भारतीय तबला वादक संदीप दास ने अपनी जीत के बाद बीबीसी से बात की

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भारतीय तबला वादक संदीप दास को 59वें ग्रैमी अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया. उनको सिल्क रोड एन्सेंबल समूह के साथ बेस्ट ग्लोबल म्यूज़िक के लिए ग्रैमी अवॉर्ड दिया गया.

संदीप ने बीबीसी को अपनी जीत के बाद कहा,"जैसे ही घोषणा हुई कि हमारी एल्बम जीती है तो हम खुशी में खड़े हो गए. हमारा एक साथी तो खुशी में हमारी एल्बम का नाम भूल ही गया और कहा- अरे हमें नहीं मिला."

संदीप दास का जन्म पटना में 1971 में हुआ था. तबले के साथ उनका रिश्ता आठ साल की उम्र में शुरू हुआ. नौ साल की उम्र में तबला गुरु पंडित किशन महाराज के पास बनारस गए. फिर परिवार ही बनारस पहुंच गया. पंडित किशन महाराज के साथ महज़ 15 साल की उम्र में उन्हें स्टेज पर आने का मौका मिल गया वो भी पंडित रविशंकर के साथ.

ग्रैमी विजेता संदीप दास का पटना कनेक्शन

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तबले ने बदली जिंदगी

फिर 2000 में चीनी मूल के अमरीकी संगीतकार यो यो मा से मुलाक़ात ने संदीप की दुनिया बदल डाली.

संदीप बताते हैं, "यो यो मा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ चेलोवादक हैं और 18 ग्रैमी जीत चुके हैं. मेरी उनसे मुलाक़ात हुई 18 साल पहले और उन्होंने मुझे परफ़ॉर्म करने के लिए अमरीका बुलाया."

2003 और 2009 में भी ग्रैमी के लिए संदीप का नामांकन हुआ था पर उन्हें अवॉर्ड नहीं मिला.

संदीप ने अंग्रेज़ी साहित्य में गोल्ड मेडल हासिल किया और इसका श्रेय भी वो तबले को ही देते हैं.

वे कहते हैं,"अगर आप संगीत से जुड़े हैं तो आपके दिमाग़ की भी एक क्रिया होती है इसलिए पढ़ाई में भी अच्छा रहा क्योंकि मैं बहुत कुछ याद कर सकता था."

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संदीप बताते हैं, "पिताजी की वजह से तबले से परिचय हुआ. वे कहते हैं कि हम हिन्दुस्तानी सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान देते हैं लेकिन आर्ट्स, खेल, म्यूज़िक के लिए हम लोग बिल्कुल गंभीर नहीं. हम लोग बस आईआईटी और आईआईएम के बारे में सोचते हैं. मगर हुनर को पनपने नहीं देते. मैं जो कुछ भी हूँ अपने परिवार की वजह से हूँ. हम मध्य वर्ग परिवार से थे फिर भी कभी इस चीज़ को मेरे शौक के आड़े नहीं आने दिया."

मीडिया को फिल्मों से और क्रिकेट से फ़ुरसत नहीं

संदीप भी मानते हैं कि भारत में लोग सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान देते हैं.

वे कहते हैं, "हम लकीर के फ़कीर हैं, हमें सिर्फ़ डॉक्टर इंजीनियर बनना है. पहले तो खेल की तरफ़ भी लोग ध्यान नहीं देते थे क्योंकि लोगों को डर था कि पैसा नहीं मिलेगा. क्रिकेट में बेशक अभी हाल ठीक है लेकिन दूसरे खेल में हाल देखिए, हम ओलंपिक में इतने सालों बाद भी इस बार दो ही मेडल ला पाए."

संदीप बताते हैं कि भारत के बाहर जो बड़े कॉलेज हैं तो वहाँ पढ़ाई के सिवा कविता, खेल और आर्ट्स से जुड़ा कोई हुनर भी होना चाहिए.

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संदीप बताते हैं कि भारतीए मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी ताकि लोगों का ध्यान संगीत, कला और संस्कृति पर जाए, "अब जब ग्रैमी मिला है तो फ़ोन बजने शुरू हैं. कहाँ था भारत का मीडिया पहले? मुझे सालों की मेहनत के बाद ग्रैमी मिला है."

वे कहते हैं, "लानत है कि जब बाहर से ठप्पा मिला तो ध्यान देते हैं. नहीं तो हमारी मीडिया को फिल्मों से और क्रिकेट से फ़ुरसत नही. बाहर देश के अख़बारों में दो पन्ने आर्ट और संस्कृति पर हैं, यहां नहीं"

संदीप दास अब अपने परिवार के साथ अमरीकी शहर बोस्टन में रहते हैं.

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