नेहरू जैसी अंग्रेज़ी नहीं बोलना, लिखना हैः गुलज़ार

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गीतकार, लेखक और निर्देशक गुलज़ार का कहना है कि आज की अंग्रेज़ी वैसी नहीं होनी चाहिए जैसी जवाहरलाल नेहरू लिखते, बोलते थे.

मातृभाषा का स्पर्श बहुत अलग फ्लेवर देता है. मसलन - अरे! काहे को उतावली करते हो... अब इसी बात को कह लीजिए अंग्रेज़ी में!

उनके मुताबिक नई पीढ़ी अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करती है लेकिन वो भारतीयों की मातृ भाषा नहीं बन पाई है और ऐसा होने में एक सदी लगेगी.

वो हाल ही में सुभाष घई के मीडिया इंस्टीट्यूट विसलिंग वुड इंटरनैशनल में पोएट्री पर बातें करने के लिए छात्रों से मुख़ातिब हुए.

इस दौरान बीबीसी से उन्होंने आज की अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा पर बात की. बातचीत के अंश-

आज के भारतीयों के अंग्रेज़ी लेखन पर क्या कहेंगे?

आपको वो अंग्रेज़ी नहीं बोलनी या लिखनी है जो पंडित जवाहर लाल नेहरू या मुल्क़ राज आनंद कहते थे. ये आज की अंग्रेज़ी नहीं है वो भारतीय अंग्रेज़ी नहीं है. भारतीय अंग्रेज़ी वो अंग्रेज़ी है, जो झुंपा लाहिरी लिख रही हैं. इन दिनों तो अंग्रेज़ी मे लिखिए औऱ ख़ूब लिखिए वो हमारी ही भाषा है.

अंग्रेज़ी हमारी भाषा तो बन गई है लेकिन वो अभी भी हमारी मातृभाषा नहीं बनी है.

हां जब अंग्रेज़ी आपकी मातृभाषा बन जाए तो हो सकता है कि उसमें कुछ अलग सा स्वाद निकल कर आए. इस समय को आने में अभी एक सदी लग जाएगी.

'गुलज़ार ना होते तो हम भी ना होते'

पुरानी बातें मुझसे मत कीजिए: गुलज़ार

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आप कहते हैं कि आप नई पीढ़ी से सीखते हैं?

नई पीढ़ी से सीखना एक अच्छी बात है. जिस तरह की नई पीढ़ी से मैं मिला वो बहुत बड़े दिल वाली है. वो लोग मुझे अपना लेते हैं और अपने आप में मिला लेते हैं.

वो मुझे अलग नहीं बैठाते और ना ही ये कहते हैं कि ये तो बहुत बूढ़ा इंसान है. नई पीढ़ी वालों की मेरे साथ अलग ही दोस्ती है.

नई तरह की पोएट्री या काव्य के बारे में क्या कहेंगे?

एक तो वो बड़े नए तरह के हालात में और नए एक्सप्रेशन में लिखी जा रही है जो नई फ़िल्मों में पैदा हो रहे हैं. लेकिन अभी भी इसके विकास की बहुत संभावनाएं हैं.

जो नई पीढ़ी के सामने ज़ुबान आई है वो कच्ची पक्की ज़ुबान है. अभी तक पूरी भाषा उनसे दूर है. आधी से ज़्यादा वो तो अंग्रेज़ी में बातें करते हैं. कोई भी एक जुमला वो किसी एक भाषा में नहीं बोल पाते हैं. तो कहीं ना कहीं आपको अपनी वो ज़मीन और अपना वो आधार तो बनाना पड़ता है. ऐसा नहीं कि हिंदी मे किसी बात के लिए भाव नहीं है.

आज लगभग सभी निर्देशक शहरी माहौल में पले बढ़े हैं तो इसलिए उनके पास जो इज़हार चाहिए वो है नहीं. महानगरों से बाहर चले जाइय़े और देखिए कितनी ख़ूबसूरत हिंदी बोली जाती है.

देहाती कितनी ख़ूबसूरत हिंदी बोलते हैं. आजकल के फ़िल्म निर्देशकों में कमी है वर्ना भाषा का हथियार तो आपके पास होना चाहिए.

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तो क्या हिंदी भाषा कहीं रुक गई है?

नहीं हिंदी भाषा कहीं रुकी नहीं है. बल्कि हम हिंदी को छोड़ते जा रहे हैं. आज शहरों में लोग हिंदी बोलना बंद कर रहे हैं. आज पूरी की पूरी हिंदी स्क्रिप्ट रोमन में लिखी जाती है. आपने हिंदी पढ़ना छोड़ दिया है.

इसमें कौनसे फ़ख्र की बात है अंतर्राष्ट्रीय होने के लिए क्या हम हिंदी को रोमन में लिखें. हिंदी लिखना सीख क्यों नहीं लेते.

सबसे आसान तो हिंदी यानी देवनागरी लिपि ही है. बहुत वैज्ञानिक लिपि है ये. इस दुनिया मे कोई हिंदी जैसी भाषा नहीं बनी है. क्योंकि जो आप बोलते हैं, वही लिखते हैं.

सीयूटी कट और पीयूटी पुट हो जाता है लेकिन ऐसा कुछ भी हिंदी में नहीं होता है.

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बाल साहित्य को लेकर क्या कहेंगे?

बच्चों के लिए कहीं भी नहीं लिखा जा रहा है आज. आपको शायद ये बात तक़लीफ़ दे कि हिंदी शून्य है इस बारे में.

सारा का सारा बाहर से अनुवाद किया जा रहा है या ग्रहण किया जा रहा है. मराठी, बांग्ला और मलयाली भाषा में बाल साहित्य ख़ूब लिखा जाता है. मराठी में तो भरा पड़ा है.

गोपी गाइन (बांग्ला साहित्य) जैसा कोई तो लिख कर दिखाए ना. ये हक़ीक़त है अब इसे मानना तो पड़ेगा.

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