शास्त्रीय और लोक संगीत की जुगलबंदी का चेहरा: एसडी बर्मन

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हिन्दी फ़िल्म संगीत में सचिन देव बर्मन का योगदान. ख़ास सिरीज़ की तीसरी कड़ी.

हिन्दी फ़िल्म संगीत में पिछली सदी का साठ का दशक त्रिपुरा राजपरिवार के वंशज सचिन देव बर्मन के कारण भी बिल्कुल मौलिक ढंग से अपनी सांगीतिक पहचान के लिए जाना जाता है.

वे एक ऐसे बड़े कलाकार के रूप में आज हमारे सामने मौजूद हैं, जिनमें कई परतों वाली प्रतिभा मौजूद थी. उन्होंने शास्त्रीय और लोक संगीत के बीच बड़े सुंदर ढंग से पश्चिमी आर्केस्ट्रेशन को शामिल करते हुए एक नया ही संगीत रचा था.

यह बर्मन दादा की ख़ासियत मानी जाती है कि उन्होंने फ़िल्म संगीत में अपनी धुनों से एक 'बर्मन युग' की शुरुआत की. उनकी धुनें एक तरफ बंगाल के भक्ति संकीर्तन और भटियाली लोकधुनों से उठकर आती थीं.

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दूसरी ओर उनका संगीतकार बाउल संगीत और रवीन्द्र संगीत के धरातल पर अपनी कारीगरी बुनता था. वे अपने बचपन में राजपरिवार के दो मुख्य परिचायकों माधव और अनवर से अकसर धर्मग्रंथों का सस्वर पाठ सुना करते थे.

पूजा के वक्त माधव सुबह हर दिन रामचरितमानस की चौपाईयाँ चुनकर गाता था. यही वह समय रहा, जब युवा सचिन देव का मन बंगाल के भक्ति संगीत और लोकधुनों में रमने लगा था.

एक समय वे काज़ी नज़रुल इस्लाम के साथ वर्षों तक सम्पर्क में रहे थे. इस कारण उनका झुकाव नज़रुल गीति की ओर भी चला गया.

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सचिन देव बर्मन को अपने समय के मशहूर उस्तादों, गायकों और वादकों से संगीत की तालीम मिली थी. इनमें उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान, उस्ताद बादल ख़ान, भीष्मदेव चटर्जी और के. सी. डे प्रमुख हैं.

के. सी. डे मशहूर पार्श्वगायक मन्ना डे के भी गुरु रहे और रिश्ते में उनके चाचा थे. बचपन के माहौल में अनायास मिले भक्ति संगीत के संस्कार और सुधी गुरुओं से मिली हुई तालीम का असर रहा कि एस. डी. बर्मन का संगीत कई स्तरों पर जाकर अपना स्वरुप विकसित कर सका.

एक तरफ भटियाली की सहज लोकव्याप्ति मिलती है, तो दूसरी ओर शास्त्रीय रागदारी की भावमयी व्यंजना. तीसरी तरफ आर्केस्ट्रेशन के प्रयोगधर्मी उपयोग से धुनों में सदाबहार ढंग से युवापन नज़र आता है.

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यह भी देखना मज़ेदार है कि साठ के दशक के मध्य से उनके सहयोगी बने उनके पुत्र आर. डी. बर्मन का हुनर भी, एस. डी. के संगीत में परंपरा बनाम आधुनिकता का विमर्श लेकर सामने आता है.

आप भटियाली सुरों में एस. डी. बर्मन के साथ डूबना चाहें, तो 'बन्दिनी', 'सुजाता', 'गाईड' और 'आराधना' के उनके खुद के गाये गीतों को सुनना चाहिए.

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Image caption इस तस्वीर में साहिर लुधियानवी और एस डी बर्मन एक साथ दिखाई दे रहे हैं.

रवीन्द्र संगीत की छाया के लिए 'अभिमान' का गीत 'तेरे मेरे मिलन की यह रैना' याद आता है.

रागदारी की सुंदरता के लिए 'सैयां बेईमान' (गाइड), 'पवन दीवानी न माने उड़ावे मोरा घुंघटा' (डा. विद्या), 'घायल हिरनिया मैं बन-बन डोलूं' (मुनीम जी) और 'जैसे राधा ने माला जपी श्याम की' (तेरे मेरे सपने) आदर्श उदाहरण की तरह उभरते हैं.

पश्चिमी वाद्यों के सहमेल से विकसित सदाबहार धुनों के लिए 'यह दिल न होता बेचारा' (ज्वेल थीफ) 'कोरा कागज़ था ये मन मेरा' (आराधना), 'ये दिल दीवाना है' (इश्क़ पर जोर नहीं) और 'गाता रहे मेरा दिल' (गाइड) को याद किया जा सकता है.

लोक संगीत की सबसे मनोहारी छाया लिए हुए जो गीत सामने आते हैं, उनमें 'अब के बरस भेज भैया को बाबुल' (बन्दिनी), 'अल्लाह मेघ दे पानी दे' (गाइड) और 'नज़र लागी राजा तोरे बंगले पे' (काला पानी) शामिल हैं.

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आशय यह है कि एस. डी. बर्मन का विविधता-भरा संगीत कई स्तरों पर गंभीर बहस की माँग करता है.

(फिल्मी दुनिया के महान संगीतकारों के बारे में बीबीसी हिंदी की 'संग संग गुनगुनाओगे' सिरीज़ की तीसरी कड़ी एस.डी. बर्मन को समर्पित है.)

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