कहानी महिला पटकथा लेखिकाओं की

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Image caption अचला नागर और दिलीप कुमार

अचला नागर को कहानियां लिखने का शौक था और उसमें उन्होंने अपनी पहचान भी बना ली थी, लेकिन तभी उन्हें एक ख़त मिला और वो मथुरा से मुंबई जा पहुंचीं.

यह ख़त था मशहूर फ़िल्म डायरेक्टर-प्रोड्यूसर यश चोपड़ा का.

बीबीसी से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ आंखें प्रतिभा पहचानती हैं और इसने 'एक कहानियां लिखने वाली, रेडियो में काम करने वाली महिला को फ़िल्मों में काम करने का चांस दिया.'

स्क्रिप्ट लिखने नहीं आता था तो उन्हें "पांच-पांच सीन लिखकर विज़ुअलाइज़ेशन करना सिखाया गया और फिर मैंने फ़िल्म निकाह लिखी जो सुपर डुपर हिट हुई.

बेहतरीन लेखन के लिए फ़िल्म फ़ेयर का सम्मान मिला. आगे बढ़ना है, अच्छी ज़िंदगी जीना है तो संघर्ष करना पड़ेगा और अच्छा काम करने पर काम मिलता रहता है."

'आख़िर क्यों', 'बाबुल' और 'बाग़बान' जैसी फ़िल्में जिसकी स्क्रिप्ट उन्होंने ही लिखी थी ख़ूब धूम मचाया.

तो क्या लेखन में महिलाओं के लिए फ़िल्म के क्षेत्र में काम मिलना आसान है या उतना ही मुश्किल जितना बॉलीवुड के दूसरे हलक़ों में?

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Image caption अनुराधा तिवारी

'फ़ैशन', 'हीरोइन' और 'यादें' जैसी फ़िल्में लिख (को-स्क्रिप्ट राइटर) चुकी अनुराधा तिवारी कहती हैं कि बॉलीवुड लेखन को महिलाओं का जॉब मानता है.

उन्होंने कहा, ''यह सच है कि पुरुष लेखक ज़्यादा लोकप्रिय हैं, लेकिन महिला लेखक को भी बराबर सम्मान दिया गया है.

अनुराधा कहती हैं, "लेखन को जेंडर से नहीं जोड़ सकते हैं. बॉलीवुड में तब तक संघर्ष करना पड़ेगा जब तक आप बॉलीवुड के सहारे रहेंगे. संघर्ष करना ही है तो बॉलीवुड को अपना दूसरा बिज़नेस मानकर मुंबई आइए न निराशा होगी और न हताशा."

वह बताती हैं, "बॉलीवुड में बाहरी लोगों को अपना पांव जमाने में समय लगता है क्योंकि जमे जमाए लोगों के परिवार में ही मां, बहन, बेटी, पत्नी, लेखक और निर्देशक हैं. फिर किसी बाहरी को क्यों आने दें?"

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Image caption अजय ब्रह्मात्मज

फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, "बॉलीवुड स्ट्रॉंग और इंटेलीजेंट महिलाओं का स्वागत दोनों हाथों से करता है. ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने फ़िल्म प्रोडक्शन से लेकर लेखन और निर्देशन तक में दख़ल रखा है.''

उन्होंने कहा, ''फ़ातिमा बेगम से लेकर देविका रानी, मीना कुमारी, अपर्णा सेन का नाम लिया जाता है. पहले लड़कियां कम थीं लेकिन अब बॉलीवुड में लेखन से लेकर निर्देशन, टेक्नीशियन तक में लड़कियां फ़िल्मी सेट पर ख़ूब दिख रही हैं और सफल हैं."

'वेटिंग' और 'लंदन पेरिस न्यूयॉर्क' सरीखी फ़िल्में लिख चुकीं अनु मेनन का मानना है कि अगर स्क्रिप्ट अच्छी है तो राइटर मेल हो या फ़ीमेल, निर्माता उस पर विश्वास करते हैं.

वो कहती हैं, "मैंने अपनी दोनों ही फ़िल्मों का निर्देशन किया. स्ट्रगल महिला हो या पुरुष तभी तक है जब तक निर्माता को स्टोरी पसंद नहीं आती है."

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Image caption अचला नागर

फ़िल्म लेखन में महिलाएं लंबे समय से हैं और सफल भी हैं.

हनी ईरानी ने बॉलीवुड में क़दम बाल कलाकार के रूप में रखा, फिर उन्होंने फ़िल्म लेखन में हाथ आज़माया और सफल रहीं. 'लम्हे', 'क्या कहना' और 'कहो न प्यार है' ईरानी की सफल फ़िल्मों में शुमार हैं.

लखनऊ की जूही चतुर्वेदी ने दिल्ली में रहते हुए 'विकी डोनर' लिखी, फिर 'ख़ूबसूरत' और उसके बाद 'पीकू'.

रेखा निगम ने 'परीणिता', 'लागा चुनरी में दाग़', उर्मी जुवेकर ने 'ओय लकी लकी ओय' और 'शंघाई' और अनविता दत्त ने 'दोस्ताना', 'हाउसफुल', 'बचना ऐ हसीनों' के डायलॉग और स्क्रीन प्ले लिखे हैं और तारीफ़ बटोरी है.

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