80 के दशक में जो बदशक्लें और कंगले बॉलीवुड की रिवायती फ़िल्मी जकड़ वाले फ्रेम से कूदकर नए रास्ते खोजने निकले.

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आज की मेथड एक्टर और समाज को सिनेमा से जोड़ने वाली बॉलीवुड नस्ल उन्हीं की तो लगाई लहलहाती खेती है. मुझे तो ओम पुरी के मरने का कोई दुख नहीं है.

ओम पुरी भारत और पाकिस्तान के एडवेंचर बाजों की नई पीढ़ी की शक्ल में आपको जगह-जगह दमकता हुआ नज़र आएगा.

ओम पुरी और उनके साथियों ने तो अपना काम कर दिया. और क्या चाहिए? बाबा जी का ठुल्लू!

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