लैला नए जमाने की, पर गीत पुराने

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जब सनी लियोनी जैसी लैला किसी से अकेले मिलना चाहे तो किसे इंकार होगा लेकिन इसमें नया क्या है, यही तो ज़ीनत अमान ने भी कहा था कोई 36 साल पहले.

हां, फ़िस्म 'रईस' में सनी जिस गाने पर थिरक रही हैं, उसमें रैप के भी कुछ हिस्से इस्तेमाल किए गए हैं. और 'रईस' ही क्यों?

हाल के दिनों में 'बार बार देखो' के 'काला चश्‍मा' से लेकर शाहरुख खान की 'रईस' की 'लैला और श्रद्धा कपूर और आदित्य रॉय कपूर की फिल्म 'ओके जानू' का गाना 'हम्मा-हम्मा' जैसी लंबी फेहरिस्त है.

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'ओके जानू' का गाना 1995 में रिलीज़ 'बॉम्बे' सी ली गई थी तो शाहरुख खान ने फिरोज खान की फिल्म 'कुर्बानी' के 'लैला' का नया वर्ज़न पेश किया है.

सना खान की फिल्म 'वजह तुम हो' में एक नहीं बल्कि 'दिल में छुपा लूंगा, पल-पल दिल के पास जैसे मशहूर गानों का 'रीक्रिएशन' इस्तेमाल किया गया है.

इससे पहले अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा और जॉन अब्राहम अभिनीत फिल्म 'फोर्स-2' में श्रीदेवी पर फिल्माया गया 'मिस्टर इंडिया' का गाना 'काटे नहीं कटते' को रीमिक्स किया गया.

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इंडियन क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन की बायोपिक अज़हर का गाना 'ओये-ओये' साल के हिट रीमिक्स सॉन्ग में शामिल रहा. जो मूलतः राजीव रॉय की फिल्म 'त्रिदेव' का गाना था.

ऐसे और भी कई उदाहरण हैं. हालांकि ये गाने भले ही हिट लिस्ट में हों, लेकिन कुछ सवाल भी हैं जो इन्हें लेकर खड़े हो रहे हैं.

मसलन जब एक ही फिल्म में तीन-तीन गाने रीमिक्स किए जा रहे हैं, तो इन फिल्मों में संगीतकारों और गीतकारों की आख़िर भूमिका क्या है?

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क्या हिंदी फिल्म म्यूजिक क्रिएटिव क्राइसिस से जूझ रहा है? और सवाल रचनात्मकता का भी है.

रीमिक्स के इस चलन का विरोध करते हुए गीतकार समीर अंजान का कहना है कि हिंदी फ़िल्म संगीत पूरी तरह उल्टी दिशा में घूम रहा है.

वे कहते हैं, "शायद रचनात्मक दीवालियापन के विकल्प के रूप में पुराने गानों के रीमिक्स का उपाय ढूंढा जा रहा है. इन गानों में शब्दों से लेकर धुन तक सबकुछ जादुई है. जब बना-बनाया खाना मिल रहा हो तो कोई मेहनत करने की ज़हमत क्यों उठाये?"

मगर फ़िल्म दस, रा. वन और कसम से जैसी फ़िल्मों के गीतकार पंछी जालौनवी समीर की राय से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

वे कहते हैं,"अगर पुराने अच्छे गानों से युवा पीढी को रुबरू कराया जा रहा है तो इसमें बुरा क्या है? इसे लोकप्रिय पुराने गानों में नयी संजीवनी भरने की कवायद के तौर देखना ज्यादा बेहतर होगा."

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संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी फेम के आनंदजी विरजी शाह मानते हैं कि ये शुद्ध कारोबारी फैसला है. पूंजी के रूप निर्माताओं की तिजोरी पड़े इन गानों से ब्याज़ वसूल किया जा रहा है. सवाल अच्छे-बुरे का है ही नहीं.

वो कहते हैं कि अगर म्यूजिक राइट्स धारक निर्माता इन गानों से और पैसा कमाना चाहे तो हम कर ही क्या सकते हैं.

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हालांकि शाह मानते हैं कि यह दौर है जो जल्द गुज़र जाएगा.

गायक अभिजीत इसे अच्छे गानों को ख़राब करने के चलन के तौर पर देखते हैं.

वो कहते हैं कि जिस तरह पुराने गानों का नया वर्जन पेश किया जा रहा है उससे साफ़ है अब लोगों में सदाबहार गाने की रचना करने की काबिलियत ही नहीं रही. आजकल के गाने कल भुला दिए जाते हैं.

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