मुंबई की दीवारों पर टंगे हैं अमिताभ और राजेश खन्ना

  • 5 अप्रैल 2017
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मुंबई के बांद्रा इलाके की कुछ गलियाँ ऐसी हैं जहां दीवारों पर बॉलीवुड बसता है.

बांद्रा की इन गलियों को फिल्मी करने का श्रेय जाता है रंजीत दहिया को जो नौ साल पहले सोनीपत से मुंबई आकर बस गए.

बचपन से ही फ़िल्मी चित्र बनाने का शौक रखते रंजीत ने साल 2013 मे हिन्दी सिनेमा के 100 साल पूरा होने का जश्न मनाने के लिए अपने इलाके की कई दीवारों पर बड़े-बड़े फ़िल्मी चित्र बनाए.

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साल 2012 में सलीम-अनारकली और मधुबाला की तस्वीर से इसकी शुरुआत हुई.

रंजीत बताते हैं, "मुझे लगा हिन्दी सिनेमा को सौ साल हो रहे है. मुंबई में हर कोई बॉलीवुड का दीवाना है तो क्यों ना इस शहर को यहाँ की पहचान से सेलीब्रेट किया जाए, इसलिए मैंने बड़ी-बड़ी दीवारों पर बड़े-बड़े चित्र बनाने की शुरुआत की."

अपने घर के बाहर मधुबाला का चित्र बनाने की मंजूरी देने वाली रखेल परेडा को आज भी याद है कि किस तरह रंजीत ने दिन-रात एक कर ये चित्र बनाया था, "मुझसे जब रंजीत मंजूरी लेने आए तो हिचक केवल इस बात की थी कि कहीं कुछ अश्लील या फिर राजनीति से जुड़ा ना हो.. जब उन्होंने कहा कि बॉलीवुड की तस्वीर है. हम सबको बॉलीवुड पसंद है. मैंने तुरंत हाँ कर दी. अब तो मेरे घर के बाहर सुबह-सुबह ही लोग आ जाते हैं. वेडिंग शूट के लिए, तो कई बार विदेशी आते हैं मधुबाला के साथ फोटो खिंचवाने के लिए."

कौन तय करे राजेश खन्ना बेहतर या नसीर?

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बांद्रा बैन्डस्टैंड पर रंजीत की बनाई अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की तस्वीर भी लोगों को बेहद पसंद है.

रंजीत बताते हैं, "मैं तस्वीर बना ही रहा था कि मुझे राजेश खन्ना के गुजर जाने के बारे में पता चला. मुझे लगा कि उनको श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी तस्वीर ज़रूर बनानी चाहिए. वो हिन्दी सिनेमा के पहले सुपर स्टार थे. उनकी तस्वीर के बिना मेरा काम अधूरा रहता."

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रंजीत के लिए यहाँ तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था. 10वीं पास कर रंजीत 1997 में पेट भरने के लिए सोनीपत में गाय-भैंस चराने का काम करते थे.

इसके अलावा वो 40 रुपये दिहाड़ी पर पुताई का काम भी किया करते थे.

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Image caption दादा साहब फाल्के की पेंटिंग

एक दिन रंजीत को स्कूल में ही पुताई के दौरान सरस्वती माँ का चित्र बनाने का मौका मिला.

"मेरे बनाए चित्र को देखकर हर कोई हैरान रह गया. मुझे भी लगा कि मैं पेंटर नहीं मैं तो कलाकार हूँ. उसी दौरान किसी ने मुझे फाइन आर्ट के बारे में बताया. मैंने मन बना लिया कि अब मुझे इसी दिशा में आगे बढ़ना है."

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चार साल फ़ाइन आर्ट और फिर चार साल अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइनिंग में कोर्स करने वाले रंजीत दुकानों के नाम, हाइवे पर पेंटिंग और दिल्ली सरकार के सोशल मैसेज लिखने के छोटे मोटे काम सोनीपत और पानीपत में करते रहे.

एक दिन अचानक मुंबई की कम्पनी से साल 2008 में नौकरी के लिए फोन आया.

यहाँ आने के बाद उनका सामना पहली बार स्ट्रीट पेंटिंग जैसी चीज से हुआ.

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रंजीत को लगता है कि दीवारों पर पेंटिंग बनाने से ज्यादा मुश्किल है लोगों को मनाना.

वो बताते हैं, "10 में से आठ बार मुझे न सुनना पड़ता हैं, लेकिन एक बार मुझे अगर कोई दीवार पसंद आ जाती है तो मैं भी हठी हो जाता हूँ और पीछे पड़ जाता हूँ. आज लोग मुझे जान गए हैं तो आसानी से मान जाते हैं. पहले ऐसा नहीं था."

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रंजीत का मानना है कि वो अपने इस पैशन को प्रोफेशन मे तब्दील नहीं करना चाहते है.

वो कहते हैं, "लोग मुझे पैसे देकर काम कराएंगे तो दबाव मे आकर उनकी पसंद से तस्वीरें बनानी पड़ेगी. जो मुझे पसंद नहीं. मैं अंधेरी इलाके में भी तस्वीरें बनाना चाहता हूँ. वहाँ बहुत फिल्मी कलाकार रहते हैं, लेकिन रोज का 200 रुपया देना और जाकर वहाँ दीवार ढूंढना मेरे लिए मुश्किल हैं. इतना पैसा नहीं मेरे पास."

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Image caption अमिताभ बच्चन के साथ रंजीत दहिया

रंजीत का सपना है कि वो पूरी मुम्बई की दीवारों को ही फिल्मी रंग में रंग दें. लेकिन पैसे की कमी उनके हाथ बांध देती हैं. राज कपूर, हेलन, किशोर कुमार जैसे और भी ऐसे कलाकार है जिनको वो अपने ब्रश और रंगों से मुंबई की दीवारों पर ज़िन्दा कर देना चाहते हैं.

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