जिनके पास हैं पांच लाख फ़िल्मी पोस्टर

  • 19 मई 2017
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जायदाद मे धन दौलत की जगह अगर किसी को फ़िल्मी पोस्टर मिले तो बात सुनने मे अजीब ही लगेगी लेकिन हाजी अबु की कहानी कुछ ऐसी ही हैं.

32 साल के हाजी अबु, पिछले 25 साल से हिन्दी फ़िल्मों के पुराने और ओरिजिनल पोस्टर की दुकान मुंबई के चोर बाज़ार इलाके चला रहे हैं. उनके यहाँ पुरानी फिल्मों के हाथ से पेंट किए पोस्टर आपको देखने को मिलेंगे.

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हिन्दी सिनेमा के पोस्टर को इकट्ठा करने का शौक हाजी अबु को बचपन से हो गया था. उनको ये शौक अपने दादा और अपने पिता को देख कर जागा.

उनके दादा और पिता ने शौकिया तौर पर हर फ़िल्म के लगभग सौ असली पोस्टर इकट्ठा किए थे.

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वो बताते हैं, "मेरे पापा और दादा ने मिलकर ओरिजनल तीन लाख पोस्टर इकट्ठे किए थे. उनकी ऐंटिक चीज़ों की दुकान थी जहाँ ये पोस्टर एक कोने में रखे थे. मैं स्कूल से जब भी दुकान जाता था तो ये पोस्टर मुझे हमेशा आकर्षित करते थे. स्कूल से पास होने के बाद जब मैंने अपने पिता और दादा से कहा कि मैं इन पोस्टरों को बेचना चाहता हूं तो पहले मेरे दादा तैयार नहीं हुए लेकिन बहुत समझाने के बाद वो मान गए."

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हिन्दी सिनेमा के प्रेमी रहे हाजी अबु के दादा तो अब नहीं रहे लेकिन उनके पिता इस बात से खुश हैं कि उनके बेटे ने इस धरोहर को केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखा.

हाजी बताते हैं, "आज मेरे पिता खुश हैं. दरअसल मैंने उनके दिए तीन लाख पोस्टर में से 50 हज़ार पोस्टर बेचे और उसमे डेढ़ लाख जमा किए. मेरे पास आज पांच लाख पोस्टर हो गए है. ये मायानगरी है यहाँ हर कोई फ़िल्म का दीवाना है. मै इस धरोहर को सिर्फ अपने तक क्यों रखूं. इसलिए मैंने ओरीजिनल पोस्टर की एक-एक कॉपी रखी और बाकी बेच दिए."

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उनके यहाँ पुराने से पुराने पोस्टर की क़ीमत दो लाख रुपए तक है तो कुछ पांच सौ रुपये में भी हैं.

वो बताते हैं, "इस पोस्टर को बच्चों की तरह संभालना पड़ता है. हवा लगे इसके लिए हर दो से तीन महीने में खोल कर इसे रखना पड़ता है. मुगले आज़म के अब ओरिजनल दो से तीन पोस्टर ही बचे होंगे इसलिए उसकी दो लाख क़ीमत हैं. जो पोस्टर आज भी बहुत सारे है उनकी क़ीमत 500 रुपये हैं. मेरे दादा ने मुझ पर विश्वास करके ये धरोहर सौंपी है. एक भी फट जाए तो बुरा लगता है."

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हाजी बताते हैं, "मुझे दुख होता है जब किसी फिल्म के पोस्टर मेरे पास से ख़त्म हो जाते हैं तो. कई पुराने सिनेमाघर भी बंद हो रहे हैं. इनके पास प्रमोशन के लिए पुराने पोस्टर आया करते थे लेकिन बंद होने के साथ-साथ पोस्टर भी ख़त्म होते जा रहे हैं. कई फ़िल्मो के तो ओरिजनल प्रिंट भी नहीं हैं जो बचे हैं ये हैंडमेड ओरिजनल पोस्टर ही हैं. ये भी खत्म हो गए तो सिनेमा की याद के नाम पर क्या बचा रह जाएगा."

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उनका मानना है कि 80 और 90 के दशक के बाद हैंडमेड पोस्टर की जगह डिजिटल पोस्टर ने ली जिसके बाद पोस्टर का क्रेज धीरे धीरे कम होता गया हालांकि उन्हें उम्मीद है कि वो दौर फिर से लौट कर आएगा.

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हाजी अबु के पास सबसे पुराना पोस्टर 1939 की फ़िल्म सिकन्दर का है.

कई जगहों से फट चुके इस पोस्टर को हाजी कई सालों से संभाल कर रखे हुए हैं. उनकी दुकान की ये सबसे क़ीमती पोस्टरों में से एक है.

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