'ऐ दिल है मुश्किल' रचनेवाले ओ पी नैय्यर

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ओंकार प्रसाद नैय्यर इस मायने में ऐसे चोटी के संगीतकार ठहरते हैं जिनके यहाँ संगीत पूरी तरह पंजाब की लोक-लय पर आधारित होकर सामने आता था, साथ ही शास्त्रीय रागों के पारम्परिक स्वरूप से परे हटकर उससे कुछ टुकड़े अनायास उधार लेकर प्रयोगधर्मी ढंग से आकार लेता हुआ दिखाई पड़ता था.

यह नैय्यर की ऐसी विशेषता रही जिससे उन्होंने किसी लोक-धुन की ज़मीन को अपने गीत की तर्ज़ बनाते हुए उसमें अनजाने ही किसी राग के कुछ कोमल या शुद्ध कण डाल दिए, जिससे उसकी सौन्दर्य माधुरी भी एकदम से संवर गई.

उनकी कम्पोज़ की हुई अधिकांश धुनों में शास्त्रीयता और लोकधर्मिता की आपसी आवाजाही को देखा जा सकता है.

नैय्यर की प्रतिभा से सजाई हुई उन उल्लेखनीय फ़िल्मों का नामोल्लेख भी आवश्यक लगता है जिसने एक बिल्कुल अलग क़िस्म का संगीतमय दौर सृजित किया.

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लंबी फ़ेहरिस्त

इनमें प्रमुख रूप से याद किए जाने योग्य फ़िल्में हैं- 'आसमान' (1952), 'आर-पार', 'मंगू' (1954), 'मिस्टर एण्ड मिसेज 55' (1955), 'सी आई डी' (1956), 'नया दौर', 'तुम सा नहीं देखा' (1957), 'हावड़ा ब्रिज', 'फागुन', 'सोने की चिड़िया', 'रागिनी', 'ट्वेल्व ओ क्लॉक' (1958), 'एक मुसाफ़िर एक हसीना' (1962), 'फिर वही दिल लाया हूँ' (1963), 'कश्मीर की कली' (1964), 'मेरे सनम' (1965), 'बहारें फिर भी आएंगी', 'यह रात फिर ना आएगी', 'सावन की घटा' (1966), 'हमसाया', 'क़िस्मत' (1968), 'सम्बन्ध' (1969), 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' (1973).

पचास और साठ के दशक में इन बेहतरीन संगीतमय फ़िल्मों के बहाने ओ. पी. नैय्यर ने एक ऐसे नए सांगीतिक युग का सूत्रपात कर दिया था जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की दमदार उपस्थिति को इनके द्वारा मुख्य धारा में लाए गए लोक-संगीत ने सीधे चुनौती दी थी.

एक हद तक यह कहा जा सकता है कि ओ. पी. नैय्यर के आगमन से ही भारतीय फ़िल्म संगीत में उस पंजाबी फोक का एक बिलकुल नया दौर शुरू हुआ जिसकी शुरुआत उनके पहले मास्टर ग़ुलाम हैदर ने कर दी थी.

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पाश्चात्य संगीत का इस्तेमाल

यह देखना भी दिलचस्प होगा कि जिस पंजाबी बीट व फ़ोक लोर को नैय्यर ने अपने संगीत का प्रमुख घटक बनाया, उसी को पहली बार ग़ुलाम हैदर, दलसुख पंचोली की फ़िल्म 'खजांची' में लेकर आए थे.

स्वयं नैय्यर को पहला महत्वपूर्ण ब्रेक भी पंचोली के ही बैनर की फ़िल्म 'आसमान' के लिए मिला था.

ओ. पी. नैय्यर के सन्दर्भ में कुछ चीजें विशेष रूप से रेखांकित करने योग्य लगती हैं. जैसे- उन्होंने अपने संगीत में लोक-तत्वों का समावेश किया और उसे व्यापक स्तर पर स्वीकार करने योग्य बनाया.

