आज मैं हीरोइन होती तो शायद सफल ना होती: आशा पारेख

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भारतीय सिनेमा में साठ के दशक की 'गोल्डन जुबली गर्ल' आशा पारेख की आत्मकथा 'द हिट गर्ल' का विमोचन सलमान ख़ान सोमवार को मुंबई में करेंगे.

इस किताब के बहाने आशा पारेख ने बीबीसी से ख़ास बातचीत की जिसमें उन्होंने अपनी ज़िंदगी के सुनहरे पलों को याद किया.

आशा पारेख सम्मान की हक़दार

डॉक्टर बनना चाहती थी आशा पारेख

मध्यम वर्गीय परिवार से संबध रखने वाली आशा पारेख को नृत्य का शौक था. कम उम्र में ही वो मंच पर नृत्य का प्रदर्शन किया करती थीं. निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें देखा और बतौर बाल कलाकार फ़िल्मों में काम करने का प्रस्ताव रखा.

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बतौर बाल कलाकार कुछ फ़िल्मों में काम करने के बाद आशा पारेख ने फ़िल्मों को विराम दिया और 16 साल की उम्र में निर्माता निर्देशक विजय भट्ट के आग्रह पर 'गूंज उठी शहनाई' फ़िल्म का प्रस्ताव स्वीकार किया.

आशा पारेख ने विजय भट्ट के साथ बतौर बाल कलाकार 'श्री चैतन्य महाप्रभु' फ़िल्म में काम क्या था. पर तीन दिन की शूटिंग के बाद विजय भट्ट ने आशा पारेख से कहा कि वो 'स्टार मटेरियल' नहीं है जिससे उन्हें बड़ी निराशा हुई.

दिल देके देखो से बदली किस्मत

लेकिन एक ही हफ्ते में उन्हें शम्मी कपूर के साथ फ़िल्म 'दिल देके देखो' में बतौर अभिनेत्री काम करने का मौका मिला. आशा पारेख बताती हैं, "दिल देके देखो की आउटडोर शूटिंग में शम्मी जी की पत्नी गीता बाली जी भी आई हुई थीं. वो मुझे कंधे पर बिठा कर घुमाती थीं और शम्मी जी से कहा करती थी कि हम आशा को गोद ले लेते है. तबसे मैं उन्हें चाचा-चाची पुकारने लगी. शम्मी जी बहुत ही हँसमुख स्वभाव के थे. उनके साथ काम करना हमेशा ख़ास रहता था."

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अपने सफल दौर में आशा पारेख ने सभी बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया जिसमें शामिल है देव आनंद, राजेश खन्ना, शशि कपूर, जीतेन्द्र, मनोज कुमार, पर उन्हें अफ़सोस है कि वो दिलीप कुमार के साथ काम नहीं कर पाई.

उन्हें "ज़बरदस्त" फ़िल्म में दिलीप साहब के साथ काम करने का मौका मिला पर चार दिन की शूटिंग के बाद फ़िल्म ही बंद हो गई. आशा पारेख को इसका आज भी मलाल है.

अपने फैन से जुड़े किस्सों का ज़िक्र करते हुए आशा पारेख ने एक चीनी फैन का मज़ाकिया किस्सा बताया, "एक चीनी फैन मेरे घर के सामने अपना डेरा जमाकर बैठ गया. वो वहां से हटने का नाम ही नहीं ले रहा था. मैं बहुत घबरा गई थी. मैंने पुलिस को फ़ोन लगाया और उस फैन को जेल में बंद करवाया.''

जब लिया संन्यास का फ़ैसला

70 के दशक में नई अभिनेत्रियों के आ जाने के बाद आशा पारेख सह कलाकार की भूमिका में नज़र आने लगीं जिसका उन्हें कोई दुःख नहीं है पर जब फ़िल्म के स्टार फ़िल्मी सेट पर 8-9 घंटे देर से पहुँचने लगे तो आशा पारेख ने तय किया कि वो अभिनय से संन्यास ले लेंगी.

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आशा पारेख 60 के दशक की फ़िल्मों के दौर को सुनहरा दौर मानती हैं और उन्हें दुःख है कि आज के दौर के संगीत और नृत्य में पश्चिमी सभ्यता का बहुत प्रभाव है और भारतीयता कहीं न कहीं खोती जा रही है. उनका ये भी मानना है कि आज के दौर की कई फ़िल्मों में आत्मा नहीं होती है.

मौजूदा अभिनेत्रियों के काम से आशा पारेख बहुत प्रभावित हैं. वो कहती है, "आज की अभिनेत्रियाँ बहुत मेहनत करती हैं. मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में वो कैसे अपने आप को संभालती होंगी. अगर आज मैं अभिनेत्री होती तो शायद इतनी सफल न हो पाती जितना उस दौर में हुई."

आशा पारेख को दुःख है कि आज की अभिनेत्रियाँ साड़ी-सलवार कमीज़ को भूल गई है और सिर्फ़ गाउन में नज़र आती है.

एक समय डॉक्टर बनने की चाह रखने वाली आशा पारेख अब मुंबई में एक अस्पताल से जुडी हुई हैं. अस्पताल के काम के साथ साथ अब उनकी दिनचर्या में सह अभिनेत्रियां वहीदा रहमान, हेलेन, शम्मी आंटी और सायरा बानो के साथ वक़्त बिताना शामिल है.

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