लाइफ़ सपोर्ट साबित होते सपोर्टिंग कलाकार

  • 28 मार्च 2017
'कृति' फिल्म का पोस्टर, मनोज बाजपेई इमेज कॉपीरइट Twitter @BajpayeeManoj

कभी महमूद, जीवन, प्रेमनाथ और प्राण जैसे सपोर्टिंग कलाकारों का रुतबा इतना बड़ा होता था कि सफल से सफल अभिनेता भी इनके साथ फ़िल्में करने से घबराते थे.

फिल्मों का मिज़ाज बदला तो प्रतिभाशाली कलाकार भी मात्र एक्स्ट्रा की भूमिका में बंधकर रह गए.

हीरो ने जब पूरी फिल्म को अपने कंधों पर उठाना शुरू किया तो स्थिति और भी गंभीर हो गई. चरित्र अभिनेताओं की भूमिका केवल हीरो को उनकी हीरोगिरी चमकाने में मदद करने तक ही सीमित होकर रह गई.

यही वजह है कि हीरो से अधिक प्रतिभाशाली होने के बावजूद इन अभिनेताओं को ख़ास तवज्जो नहीं मिली.

'शोले' की परंपरा

हालात इतने बदतर हो गए कि आख़िरी दिनों में महमूद और जॉनी वॉकर जैसे अभिनेता भी कुछ फ्रेम में नजर आने के बाद ग़ायब कर दिए जाने लगे.

शेखर कपूर की फ़िल्म 'बैंडिट क्वीन' और रामगोपाल वर्मा की 'सत्या' ने जी पी सिप्पी की फ़िल्म 'शोले' की परंपरा को फिर से बहाल करने में अहम रोल अदा किया.

'शोले' का हर पात्र अपने आप में हीरो होने की हैसियत रखता है. 'बैंडिट क्वीन' और 'सत्या' ने इस ट्रेंड को फिर से ज़िंदा किया. आज ये ट्रेंड पूरे शबाब पर है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
फ़िल्म समीक्षा: वजह तुम हो

संजय मिश्रा, राजेश शर्मा, सौरभ शुक्ला, विजेंद्र काला और सूरज शर्मा जैसे कलाकारों की उपस्थिति दर्शकों के लिए एक नया रोमांच पैदा कर देती है.

चरित्र अभिनेता

इन दिनों चरित्र अभिनेताओं की लोकप्रियता का आलम ये है कि फिल्मकार इन अभिनेताओं के लिए अलग से रोल गढ़ने लगे हैं, जो लंबाई में भले ही छोटे हों लेकिन कद में हीरो पर भी भारी पड़ते नजर आते हैं.

इस ट्रेंड को लेकर निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा का कहना है, "सपोर्टिंग कलाकार फ़िल्म की वो नींव होते हैं जिसपर हीरो अपने सपनों का महल खड़ा करता है. नींव जितनी मजबूत होगी निर्माण भी उतना ही मजबूत होगा."

सपोर्टिंग कलाकार अब महज़ खानापूर्ति की चीज नहीं हैं बल्कि ये फिल्मों के लिए लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की तरह साबित हो रहे हैं.

निर्माता अब भी लटका कर रखते हैं: तापसी

'कटप्पा के होते बाहुबली को कोई नहीं मार सकता'

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
जॉली एलएलबी हाज़िर हो!

छोटा रोल

पिछले दिनों रिलीज़ हुई फ़िल्म 'जॉली एलएलबी' में अक्षय की एक्टिंग को दर्शक भले ही ज्यादा दिनों तक याद ना रख पाए लेकिन जज बने सौरभ शुक्ला और वकील बने अनु कपूर दर्शकों के दिमाग में लंबे समय तक बने रहेंगे.

संजय मिश्रा हमेशा अपने छोटे से रोल के बावजूद पूरे कैनवास पर छा जाते हैं.

मैं कंगना का कायल हूं: मनोज बाजपेई

बॉलीवुड के सितारों की महफ़िल

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
फ़िल्म रिव्यू : 'फिल्लौरी' और 'अनारकली ऑफ़ आरा'

'जब वी मेट' में टैक्सी चालक के रोल में विजेंद्र काला ने इतने दमदार तरीके से निभाया कि लोग आज भी उन्हें याद कर मुस्कुरा जरूर देते हैं.

अलग पहचान

आज हर तीसरी फिल्म में उनकी मौजूदगी अनिवार्य सी हो गई है. 'बजरंगी भाई जान', 'इश्किया' और 'एम एस धोनी' जैसी कई फिल्मों के जरिए राजेश शर्मा अब अपनी अलग पहचान बना चुके हैं.

'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' में सोमदत्त बने साहिल वैद्य को वरुण धवन से ज्यादा प्रशंसा मिली. अनुष्का शर्मा की फिल्म 'फिल्लौरी' में अनुष्का से ज्यादा चर्चा सूरज शर्मा की हो रही है.

'लाइफ़ ऑफ पाइ' से लाइमलाइट में आए सूरज शर्मा 'फिल्लौरी' का अतिरिक्त आकर्षण हैं, जबकि हीरो के रोल में दिलजीत दोसांझ हैं.

मौका चाहिए

इन सपोर्टिंग कलाकारों को लेकर निर्देशकों की अतिरिक्त मेहनत साफ़ दिखाई देती है.

इसकी वजह बताते हुए अभिनेता मनोज बाजपेई कहते हैं कि, "फिल्मकारों की सोच अब बदली है. पहले स्टार्स के लिए फ़िल्में बनती थी और बाकी कलाकार जोकर की तरह उनके आस-पास मंडराते नजर आते थे. अब कहानी खुद तय करती है कि किस कलाकार को कितनी अहमियत मिलनी चाहिए. प्रतिभा को तो बस मौक़ा चाहिए."

बॉलीवुड में लड़कियां: ये दिल मांगे मोर!

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
फ़िल्म रिव्यू: ओके जानू और हरामखोर

सपोर्टिंग रोल्स के ज़रिए ही बॉलीवुड पर छाए नवाजुद्दीन सिद्दीकी के मुताबिक़, "सोच सिर्फ निर्देशकों की ही नहीं बल्कि अभिनेताओं की भी बदली है. पहले बड़े कलाकारों पर सपोर्टिंग कलाकारों के रोल्स कटवाने या हटाने के तोहमत लगते थे, जबकि आज बड़े स्टार्स ऐसे कलाकारों के लिए खास तौर पर पैरवी करते हैं. सलमान खान और शाहरुख खान जैसे स्टार्स की सोच का ही नतीजा है कि कई बार खुद उनके रोल्स को बढ़या गया है."

ये नवाजुद्दीन सिद्दीकी की विनम्रता हो सकती है, लेकिन हकीकत ये भी है कि इन कलाकारों ने अपने दमदार अभिनय से वो रुतबा हासिल कर लिया है कि उनकी उपस्थिति फ़िल्मों के लिए एक मजबूरी-सी बन गई है.

हीरो का किरदार कितना भी मज़बूत क्यों ना हो आख़िर अकेला चना हमेशा तो भाड़ नहीं फोड़ सकता.. !

'हिंदू भी फ़र्स्ट क्लास पाकिस्तानी नागरिक बने!'

करण तुम अपनी बेटी को हर कार्ड देना: कंगना

'इंडस्ट्री में हर किसी को खुश रखना मुश्किल'

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)