जब बरसों बाद मिलना होता है मां से

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बेहद ग़रीब परिवार से आने वाला पांच साल का सरू एक बार ट्रेन में ऐसा सोया कि उसकी नींद एक हज़ार मील दूर जाकर खुली.

वहां उन्हें एक अनाथालय में जगह मिली. वहां से एक ऑस्ट्रेलियाई दंपति सू और जॉन ब्रायली ने गोद ले लिया. इसके बाद से ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया में सरू के नए जीवन की शुरुआत हुई.

बड़ा होकर उन्होंने अपनी जड़ों की तलाश करने की बात सोची. इसके लिए वो गूगल अर्थ की मदद लेते हैं. हॉलीवुड की फ़िल्म 'लायन' इसी सरू की कहानी है. इस फ़िल्म में देव पटेल और निकोल किडमैन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं.

देव पटेल को ऑस्कर नामांकन

जन्म देने वाली माँ की तस्वीर उनके दिमाग में धुंधली पड़ चुकी थी, लेकिन वो एक लैपटॉप और मज़बूत इरादा लिए अपनी माँ की तलाश में निकल पड़े.

मां की तलाश उनके लिए जुनून बन गई. सालों तक उन्होंने सैटेलाइट तस्वीरों को बहुत ही ध्यान से देखा.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''मैंने अपने गृह कस्बे के लैंडमार्क और आर्किटेक्ट को याद करने के लिए गणित और हर चीज का इस्तेमाल किया.''

एक दिन उन्होंने उसे खोज लिया. उनकी यादों में इस गांव के जंगल, मंदिर, एक छोटे पुल, ईंटों की दीवार और उस झरने का दृश्य रचा-बसा था, जहां वो खेलते थे.

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वो अपनी माँ की यादों में खोए रहते थे. वह उनसे कहना चाहते थे, ''मैं जानता हूं कि आप मेरा रास्ता देख रही हैं. लेकिन मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी आपको देखते हुए काटी है.''

सरू ने अपनी माँ की यादों को किताब 'एक लांग वे होम' के रूप में कलमबद्ध किया.

स्मलडॉग के बाद अब स्लमब्वॉय

लायन ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका में दिखाई जा चुकी है. इस फ़िल्म को कई पुरस्कार मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.

सरू कहते हैं, ''मैंने कभी नहीं सोचा कि इस तरह की कोई चीज आएगी जिसके बाद लोग मुझे पसंद करेंगे. मैं एक शांतचित्त व्यक्ति हूं.''

वो कहते हैं कि लोग इस फ़िल्म से मोहित और सम्मोहित हैं.

सरू अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाते हुए होबर्ट में औद्योगिक मशीनरी बेचते थे. अपनी किताब पूरी करने के बाद सरू ने काम से कुछ समय निकाला. अब उन्होंने फ़िल्म के प्रचार के लिए बहुत ही टाइट शेड्यूल बनाया है. उनकी ज़िंदगी एक बार फिर बदल गई है.

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सरू को गोद लेने वाली मां सू को उम्मीद है कि यह फ़िल्म और लोगों के जीवन में भी बदलाव लाएगी. वो कहती हैं, ''मेरा मानना है कि बहुत से बच्चे हैं जो कि अपने परिवार से मिलना चाहते हैं.''

वो कहती हैं, '' वो युद्ध की वजह से अनाथ हुए हैं और उन्हें कैंपों में छोड़ दिया गया है. ऐसे में गोद लेने का काम तेज हो सकता है.''

फ़िल्म में काम करने वाले कलाकारों ने भारत की सड़कों पर रहने वाले बच्चों की मदद करने के लिए पैसे जुटाने के काम का समर्थन किया है.

निकोल किडमैन कहती हैं कि फ़िल्म में एक गोद लेने वाली माँ के प्यार को देखककर उनकी आंखें भर आई थीं.

ऑस्कर विजेता फ़िल्म 'स्लमडॉग मिलेनियर' में काम करने वाले देव पटेल ने ऑस्ट्रेलियाई लहजा सीखने के लिए, मोटा होने के लिए और बाल बढ़ाने के लिए आठ महीने खर्च किए.

सरू कहते हैं, ''इस फ़िल्म में उनकी लगन कमाल की है.''

सरु बताते हैं कि वो दर्जनों बार भारत जा चुके हैं, लेकिन तस्मानिया अभी भी उनका घर बना हुआ है. वो कहते हैं कि उनका दिल वहीं है, जहां उनका परिवार और दोस्त रहते हैं.

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