'मंटो बहुत शराब पीते थे और अश्लील कहानियां लिखते थे'

  • 25 अप्रैल 2017
इमेज कॉपीरइट NANDITA DAS

मंटो ने अपने बारे में कहा था, "मैं चलता-फिरता बंबई हूं!"

मंटो ने लाहौर में किसी साहित्यिक महफ़िल में 28 अक्तूबर 1951 को ये बात कही थी, यानी बंबई छोड़ने के लगभग पौने चार साल बाद. मंटों को बंबई से बेहद लगाव था और इसकी कई वजहें थीं.

उनमें से एक वजह शायद ये थी कि मंटो को फ़िल्मी सितारे अशोक कुमार और श्याम जैसे दोस्त बंबई में ही मिले थे. मंटो ने अपनी ज़िंदगी के 12 साल बंबई में ही बिताए थे.

1936 में अपने दोस्त नज़ीर लुधियानवी के निमंत्रण पर उन्होंने बंबई में साप्ताहिक 'मुसव्विर' के संपादक का पद संभाल लिया, लेकिन लगभग पांच साल अख़बार में रहने के बाद 1941 में मंटो ऑल इंडिया रेडियो दिल्ली के नाटक विभाग में आ गए जहां उन्होंने डेढ़ साल में 100 रेडियो नाटक लिखे.

सआदत मर जाए, मंटो ज़िंदा रहे

'मंटो की मंटोयियत को ला रहा हूं खुद में'

अगस्त 1942 में मंटो फिर बंबई आ गए और फ़िल्मिस्तान से जुड़ गए. यहां उनकी मुलाक़ात अशोक कुमार से हुई जो बाद में दोस्ती में बदल गई.

अशोक कुमार से दोस्ती

फ़िल्मिस्तान के लिए मंटो ने कई कहानियां लिखीं, मंटो ने एक फ़िल्म 'आठ दिन' लिखी जिसे अशोक कुमार ने प्रोड्यूस और डायरेक्ट किया था. इस फ़िल्म में मंटो ने एक रिटायर्ड फ़ौजी कृपाराम की भूमिका भी निभाई थी.

मंटो को कई और कंपनियों से अच्छे ऑफ़र आ रहे थे, लेकिन अशोक कुमार से दोस्ती की वजह से वो फ़िल्मिस्तान नहीं छोड़ सके. बॉम्बे टॉकिज़ की मालकिन देविका रानी ने रूसी चित्रकार रोएरिख़ से शादी कर ली और फ़िल्म जगत से संन्यास ले लिया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अशोक कुमार को बॉम्बे टॉकिज़ से लगाव था, लिहाज़ा वो फ़िल्मिस्तान छोड़कर बॉम्बे टॉकिज़ आ गए और उनके साथ मंटो भी बॉम्बे टॉकिज़ आ गए.

बक़ौल मंटो, ''अशोक कुमार को उर्दू बहुत अच्छी लगती थी.'' शुरू-शुरू में अशोक कुमार ने इस ज़ुबान में लिखना-पढ़ना शुरू किया, लेकिन क़ायदे से आगे नहीं बढ़ पाए.

मंटो लिखते हैं कि बंटवारे के बाद जब वो बॉम्बे टॉकिज़ से चले गए तो अशोक ने मंटो को उर्दू में एक ख़त लिखा कि वापस आ जाओ, लेकिन अफ़सोस है कि मंटो उस ख़त का जबाव न दे सके.

साफ़िया का हाथ पकड़ना

मंटो ने अपनी किताब 'स्टार्स फ़्रॉम अनदर स्काई' में अशोक कुमार पर पूरा एक चैप्टर लिखा है. मंटो ख़ुद लिखते हैं कि उनकी बीवी अशोक कुमार की बहुत बड़ी फ़ैन थी.

वो कहते हैं, ''एक दिन मैं अशोक को अपने घर ले आया- कमरे में दाख़िल होते ही मैंने ज़ोर से आवाज़ दी - साफ़िया आओ अशोक कुमार आया है. मैंने अशोक से उसका तआरुफ़ कराया - यह मेरी बीवी है दादा मुनि...हाथ मिलाओ इससे.''

साफ़िया और अशोक दोनों झेंप गए- मैंने अशोक का हाथ पकड़ लिया:- हाथ मिलाओ दादा मुनि....शरमाते क्यों हो. मजबूरन उसे हाथ मिलाना पड़ा.

