बिहार के लेनिनग्राद में लाइट्स, कैमरा, ऐक्शन

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बिहार का सिनेमा नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग़ में भोजपुरी सिनेमा आता है. लेकिन अब बिहार के 'लेनिनग्राद' कहे जाने वाले बेगूसराय से सिनेमा की एक दूसरी धारा सामने आ रही है.

बीते तीन साल में यहां लोक कथाओं की कहानियों पर दो हिन्दी फ़िल्में बनी. पहली 'जट जटिन' और दूसरी 'चौहर.'

'जट जटिन' जहां मिथिलांचल की बेहद मशहूर लोकगाथा पर बनी है, वहीं 'चौहर' बिहार के मगध क्षेत्र में मशहूर लोकगाथा 'रेशमा चौहरमल' पर बनी है. ये लोकगाथा रेशमा नाम की भूमिहार जाति की लड़की के चौहरमल नाम के पासवान जाति के लड़के से जबरन प्रेम पाने की कहानी है.

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Image caption भोजपुरी फ़िल्म जट जटिन का एक दृश्य

बता दें वामपंथी विचारधारा का प्रभाव होने की वजह से बेगूसराय को बिहार का 'लेनिनग्राद' कहा जाता है. वामपंथ का प्रभाव तो वक्त के साथ कम होता चला गया, लेकिन सामाजिक बदलाव के तानेबाने में बुनी फ़िल्में यहां बननी शुरू हो गई हैं.

सामाजिक बदलाव का संदेश

इसकी वजह पूछने पर 'जट जटिन' के लेखक और निर्माता अनिल पतंग कहते है, "बेगूसराय में नाट्य आंदोलन 1977 से बहुत मज़बूत हुआ. पटना में आपको नाटक करने के लिए 4-5 ऑडिटोरियम ही हैं, लेकिन बेगूसराय में तो ये 20-25 हैं. इसका प्रभाव फ़िल्मों में भी आपको दिखता है कि जो फ़िल्में बन रही हैं वो गंभीर किस्म की हैं."

गौरतलब है कि साल 2016 में रिलीज़ हुई 'जट जटिन' को इंटरनेशनल न्यूयॉर्क फ़िल्म फ़ेस्टिवल 2016 में मेरिट अवॉर्ड मिला. साथ ही बार्सिलोना फ़िल्म फ़ेस्टिवल, जूम फ़ेस्टिवल, मयामी इंडीपेंडेंट सहित कई अंतरराष्ट्रीय फ़ेस्टिवल में फ़िल्म का प्रदर्शन हो चुका है.

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'जट जटिन' में नकारात्मक और 'चौहर' में लीड रोल निभा रहे अमिय कश्यप कहते हैं, "बेगूसराय को केन्द्र बनाकर लोक कथाओं को सामने ला रहे हैं, ये बात हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि बिहार की शानदार सांस्कृतिक परंपरा रही है. ये वो संस्कृति नहीं है जो भोजपुरी फ़िल्में दिखा रही है."

लोक कथाओं पर है ध्यान

उन्होंने ये भी कहा कि, "अच्छी बात ये है कि आम लोग भी हमारे साथ हैं. 'जट जटिन' बेगूसराय में 70 दिन तक अलका सिनेमा में चली और 'चौहर' का लोगों को बेसब्री से इंतज़ार है जो होली में 12 राज्यों के 600 सिनेमा घरों में एक साथ रिलीज़ हो रही है."

फ़िलहाल बेगूसराय में अलग-अलग भाषाओं की पांच फिल्में बन रही हैं. इससे दो फ़ायदे हुए. पहला तो फ़िल्मों में अभिनय में स्थानीय कलाकारों काम मिल रहा है और दूसरा शहर में छोटे प्रोडक्शन हाउस नुमा स्टूडियो तैयार हो गए है.

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ऐसे ही एक प्रोडक्शन हाउस के मालिक अमन भारती कहते हैं, "फ़िल्में लगातार बनने से एक नया क्रिएटिव वर्ग तैयार हुआ है. ज़ाहिर तौर पर हम तकनीकी तौर पर भी ज़्यादा समृद्ध हुए हैं, हालांकि अभी भी पिक्चर की एडिटिंग और शूटिंग कैमरे के लिए आपको मुंबई का सहारा लेना पड़ता है. लेकिन एक छोटी-मोटी पिक्चर की शूटिंग और एडिटिंग बेगूसराय में हो सकती है."

मुंबई की अब क्या ज़रूरत?

इस बीच मशहूर साहित्यकार राजकमल चौधरी की कहानी पर 'ललका पाग' नाम की मैथिली फ़िल्म भी बनी है.

फिल्म समीक्षक जय मंगल देव इस ट्रेंड पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, "आप देखें तो सिनेमा की ये नई धारा ही बिहारी जनमानस का असली सिनेमा है. बाक़ी जो मुख्यधारा का सिनेमा जिसको हम भोजपुरी सिनेमा कहते हैं, उसका मज़बूत संबंध तो बाज़ार और मुनाफ़े से है."

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Image caption चौहर फ़िल्म का एक दृश्य

लेकिन मैथिली फ़िल्म 'मिथिला मखान' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित और भोजपुरी में छोटी-छोटी फिल्में बनाकर 'नीओ बिहार' नाम का कैंपेन चला रहे फ़िल्मकार नीतिन चन्द्रा इन कोशिशों पर सवाल उठाते हैं.

सवाल भी उठ रहे हैं

वो कहते हैं, "जट जटिन और चौहर को हिन्दी में बनाने से क्या फ़ायदा? हिन्दी फिल्में मुंबई डोमेन की हैं. आप अपनी बोली में फ़िल्म बनाइए तभी आप बोली को समृद्ध और उसका प्रतिनिधित्व करने वाली फ़िल्म बनाएंगे. तभी आप उस रिप्रेजेंटेशन को चुनौती देंगे जो पूरी दुनिया के लिए फ़िलहाल भोजपुरी सिनेमा है. और सही मायने में तो ये भोजपुरी भाषा का सिनेमा भी नहीं है बल्कि सस्ता सेक्स बेचने का माध्यम भर है."

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दिलचस्प है कि इन फ़िल्मों में कलाकार भी भोजपुरी फ़िल्मों के एक सेट पैटर्न से ऊबकर बिहार के सिनेमा की इस नई धारा में जुड़े हैं. अभिनेता अमिय कश्यप के अलावा अभिनेत्री अमर ज्योति ने पहले भोजपुरी फ़िल्मों से शुरुआत की, लेकिन जल्द ही तौबा कर ली.

बकौल अमर ज्योति, "भोजपुरी में प्रोड्यूसर एक तरीके से ऑडियंस के बंधक बने हुए हैं. वो कोई नया प्रयोग या रिस्क नहीं लेना चाहते. नतीजा फ़िल्मों में वही लटका-झटका है. हम बेगूसराय की माटी से कुछ अच्छी फ़िल्में बना रहे हैं. ये फ़िल्में मुनाफ़े में चाहे कमजोर हों, लेकिन ये अभिनय और कहानी के लिहाज़ से बहुत बेहतर होंगी."

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