'सिसक' में पर्दे पर उतरी समलैंगिकों की ख़ामोशी

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भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां समलैंगिकता अब तक अपराध है.

बॉलीवुड में कुछ ही ऐसी फिल्में बनी हैं जिन्होंने समलैंगिक रिश्तों के इर्दगिर्द बने घेरे को तोड़ने की कोशिश की है.

हंसल मेहता निर्देशित फिल्म 'अलीगढ़', शकुन बत्रा निर्देशित फिल्म 'कपूर एंड संस' और तनुज भ्रमर निर्देशित फिल्म 'डिअर डैड' कुछ ही ऐसी फिल्में हैं जिन्होंने गे किरदारों को अच्छी तरह से पेश किया है.

बॉलीवुड में ज़्यादातर फिल्में समलैंगिक किरदारों को मज़ाकिया ढंग में दिखाती रही हैं.

हाल ही में निर्देशक फ़राज़ आरिफ़ अंसारी की शॉर्ट फ़िल्म 'सिसक' कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में आधिकारिक तौर पर गई. 'सिसक' समलैंगिकों पर बनी भारत की पहली मूक (साइलेंट) फ़िल्म है.

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सिसक को 'विकेड क्वीर' (समलैंकिगों पर बोस्टन के सालाना फ़िल्म महोत्सव) में विजेता घोषित किया गया. यहीं इस फ़िल्म का वर्ल्ड प्रीमियर भी हुआ था.

फ़िल्म के निर्देशक फ़राज़ ने कहा, "बोस्टन के इतिहास में ये पहला मौका है जबकि कोई भारतीय फ़िल्म विजेता बनी."

यह शार्ट फ़िल्म 'कशिश' (साउथ एशिया का सबसे बड़ा LGBTQ फ़िल्म फ़ेस्टिवल) में भी शामिल हुई है. अब मुंबई में 'सिसक' की स्क्रीनिंग की जाएगी.

अभिनेत्री सोनम कपूर ने इस फ़िल्म का ट्रेलर ट्विटर पर रिलीज़ किया था.

पर्दे पर ख़ामोशी

फ़राज़ 'तारे ज़मीं पर', 'स्टैनले का डब्बा' और 'गिप्पी' जैसी फ़िल्मों में काम कर चुके हैं. उन्होंने डॉक्यूमेंट्री 'नीरोज़ गेस्ट्स' में भी काम किया है. उनके शब्दों में उन्हें 'सोशली रेलेवेंट' सिनेमा पर काम करने में दिलचस्पी है.

फ़राज़ बताते हैं कि वे अपनी पहले लिखी हुई एक स्क्रिप्ट जिसका नायक एक होमोसेक्शुअल आदमी था, उसे लेकर कई प्रोडक्शन हाउस के पास गए और कइयों को स्क्रिप्ट बहुत पसंद भी आई.

लेकिन कोई उसे प्रोड्यूस करने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि यह एक 'संवेदनशील' विषय है. उन्हें यह भी कहा गया कि वे नायक का किरदार समलैंगिक न रखें. लेकिन ऐसा नहीं करने पर कहानी का मतलब ही बदल जाता.

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साल 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध बताने वाली धारा 377 को फिर से जायज़ बताया तब फ़राज़ नैनीताल में थे. उनके मुताबिक यह ख़बर देख कर वे टूट गए.

फिर उन्होंने 'सिसक' की स्क्रिप्ट लिखी और फ़ैसला किया कि यह एक मूक (साइलेंट) फ़िल्म होगी. वैसी ही ख़ामोशी जैसी भारत में समलैंगिक समुदाय को रखनी पड़ती है.

उन्होंने अपनी बचत से इस फ़िल्म को बनाने का निश्चय किया और फ़िल्म की एडिटिंग के लिए उन्होंने क्राउड फ़ंडिंग का उपयोग किया. उन्होंने फ़िल्म की शूटिंग मुंबई की लोकल ट्रेनों में की.

नए कलाकार

'सिसक' में जितिन गुलाटी और ध्रुव सिंघल ने काम किया है. फ़राज़ शूट के कुछ दिन पहले ही इनसे मिले थे. जिन कलाकारों ने पहले उनके साथ काम करने का वादा किया था, उन्होंने शूटिंग से पहले होमोसेक्शुअल किरदार निभाने से मना कर दिया.

जितिन और ध्रुव को एक वर्कशॉप का हिस्सा बनाया गया जिससे वे अपने किरदारों को और बख़ूबी निभा सकें और एक होमोसेक्शुअल आदमी की मानसिकता को समझ सकें.

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शूटिंग के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई. वे रात में खाली डिब्बों में शूट करते थे और इसके लिए उन्होंने कई महीनों तक रिसर्च किया.

उन्होंने सोच लिया था कि अगर कभी पुलिस उनसे पूछताछ करे तो वे और उनका क्रू ऐसा ढोंग करेंगे कि वे सब टूरिस्ट हैं और सिर्फ एक-दूसरे की तस्वीरें खींच रहे हैं.

बॉस्टन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'सिसक' सबसे आखिर में स्क्रीन की गई थी. स्क्रीनिंग के अंत में एक गे कपल फ़राज़ से बात करने आए. उन दोनों में से एक ने फ़राज़ को गले से लगाया और काफ़ी देर तक रोते रहे.

फिर उन्होंने कहा कि, "मैं तुम्हें घर ले जाना चाहता हूँ, मैं नहीं चाहता की तुम फिर से इंडिया वापस जाओ. मैं तुम्हारी देखभाल करना चाहता हूँ ताकि तुम्हारे साथ कुछ बुरा न हो. तुम्हारी फ़िल्म की वजह से मुझे पता चला की इंडिया में गे कम्युनिटी की कितनी बुरी हालत है."

फ़राज़ चाहते हैं कि कुछ समय बाद उनकी फ़िल्म दुनिया में दिखाई जाए. वे चाहते हैं कि मिडिल ईस्ट और पाकिस्तान में भी 'सिसक' पहुंचे. कुछ सालों बाद वे इस सपने को पूरा करने के लिए ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का सहारा लेंगे.

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