अमिताभ बच्चन ने कुछ ऐसे याद किया विनोद खन्ना को

विनोद खन्ना

अभिनेता और भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे विनोद खन्ना ने 'रेशमा और शेरा', 'मुकद्दर का सिंकदर', 'परवरिश', 'खून-पसीना' और 'अमर अकबर एंथनी' जैसी यादगार फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन के साथ काम किया था. विनोद खन्ना के निधन के बाद अमिताभ बच्चन ने उनके साथ अपनी 48 साल की दोस्ती को अपने ब्लॉग पर याद किया है.

इमेज कॉपीरइट PTI

अचल... स्थिर... अनंतकाल के लिए बंद आंखें... लकड़ियों के गट्ठर पर... ढके हुए... आग की लपटों का घेरा.. और एक जीवन राख में तब्दील हो गया.

मैंने पहली बार उन्हें बांद्रा में सुनील दत्त के अजंता आर्ट्स के दफ़्तर में दाखिल होते देखा, जहां मैं काम की तलाश में पहुंचा था.... एक बहुत शानदार दिखने वाले युवा... गठीला शरीर... उनकी चाल में एक दबंगपन था... एक भद्र मुस्कान के साथ उन्होंने मेरी तरफ देखा... ये 1969 था... वो अजंता आर्ट्स की फिल्म 'मन का मीत' में काम कर रहे थे... मैं एक रोल पाने के लिए संघर्ष कर रहा था, कोई रोल... कहीं भी...

विनोद खन्ना की ज़िंदगी में सब कुछ 'अचानक' रहा

विनोद खन्ना के अंतिम संस्कार में सितारों के ना पहुंचने पर भड़के ऋषि कपूर

कुछ वक्त बाद हम उसी जगह मिले... वो और मैं दत्त साहब की फिल्म 'रेशमा और शेरा' में काम कर रहे थे... फ़िल्म के दफ्तर में ट्रायल्स... यात्रा और स्टोरी के लिए होने वाली बैठकें... थापा साहब, अली रज़ा, सुखदेव और वो पूरी रात बैठकों का दौर मेरे लिए बहुत अनूठा है... फ़िल्म इंडस्ट्री कैसे काम करती है, इससे मेरी पहली पहचान थी...

इमेज कॉपीरइट MOHAN CHURIWALA

शूटिंग के वक्त जैसलमेर की एक लोकेशन तक यात्रा का उत्साह... महीनों तक हम साथ थे... राजस्थान के रेगिस्तान की भीषण गर्मी में पोचीना की लोकेशन तक ड्राइविंग, रेत के बीच जहां आसपास कोई आबादी नहीं... विनोद, रंजीत, थापा साहब, अली रज़ा साहब हम करीब सात लोग एक ही टेंट में रहते थे... उसके बाद उतने ही लोग जैसलमेर शहर के अस्थाई घर में भी... हम लोगों से भरे उस कमरे में अमरीश पुरी भी हमारे साथ शरीक हो गए, हंसते, काम करते... बेफिक्र दिन...

लोकेशन से वापस आने के बाद भी वो मुझसे जुड़े रहे... वो एक बड़े स्टार थे... लेकिन हमेशा बेहद विनम्र दूसरों के बारे में सोचने वाले... हाल में ली गई पीले रंग की बीटल फॉक्सवैगन में वो जो मुझे घुमाने ले जाते थे... शहर के ताज स्थित इकलौते डिस्को क्लब में मुझे ले जाने की उनकी उदारता, जहां वो सदस्य थे और मैं किसी तरह सदस्यता लेने की स्थिति में नहीं था...गीतांजलि के साथ उनकी शादी, जिन्हें वो और हमसब प्यार से गिट्ली बुलाते थे. उनके बेटों राहुल और अक्षय का जन्म जिन्हें वो अक्सर एएए (अमर, अकबर, एंथनी) के सेट्स पर लाते थे.

रेस्टोरेंट में हुई वो घटना, जहां किसी ने एक घटिया टिप्पणी कर दी और वो उससे भिड़ गए, तकरार में उनकी बांह में चाकू लगा लेकिन वो विजेता बनकर निकले

इमेज कॉपीरइट Getty Images

'रेशमा' में काम करने के कुछ ही वक्त बाद अचानक उनके पिता का चले जाना.. उनके दुख की घड़ी में मैं उनके साथ होता था... हमने जो साथ में कई ऐतिहासिक फ़िल्में की, उनकी गज़ब की केमिस्ट्री.

ये बहुत ही प्यारा साथ था... एक दूसरे के मेकअप रुम में वक्त बिताना, खाना एक साथ खाना... हर तरह की बातें करना... देर रात शूटिंग से पैकअप और आधी रात के बाद जुहू बीच पर ड्राइविंग, सिर्फ अपने निर्देशकों के साथ बैठने के लिए और उनके और मेरे एक ड्रिंक के लिए (उन दिनों मैं भी पीता था).

वो अपराध बोध वाली घटना जब एक सीन में मुझे उनकी तरफ एक ग्लास फेंकना था और दुर्घटनावश ये उनकी ठोढ़ी से टकराया, वो हिस्सा दांत तक कट गया... उस हादसे का मुझे आज तक अफसोस है...देर रात उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना, टांके लगवाना, उन्हें घर तक पहुंचाना और उस ग़लती के लिए उनसे माफी मांगते रहना.

ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में उनसे अचानक मुलाकात जहां मैं एक दोस्त को देखने गया था, और वहां उनका ग़ुस्सा और चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखीं, उन्हें अपने करीबी रिश्तेदार की मोटरबाइक से हुए हादसे की जानकारी मिली थी, वो अपनी ज़िंदगी की ज़ंग लड़ रही थीं और वो उनके साथ रहना चाहते थे.

इमेज कॉपीरइट TWITTER

मेरी फ़िल्म 'ज़मीर' में झलक दिखाने का उनका दोस्ताना रवैया.. जो वक्त हमने तमाम लोकेशन पर बिताया.. उदयपुर के अंदरूनी हिस्से में आदरणीय एक्शन कोऑर्डिनेटर खन्ना साहब के साथ सबसे ज्यादा मुश्किल एक्शन सीक्वेंस की शूटिंग... जब वो सीन पूरा हो गया तो सुबह के वक्त हमारे साथ बैठे खन्ना साहब ने हम दोनों के साथ काम करने को लेकर भावनात्मक रुप से खुशी जाहिर की.

हमारी तारीफ करते हुए वो बोले, " एक एक्शन ड्रामा में मुझे ये दो कलाकार दे दो, और मैं अब तक का बेस्ट, सामने ले आऊंगा. "

उदयपुर के होटल में हमारे कमरों के बीच दूरी थी... मैं एक अकेले कोने में था और वो दूसरे... मैंने बीच रात उन्हें फोन किया और अकेलेपन की बात जाहिर की... उन्होंने कहा कि मैं उनके कमरे में आकर रह सकता हूं... आप सोच नहीं सकते कि एक न्यूकमर के तौर पर एक स्टार की ओर से ऐसा व्यवहार मेरे लिए क्या मायने रखता है.

उनका आकर्षण प्रभावी था... उसमें हमेशा सकारात्मक ऊर्जा रहती थी... मुस्कुराहट... हंसी... बेफिक्री... उन्हें कोई बात परेशान नहीं करती थी... आज के दौर के हिसाब से कहें तो वो 'कूल' थे.

सेट पर हम जो कुछ नया करते थे... बिना तैयार किए हुए गाने... मनमोहन देसाई की 'परवरिश' में हम पांच तुला राशि वाले लोग- शम्मी कपूर जी, अमजद, कादर खान, विनोद और मैं.

और वो जोरदार ठहाके जो हम एकसाथ हर शॉट देने के बाद लगाते थे.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

और एक दिन रजनीश की शरण में जाने का उनका अचानक लिया फ़ैसला...

मेरे ख़िलाफ़ भड़काने पर भी नहीं भड़के विनोद: शत्रुघ्न सिन्हा

उनकी धुन और अपनी आस्था की ताक़त...जिसका वो अनुसरण कर रहे थे उसे लेकर कैलिफोर्निया तक उनकी लगन... रजनीश वहां शिफ्ट हो गए थे.

मैं उस दौरान लॉस एंजिल्स में उनसे मिला था. एक साझा मित्र के घर उन्होंने घंटो तक ये समझाने की कोशिश की कि ये अभियान सिर्फ उनके ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए क्या मायने रखता है.

और आज शाम 48 साल का ये साथ आखिरी पड़ाव पर पहुंच गया.

ये शख्स... बेशुमार ऊर्जा वाला ये मददगार शरीर... ये दोस्त... ये साथ काम करने वाला शख्स... हमेशा मुस्कुराहट बांटने वाला व्यक्ति, अस्थिर लेटा है.

उनकी तरह किसी की चाल नहीं थी.... भीड़ भरे कमरे में उनकी मौजूदगी की तरह असर किसी और का नहीं था... वो जिस तरह अपने आसपास के माहौल को रोशन कर देते थे कोई नहीं कर सकता था... उनके जैसा... कोई नहीं..

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)