'चमको' से चमकी दीप्ति नवल की किस्मत

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अभिनेत्री दीप्ति नवल की फ़ारुख़ शेख़ के साथ 1981 में आई फ़िल्म 'चश्मे बद्दूर' ने उन्हें एक बड़ी अदाकारा के रूप में स्थापित किया. दीप्ति शुक्रवार को अपना जन्मदिन मना रही हैं.

दीप्ति की पहचान हमेशा एक नान-ग्लैमरस, ऑर्ट फ़िल्मों की हीरोइन के रूप में ही रही है. ऐसा नहीं था कि उनकी फ़िल्में सफ़ल नहीं हुईं. लेकिन उन्होंने चमक-दमक वाली फ़िल्मों से जान-बूझकर दूरी बनाए रखी.

एक कसक रह गई है

वो कहती हैं, ''उस ज़माने में मुझे हर तरह की फ़िल्में ऑफर हुईं, कॉमर्शियल, बी-ग्रेड और अच्छी फ़िल्में भी. लेकिन मुझे उन फ़िल्मों का माहौल नहीं पसंद आया. मैंने तय किया कि मैं ऑर्ट फ़िल्में ही करूंगी. वही मुझे सूट भी करता था.''

हम भटकते हैं, गुलज़ार कभी नहीं

जन्मदिन के सवाल पर वो कहती हैं, ''जन्मदिन पर अब मैं ज्यादा ताम-झाम नहीं करती. बस कुछ दोस्त घर आ जाते हैं, हम बैठकर बातचीत करते हैं. वो ज़्यादा ज़िद करते हैं तो मोमबत्ती भी जलानी-बुझानी पड़ती है.''

इस साल उन्होंने एक पंजाबी शॉर्ट फ़िल्म में गाना भी गाया है. वो कहती हैं कि गाने का अनुभव अच्छा रहा.

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'चमको' से चमकी किस्मत

दरवाज़े पर घंटी बजती है. खोलने पर सामने एक सेल्स गर्ल हाथ में चमको नाम का डिटर्जेंट पाउडर का डिब्बा लिए खड़ी थी. लड़की का नाम, फ़िल्मी पर्दे पर नेहा राजन और असल ज़िंदगी में दीप्ति नवल. दीप्ति मानती हैं कि उन्हें आज भी 'चश्मे बद्दूर' की अभिनेत्री के तौर पर बेहतर जाना जाता है.

इस फ़िल्म में उनके सहकलाकार फ़ारुख़ शेख दीप्ति के ख़ास दोस्तों में से थे. दोनों ने साथ में 'रंग-बिरंगी', 'किसी से ना कहना', 'कथा' और 'साथ-साथ' जैसी कई फ़िल्मों में काम किया.

फ़ारुख़ मुझे बख़्श दो

दीप्ति कहती हैं, ''फ़ारुख़ शेख़ से मेरी मुलाक़ात फ़िल्म चश्मे बद्दूर से पहले एक या दो बार हुई थी, बॉम्बे दूरदर्शन में. फ़ारुख़ मेरे व्यावसायिक और निजी जीवन का हिस्सा रहे. वो मेरे नज़दीकी दोस्तों में से थे.''

फ़ारुख़ के निधन पर रो पड़ीं दीप्ति नवल

वो कहती हैं, ''वो हमेशा मुझे चिढ़ाते रहते थे. दूसरों को हंसाने के लिए मैं हमेशा उनके निशाने पर रहती थी. ऐसा अंत तक रहा. मैं उनसे कहती थी, अब बुढ़ापा आ गया है अब तुम्हें मुझे परेशान करना बंद कर देना चाहिए. पर उन्होंने ऐसा नहीं किया.''

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'ऐसा नहीं है कि मैं खाली बैठी रहती हूँ'

दीप्ति एक्टिंग का कोई कोर्स किए बिना ही इंडस्ट्री में आई थीं. उन्होंने 1978 में आई अपनी पहली फ़िल्म जुनून से लेकर हाल ही में आई अमरीकी फ़िल्म लॉयन तक क़रीब 70 फ़िल्मों में अभिनय किया. इनमें से कुछ फ़िल्में उनके दिल के बेहद क़रीब हैं.

ज़िंदगी देती है मुझे प्रेरणा

उन्होंने बताया, "अनकही, 'मैं ज़िंदा हूं', 'लीला' और 'मेमोरीज़ इन मार्च' मेरे दिल के बेहद करीब हैं. इन सभी में मुझे मेरे रोल चैलेंजिंग लगे.''

दीप्ति बताती हैं कि 'अनकही' और 'मैं ज़िंदा हूं' में उन्हें अमोल पालेकर और सुधीर मिश्र जैसे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला. उन्होंने कहा कि भले ही ये फ़िल्में उतनी ख़ास न रही हों, लेकिन इन निर्देशकों के साथ काम करने का अनुभव ख़ास रहा.

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आजकल वो बड़े पर्दे पर ज़्यादा नज़र नहीं आतीं. इस सवाल पर दीप्ति कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि मैं खाली बैठी रहती हूँ. साल के छह महीने मैं अमरीका में रह रही अपनी मां के साथ बिताती हूं. बाकी वक़्त में अगर कोई दिलचस्प काम या फ़िल्म हो तो उसमें काम करती हूँ और पेंटिंग करती हूँ."

दीप्ति नवल हाल के दिनों में 'एनएच-10' और 'तेवर' जैसी फ़िल्मों में नज़र आ चुकी हैं.

दीप्ति कहती हैं, ''इस जमाने की हीरोइंस के पास बहुत से विकल्प हैं. लेकिन हमारे पास इतने विकल्प नहीं होते थे."

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