"अशोक से जब मेरे मरासिम बढ़ गए तो उसने मुझे मजबूर किया कि मैं उसे दादा मुनि कहा करूं, लेकिन मैंने उससे कहा की तुम मुझसे बड़े कैसे हुए हिसाब कर लो, मैं तुमसे उम्र में बड़ा हूं. हिसाब किया गया तो वह मुझसे उम्र में दो माह और कुछ दिन बड़ा निकला. चुनांचे अशोक और मिस्टर गांगुली के बजाए मुझे उसे दादा मुनि कहना पड़ा."

"यह मुझे पसंद भी था क्योंकि उसमें बंगालियों की महबूब मिठाई रसगुल्ले की मिठास और गोलाई थी. वह पहले मुझे मिस्टर मंटो कहता था. जब उससे दादा मुनि कहने का तय हुआ तो वह मुझे सिर्फ़ मंटो कहने लगा हलांकि मुझे यह नापसंद था."

मंटो के पाकिस्तान जाने का वाक़या भी अशोक कुमार से जुड़ा है. उन दिनों बंबई में दंगे ज़ोरों पर थे. एक दिन मंटो और अशोक बॉम्बे टॉकिज़ से घर वापस आ रहे थे, रास्ते में मंटो अशोक के घर काफ़ी देर बैठे रहे.

अशोक कुमार को कुछ हो गया तो

"शाम को अशोक कुमार ने कहा, चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आता हूं. अशोक कुमार ने शॉर्टकट रास्ता लिया और एक मुस्लिम मुहल्ले में आ गए. सामने से एक बारात आ रही थी. बैंड की आवाज़ सुनकर मेरे होश उड़ गए मैंने अशोक का हाथ पकड़कर चिल्लाया दादा मुनि तुम किधर आ निकले."

"अशोक मेरा मतलब समझ गया और उसने मुस्कुराकर कहा 'कोई फ़िक्र ना करो मंटो'. मुझे लग रहा था कि अगर अशोक कुमार को कुछ हो गया तो मुझे ज़िंदगी भर ये मलाल रहेगा ये मेरी वजह से हुआ."

मंटो आगे कहते हैं, ''जब मोटर बारात के जुलूस के पास पहुंची तो लोगों ने चिल्लाना शुरू किया 'अशोक कुमार-अशोक कुमार'. मैं तो बुरी तरह डर गया. दो नौजवानों ने आगे बढ़कर कहा, अशोक भाई आगे रास्ता नहीं मिलेगा. इधर बाज़ू की गली से चले जाओ. मोटर जब उस मुहल्ले से निकली तो मेरी जान में जान आई. मैंने अल्लाह का शुक्र अदा किया, तो अशोक कुमार हंसे और कहा कि तुम ख़ामख़ा घबरा गए, आर्टिस्ट को ये लोग कुछ नहीं करते."

मंटो बॉम्बे टॉकिज़ में काम करते रहे, लेकिन उनका वहां दिल नहीं लग रहा था. मंटो लिखते हैं, "मेरे सब्र का बांध तब टूट गया जब बॉम्बे टॉकिज़ ने कमाल अमरोही की कहानी 'महल' और इस्मत चुग़ताई की कहानी 'ज़िद्दी' पर फ़िल्मों का एलान किया. मैंने बहुत ग़ौर किया, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया.''

मंटो आगे लिखते हैं, "आख़िर मैंने अपने आप से कहा- मंटो भाई, आगे रास्ता नहीं मिलेगा...मोटर रोक लो. इधर बाजू की गली से चले जाओ. और मैं चुपचाप बाजू की गली से पाकिस्तान चला आया.''

वर्षों पूर्व मैंने दूरदर्शन के लिए अशोक कुमार का इंटरव्यू रिकॉर्ड किया था जिसमें अशोक कुमार से मंटो के बारे में जानकारी हासिल करनी चाही. लेकिन अशोक कुमार मंटो को पहचान ही नहीं पाए और बॉम्बे टॉकिज़ की याद दिलाने पर इतना कहा कि 'वो शराब बहुत पीते थे और अश्लील कहानियां लिखते थे.'

( दूरदर्शन में दशकों तक प्रोड्यूसर रहे शरद दत्त मंटो के रचना संचयन का संपादन कर चुके हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)