ठीक इसी तरह शास्त्रीय रागों की सुन्दर संरचनाओं से भी कुछ एलीमेंट लेकर अपनी धुनों को शिल्प की दृष्टि से सुन्दर बनाया.

लोक और शास्त्र की राह पर चलते हुए उन्होंने एक तीसरा रास्ता भी अपनी संगीत-यात्रा के लिए चुना जो पाश्चात्य संगीत की दुनिया की ओर जाता था.

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Image caption आशा भोंसले के साथ ओपी नैय्यर

पंजाबी लोक संगीत

उन्होंने पाश्चात्य संगीत से प्रभाव ग्रहण करके कुछ लोकप्रिय सिंफ़नीज और रिदम पैटर्न (लय व ताल-पद्धति) का भारतीय वाद्यों से अनुसरण किया और अपनी धुनों को कर्णप्रियता के शिखर तक पहुँचाया.

हम आसानी से ओ. पी. के संगीत में रॉक एन्ड रोल के ड्रम बीट का सहज अंगीकार, ओपेरा की प्रचलित ध्वनियों का भारतीयकरण, पहली बार मस्ती-भरे अंदाज़ में एल्विस प्रेस्ले की आर्केस्ट्रेशन एवं गायिकी शैली का अनुसरण एवं पाश्चात्य वाद्यों मसलन- ट्रम्पेट हवाइयन गिटार, मैंडोलिन, एकॉर्डियन, चेलो एवं बांगो आदि की मदद से बैंडनुमा प्रभावों वाले इंटरल्यूड्स का लुभावना प्रयोग देख सकते हैं.

इसके चलते सबसे महत्वपूर्ण बात जो नैय्यर के हित में जाती है, वह ये कि इन सबकी आंशिक उपस्थिति के बावजूद उनके संगीत का एक निराला ही स्वरूप विकसित हुआ जिसमें पंजाबी लोक-संगीत की लय व ताल, शास्त्रीय नियमों में बंधे रागों के शुद्ध और कोमल स्वरों का धुन की ज्यामिति में विवादी स्वर के रूप में प्रयोग एवं विदेशी सिम्फ़नीज़ का मध्यवर्ती संगीत (इंटरल्यूड्स) में रोचक इस्तेमाल, सभी कुछ नियत ढंग से अपना स्थान पा सके.

संग- संग गुनगुनाओगे की सभी एपिसोड देखें.

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नए क़िस्म की आवाज़, अनूठी लय

ओ. पी. नैय्यर के संगीत का एक महत्वपूर्ण पहलू उनका एक विशेष लय उत्पन्न करने के लिए विभन्न प्रकार के तालों का रोचक प्रयोग भी है.

पारम्परिक ढंग से कहरवा, दादरा, दीपचन्दी, झपताल, तीन ताल, एक ताल आदि के व्यावहारिक इस्तेमाल के साथ वे कई बार विभिन्न साजों से कुछ नए क़िस्म की आवाज़ें भी कुछ अनूठे लयों में सृजित किया करते थे.

उनके गीतों में अक्सर तांगे की आवाज़ या घोड़े की टापों की निश्चित रिदम मज़ेदार लगती थी जो वास्तविक रूप से कभी तबला, नाल, ढोलक या कांगों आदि से न निकलकर बेहद मामूली ढंग से लकड़ी के छोटे-बड़े टुकड़ों (वुड ब्लॉक्स) को आपस में बजाकर पैदा की जाती थी.

वुड ब्लॉक्स का इस तरह वाद्य के रूप में सर्वाधिक इस्तेमाल ओ. पी. नैय्यर ने ही किया है जिसे फ़िल्म इंडस्ट्री की भाषा में 'खोपड़ी' कहते हैं.

(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)

(फिल्मी दुनिया के महान संगीतकारों के बारे में बीबीसी हिंदी की 'संग संग गुनगुनाओगे' सिरीज़ की आठवीं कड़ी ओपी नैय्यर को समर्पित है.)

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