मुफ्त का चस्का लगा है तो कैसे बढ़ेगा रंगमंच: ओम कटारे

  • 27 मार्च 2017
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सोमवार को वर्ल्ड थिएटर डे मनाया जा रहा है. 27 मार्च 1961 से दुनियाभर में वर्ल्ड थिएटर डे मनाया जाता है.

ऐसे में रंगमंच यानी थिएटर से जुड़े लोगों का मानना है कि इस माध्यम को सफल और प्रभावशाली बनाने के लिए ज़रूरी है कि सरकार इसे इंडस्ट्री का दर्जा दे और लोग इसे पेशेवर नज़रिए से देखे.

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1979 में थिएटर ग्रुप 'यात्री' की स्थापना करने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी ओम कटारे कहते हैं कि थिएटर को लेकर लोगों की सोच बदली है, ख़ासकर मुंबई जैसे बड़े शहरों में.

कटारे कहते हैं, "मुंबई जैसे बड़े शहरों में बदलाव दिख रहा है. लोग 1000 रुपए या इससे महंगा टिकट ख़रीदकर नाटक देखने आ रहे हैं. दूसरे शहरों या राज्यों में क्या परिस्थिति है मुझे पता नहीं."

कटारे मानते हैं कि लोगों के थिएटर देखने के नज़रिए मैं बदलाव लाना होगा.

थिएटर संग 'साग मीट' का लुत्फ़

कटारे कहते हैं, "आज भी लोगों को थिएटर मुफ्त मैं देखने की आदत है और काफी हद तक इसमें सरकार का दोष है, क्योंकि अधिकतर सरकारी संगठन नाटकों का प्रदर्शन लोगों के लिए मुफ्त रखते हैं, इससे लोगों को आदत हो गई है. ये आदत सबसे पहले तोड़नी होगी और इसमें सरकार को अपना योगदान करना होगा."

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कटारे आगे कहते हैं, "सरकार को और लोगों को इस बात का एहसास दिलाना होगा कि थिएटर एक पेशेवर सेटअप है और इसमें एक्सपर्ट्स और प्रोफ़ेशनल लोग शामिल होते हैं."

उन्होंने कहा कि अगर थिएटर को सफलता की छोटी पर ले जाना है तो सरकार को इसे इंडस्ट्री का दर्जा देना पड़ेगा. स्कूल और कॉलेज में जिस तरह गणित, साइंस जैसे विषय सिखाए जाते हैं वैसे ही थिएटर सिखाने की व्यवस्था भी होनी चाहिए.

कटारे के मुताबिक मुंबई स्थित पृथ्वी थिएटर अपने आप में सफलता की एक मिसाल है. इसी तरह के और थिएटर ग्रुप बनाने चाहिए उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए.

ऐक्टर, डायरेक्टर और लेखक मंजुल भारद्वाज का कहना है कि भारत में थिएटर ग्लोबलाइज़ेशन का शिकार हुआ है.

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भारद्वाज कहते हैं, "कोई रणनीति नहीं है जिसके ज़रिए इस समस्या को सुलझाया जा सके. आप बिकोगे तो दिखोगे, ये सोच हो गई है. जबकि थिएटर एक ऐसा माध्यम है जिसमें संवाद होता है."

भारद्वाज के मुताबिक ये हालात कम से कम और 10-15 साल तक तो नहीं बदलेंगे.

भारद्वाज कहते हैं, "लेकिन उम्मीद की किरण बाकी है. नई पीढ़ी तैयार है इसे सुधारने के लिए."

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