फ़िल्म रिव्यू: ओके फ़िल्म है, 'ओके जानू'

ओके जानू इमेज कॉपीरइट Madras Talkies
Image caption सिद्धार्थ रॉय और श्रद्धा कपूर

रेटिंग - ढाई स्टार

निर्देशक - शाद अली

अभिनेता - श्रद्धा कपूर, आदित्य रॉय कपूर, नसीरूद्दीन शाह और लीना सैमसन

शाद अली, ए आर रहमान, करण जौहर, ग़ुलज़ार और मणिरत्नम जैसे दिग्गज़ों का नाम जब एक साथ किसी फ़िल्म साथ जुड़ता है तो उस फ़िल्म से कई उम्मीदें लग जाती हैं.

फ़िल्मों का रिव्यू करते समय एक समस्या जो आपके सामने आती है, वो यह कि ज़रूरी नहीं जो आपको पसंद आए वह युवाओं या बुज़ुर्गों को भी पसंद आए.

इस फ़िल्म के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सिनेमा हॉल में हमारे साथ बैठे टीनएजर दर्शक फ़िल्म के डॉयलॉग्स पर ताली बजा रहे थे तो वहीं थोड़ी ज़्यादा उम्र के लोग हंस रहे थे और उबासी ले रहे थे.

दरअसल, फ़िल्म का गीत संगीत, कैमरा वर्क, आर्ट और थोड़ा अभिनय जैसी कुछ चीज़ें बहुत अच्छी हैं और कुछ ख़राब भी- जैसे कहानी.

मणिरत्नम की तमिल फ़िल्म "ओ कधाई कनमणि" को भी लोगों ने थोड़ा चाहा था और थोड़ा नहीं और इस हिंदी रीमेक में भी ऐसा हुआ है.

फ़िल्म बहुत सुंदर दिखती है, फ़ील गुड एहसास करवाती है और फ़िल्म का संगीत आपको बांधे रखता है.

साल की पहली फ़िल्म ‘हरामख़ोर’ कैसी है?

बॉक्स ऑफ़िस पर 'आमिर और छोरियों का दंगल'

इमेज कॉपीरइट Madras Talkies
Image caption फ़िल्म 'ओके जानू' के किरदार

फ़िल्म का सेट और साथ ही सेपिया टोन में की गई सिनेमैटोग्रफ़ी फ़िल्म को ऐसा बना देते हैं जैसे आप इसे कैमरा से नहीं, आँखों से देख रहे हों.

मुंबई की लोकल ट्रेन, फ़िल्म में वीडियो गेम के ग्राफ़िक सभी कुछ पर निर्माताओं ने काफ़ी पैसे खर्च किए हैं लेकिन अभिनय के मामले में लीड पेयर को छोड़कर सारी की सारी सपोर्टिंग कास्ट काफ़ी ख़राब अभिनय करती है.

यह इसलिए भी अखरता है क्योंकि कई फ़िल्मों में सपोर्टिंग कलाकार कई बार लीड पेयर से अच्छी एक्टिंग करते दिखते हैं लेकिन 'ओके जानू' इसका अपवाद है, यहां लीड पेयर औसत अभिनय करता है और सपोर्टिंग कास्ट (नसीरुद्दीन शाह को छोड़कर) उससे भी ख़राब अभिनय.

फ़िल्म की कहानी प्रोमो से ही स्पष्ट हो जाती है कि एक लड़का-लड़की प्यार तो करते हैं, साथ भी रहना चाहते हैं, लेकिन शादी नहीं करना चाहते, निर्देशक के पास इसी रिश्ते को ख़ूबसूरती से दिखाने का काम था जो शाद अली ने ठीक-ठाक किया है.

वीडियो गेमर आदि के किरदार में आदित्य रॉय कपूर अच्छे लगते हैं लेकिन वो वीडियो गेमर नहीं लगते क्योंकि वीडियो गेमर्स हमेशा बातों में किसी गेम को घुसा देते हैं और आदि ऐसा नहीं करता, यह एक कमी है.

लेकिन आर्किटे्क्ट के रोल में श्रद्धा अच्छी दिखती हैं, वो पहले से ज़्यादा मच्योर हुई हैं.

तेल का सबसे गहरा कुँआ और 'डीपवाटर होराइज़न'

फ़िल्म रिव्यू या घटिया शायरी?

इमेज कॉपीरइट HYPE PR

फ़िल्म का एक अच्छा पहलू है नसीरुद्दीन शाह और उनकी कहानी, लिव इन में रहने वाले इस जोड़े को मुंबई में घर मुहैया करवाने वाले सख़्तमिजाज़ जज के किरदार में नसीर न सिर्फ़ अच्छे लगते हैं, बल्कि वो फ़िल्म के दृश्यों में जान डालते हैं.

नसीर की पत्नी बनी लीला सैमसन अल्ज़ाइमर मर्ज़ से पीड़ित हैं और इस बीमारी को भी शाद ने बखूबी फ़िल्म में पिरोया है.

इस फ़िल्म की आलोचना की जा सकती है तो सिर्फ़ यहां कि निर्देशक इन दो लीड पेयर के बीच के प्यार को ही बार-बार दिखाते हैं लेकिन फ़िल्म के बाकी हिस्सों पर काम नहीं करते. इस मामले में आपकी राय अलग भी हो सकती है.

फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले महात्मा गांधी से जुड़े कुछ रेफ़रेंस पर विवाद उठा था और बीबीसी को दिए अपने इंटरव्यू में पहलाज निहलानी ने कहा था कि यह मामूली बदलाव हैं और आपको फ़िल्म देखने से एहसास होगा कि यह सही थे.

किसिंग के लिए नहीं, बापू के लिए चली कैंची

डिक्टेटर हैं अनुराग कश्यप: पहलाज निहलानी

इमेज कॉपीरइट HYPE PR

मामला ये था कि फ़िल्म का लीड पेयर दोस्तों से छिपकर साबरमती में महात्मा गांधी के आश्रम जाता है और वापिस आने पर अपनी इस ट्रिप के बारे में श्रद्धा अपने दोस्तों को बताती है.

वहां श्रद्धा के दोस्त मज़ाक करते हैं कि बापू ने कब से जींस पैंट पहनना, आशिकी करना शुरू कर दिया. इस संवाद में बापू, साबरमती और चरखा शब्द को बदल कर क्रमश: बाबू, सब्ज़ीमंडी और चना कर दिया गया है.

इसके अलावा और भी दो बार बापू और साबरमती का नाम फ़िल्म में आता है लेकिन उसे सेंसर ने नहीं बदला है.

अगर आपको हल्की-फ़ुल्की रोमाटिंक कॉमेडी पसंद हैं तो आपको यह फ़िल्म ज़रूर अच्छी लगेगी लेकिन अगर आप गंभीर फ़िल्मों के शौकीन हैं तो फ़िर कोई बात नहीं.

साल का पहले हफ़्ते से क्यों डरता है बॉलीवुड?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे