गुलबुद्दीन हिकमतयार जिसे कहा जाता था 'काबुल का कसाई'

  • 4 मई 2017
इमेज कॉपीरइट AFP

अफग़ानिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री रहे और 80 के दशक में मुजाहिद्दीनों की अगुवाई करने वाले गुलबुद्दीन हिकमतयार 20 साल बाद काबुल लौटे हैं.

क्या अमरीका फिर अफ़ग़ानिस्तान में फंसने जा रहा है?

अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट का कितना रौब

एक ज़माने में उन्हें 'बुचर ऑफ़ काबुल' यानी काबुल का कसाई कहा जाता था. अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास में वे सबसे विवादित हस्तियों में से एक हैं.

80 के दशक में सोवियत संघ के कब्ज़े के बाद अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिद्दीन लड़ाकों ने गुलबुद्दीन हिकमतयार की अगुआई में जंग की थी. उस समय ऐसे करीब सात गुट थे.

इसके बाद 90 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में जो गृह युद्ध हुआ उसमें गुलबुद्दीन हिकमतयार की भूमिका बहुत विवादित रहा है.

'रॉकेटआर' भी कहते थे

इमेज कॉपीरइट EPA

90 के दशक में काबुल पर कब्ज़े के लिए उनके गुट हिज़्बे इस्लामी के लड़ाकों की दूसरे गुटों के साथ हिंसक लड़ाइयाँ होती थीं.

इस दौरान बड़े पैमाने पर हुए ख़ून खराबे के लिए हिज़्बे इस्लामी को काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार माना जाता है. गृह युद्ध के दौरान उन्होंने और उनके गुट ने काबुल में इतने रॉकेट दागे कि उन्हें लोग 'रॉकेटआर' कहने लगे थे.

कहते हैं कि बहुत से अफ़ग़ान लोगों ने इसके लिए उन्हें कभी माफ़ नहीं किया.

हिंसा के उस दौर के बाद ही अफ़ग़ान लोगों ने तालिबान का स्वागत किया था.

इसी गृह युद्ध के कारण गुलबुद्दीन हिकमतयार अलग-थलग पड़ गए और जब तालिबान सत्ता में आई तो उन्हें काबुल से भागना पड़ा.

राष्ट्रीय एंथम के लिए खड़े हुए

इमेज कॉपीरइट EPA

पिछले साल अफ़ग़ान सरकार के साथ डील हुई तो 20 साल बाद अब वो काबुल लौटे हैं. वे जलालाबाद से कड़ी सुरक्षा के बीच काबुल आए और उनके काफ़िले को अफ़ग़ान सेना के हेलिकॉप्टर की सुरक्षा मिली हुई थी.

जब गुलबुद्दीन हिकमतयार राष्ट्रपति भवन पहुँचे तो राष्ट्रीय एंथम के लिए खड़े हुए.

बीबीसी अफ़ग़ान सेवा के प्रमुख का कहना है कि ये बड़ी बात क्योंकि उनके जैसे कई धार्मिक नेता मानते हैं कि संगीत के समय किसी को खड़े नहीं होना चाहिए.

उनका संगठन हिज़्बे इस्लामी अफ़ग़ानिस्तान का दूसरा बड़ा चरमपंथी गुट है.

फ़ायदा या नुकसान

इमेज कॉपीरइट Reuters

कुछ लोग गुलबुद्दीन हिकमतयार के साथ डील को आगे बढ़ने की ओर एक कदम मान रहे हैं. जबकि कुछ लोग मानते हैं कि इससे सरकार के बीच मतभेद और बढ़ेंगे.

गुलबुद्दीन हिकमतयार के आलोचकों का कहना है कि अब वो कोई बड़ी शक्ति नहीं रहे और शांति वार्ता में हिस्सा लेने की उनकी बात को तालिबान तवज्जो नहीं देगा. साथ ही उन्हें ये भी लगता है कि सत्ता में भागीदारी के लिए एक दावेदार पैदा हो जाएगा.

कुछ लोगों का मानना है कि सरकार शांति लाना चाहती है तो उसे दाएश और तालिबान से शांति वार्ता करनी चाहिए क्योंकि गुलबुद्दीन हिकमतयार के पास ज़्यादा समर्थक नहीं है.

तो कुछ लोग मानते हैं कि गुलबुद्दीन हिकमतयार के साथ डील से तालिबान भी शांति वार्ता में शामिल हो सकता है.

  • 2003 में अमरीका ने उन्हें आतंकवादी घोषित किया
  • हिकमतयार पर तालिबान द्वारा हमलों का समर्थन करने का आरोप
  • 2016 में अफ़ग़ान सरकार ने उन्हें पुराने मामलों में माफ़ी दी

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)