जो जान हथेली पर लेकर भरते हैं फ़िल्मों में रंग

इमेज कॉपीरइट Angad Gupta

"फ़िल्मों के सेट अधिकतर 10 फ़ीट से ज़्यादा ऊंचे होते हैं. कई बार ये ऊंचाई 50 फ़ीट की भी होती है. नियमों के मुताबिक़ इसे बनाने वालों के लिए सेफ़्टी बेल्ट और हेलमेट ज़रूरी हैं. लेकिन कई प्रोडक्शन हाउस ये सुरक्षा मुहैया नहीं कराते. ऊंचाई पर काम करते समय पेंटर पर जान का ख़तरा मंडराता रहता है. कई दफ़ा फ़िल्म सेट पर एम्बुलेंस या डॉक्टर का बंदोबस्त नहीं होता."

हिंदी फ़िल्मों में काम करने वाले पेंटर राजेश और पेंटर अंगद अपनी और अपने जैसे पेंटरों का हाल कुछ यूँ सुनाते हैं.

इमेज कॉपीरइट Angad Gupta

दरअसल 23 दिसंबर 2016 को मुकेश डाकिया नाम के पेंटर की काम के दौरान ऊंचाई से गिरकर मौत हो गई थी. वो मुंबई के गोरेगांव फ़िल्म सिटी में संजय लीला भंसाली की अगली फ़िल्म रानी पद्मावती के सेट पर काम कर रहे थे. उसके बाद से फ़िल्मी सेट पर काम करने वाले पेंटरों में ख़ासी नाराज़गी है.

अंगद गुप्ता देवदास, मिशन कश्मीर, लागा चुनरी में दाग और अग्निपथ जैसी फ़िल्मों में बतौर पेंटर काम कर चुके हैं.

साल 1996 में उत्तर प्रदेश से मुंबई रोज़गार की तलाश में आए अंगद गुप्ता ने कई छोटे-मोटे काम किए और साल 2000 में बतौर पेंटर मज़दूर के रूप में काम मिला. आज वे हेड पेंटर हैं. लेकिन उनकी ये राह आसान नहीं थी.

इमेज कॉपीरइट Angad Gupta

वो बताते हैं, "आर्ट डायरेक्टर फ़िल्म सेट के मुताबिक़ हेड पेंटर से संपर्क करते हैं और हेड पेंटर, दूसरे मज़दरों को लेकर आता है. इन पेंटर्स का काम होता है फ़िल्मी सेट में रंग भरना. फ़िल्म सेट की ज़रूरत के हिसाब से एक दिन में अलग-अलग शिफ्टों में 10 से 70 पेंटर काम करते है. यहां रात के वक़्त भी काम जारी रहता है. रात 11 बजे से सुबह 3 बजे तक पेंटर काम करते हुए मिलेंगे. एक शिफ्ट की दिहाड़ी होती है 929 रुपए."

पेंटर अंगद फ़िल्म निर्माताओं पर आरोप लगाते हुए कहते हैं, "फ़िल्म सेट पर पेंटर के हाथ पैर टूटना आम बात है. अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो अस्पताल का ख़र्चा ज़्यादातर मौक़ो पर मज़दूर यूनियन के दबाव डालने पर ही मिलता है. पेंटर पर जल्दी काम करने का दबाव भी डाला जाता है जिससे दुर्घटनाएं होती हैं."

दिहाड़ी पर काम करने वाले ये पेंटर अधिकतर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल जैसे राज्यों से आते हैं. हर महीने घर पर पैसे भेजने की इन पर ज़िम्मेदारी होती है.

पेंटर राजेश के मुताबिक़ सिर्फ़ कुछ ही प्रोडक्शन हाउस हैं जहां दिहाड़ी समय से मिल जाती है.

इमेज कॉपीरइट Angad Gupta

लेकिन निर्माता मुकेश भट्ट की इस पर अपनी राय है.

भट्ट कहते हैं, "फ़िल्म सेट पर काम करने वाले कारपेंटर और किसी भी मज़दूर को बाहर काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर से अधिक पैसे मिलते हैं. शिफ्ट के मुताबिक़ पैसा मिलता है. लेकिन दुनिया में कोई भी मज़दूर खुश नहीं है. मैं नहीं कहता कि ये ग़लत है. सब में ज़्यादा पाने की चाह होती है. ना सिर्फ़ मज़दूर बल्कि अभिनेता से लेकर निर्देशक सबको जो भी मिल रहा है उससे अधिक की चाह है. लेकिन सबको वास्तविकता की पहचान होनी चाहिए."

वहीं पेंटर अंगद गुप्ता कहते हैं, "फाइटर, स्टंटमैन और जूनियर आर्टिस्ट को तो फ़िल्म सेट पर कई तरह की सुविधाएं मिलती है लेकिन पेंटर इससे वंचित रहते हैं जैसे खाना, नाश्ता या मिनरल वाटर. लगभग 12 घंटे कड़ी धूप में काम कर रहे पेंटर को पंखा तक मुहैया नहीं कराया जाता."

इमेज कॉपीरइट Angad Gupta

पेंटर राजेश और भी गंभीर आरोप लगाते हैं. राजेश कहते हैं, "गोरेगांव फ़िल्मसिटी में रात के समय घर जाने के लिए वाहन मिलना मुश्किल होता है. कभी कभी हमें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. इस इलाक़े में चीता और दूसरे जंगली जानवरों का हमेशा डर बना रहता है. उस समय हम जान हथेली पर लेकर चलते है. कम से कम एक वाहन होना चाहिए जो काम के बाद हमें फ़िल्मसिटी के बाहर तक छोड़ सके."

लेकिन निर्माता-निर्देशक संजय गुप्ता निर्माताओं का बचाव करते हैं. वो कहते हैं, "मुंबई में जगह के मुताबिक़ मज़दूर लेना पड़ता है. उसके लिए दो यूनियन हैं जिसने हमारा हाथ मरोड़ रखा है. अगर हम एक यूनियन को पैसे देते हैं तो दूसरा मीडिया के पास चला जाता है. यूनियन उन पैसों से अपना हिस्सा निकालकर मज़दूरों को देती है. उन्हें पैसे देने में हमें क्या दिक़्क़त आएगी? करोड़ों की फ़िल्में बनती हैं तो उसमें से 20 लाख देने में हमें कोई परेशानी नहीं."

इमेज कॉपीरइट Angad Gupta

फ़िल्म सेटिंग और लाइटमैन मज़दूर यूनियन के जनरल सेक्रेटरी गंगेश्वरलाल श्रीवास्तव ने रानी पद्मावती फ़िल्म में हुए हादसे के बाद फ़िल्म प्रोड्यूसर से मांग की है कि हर सेट पर एम्बुलेंस रहे और मज़दूरों की सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए.

फ़िल्मी सेट पर काम करने वाले पेंटरों की संख्या पिछले कुछ सालों में बढ़ गई है लेकिन कइयों को बेरोज़गार ही रहना पड़ता है. कई पेंटरों ने इस बेरोज़गारी से तंग आकर रिक्शा चलना भी शुरू कर दिया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे