जयदेव: रात भर आपकी याद आती रही....

  • 21 मई 2017
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हिन्दी फ़िल्म संगीत-यात्रा में कुछ ऐसे संगीतकार भी हुए हैं, जिनका नाम दूसरे कलाकारों की तुलना में संगीत-शास्त्र के लिहाज से प्रामाणिक धुन बनाने वालों के तौर पर ज़्यादा प्रासंगिक ढंग से याद किया जाता है.

जयदेव एक ऐसे ही संगीतकार हुए, जिनकी पूरी रचना में शास्त्रीयता और लोक-परम्परा ने अग्रणी भूमिका निभाई है. जयदेव इसलिए भी अनूठे ढंग से याद किये जाते हैं कि उन्होंने शास्त्रीय अंग को अपनी कला में स्वीकृति दिलाते हुए मेलोडी को भी व्यापक तरजीह दी है.

उनकी कम्पोजिशन का जटिल होते हुए कर्णप्रियता के स्तर पर अतिरिक्त रससिक्त होना संगीत के आलोचकों को आज भी अचम्भित करता है.

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मेलोडी के साथ शास्त्रीय संगीत रचने वाले वाले जयदेव

स्वरों के प्रयोग में माधुर्य की अनिवार्यता, शास्त्रीयता की राह पर अनुगमन के बावजूद लोकधुनों से मैत्री का विनीत भाव और पारम्परिक प्राचीन वाद्यों से धुन बनाने की महारत के चलते जयदेव के छोटे से लगते फ़िल्मी जीवन की आयु बेहद लम्बी और संगीत की दुनिया के लिए प्राण-वायु सरीखी है.

वे वर्षों तक दिग्गज संगीत-निर्देशक सचिन देव बर्मन के सहायक रहें. उन्हें मशहूर सरोदवादक अली अकबर खां से संगीत की शिक्षा मिली.

जब अली अकबर खां ने नवकेतन बैनर की दो फिल्मों 'आंधियां' और 'हमसफ़र' में संगीत दिया, तो उन्हें ही बतौर सहायक चुना.

'ऐ दिल है मुश्किल' रचनेवाले ओ पी नैय्यर

'लग जा गले कि फिर मुलाकात हो, न हो...'

मूलतः पंजाबी होने के कारण और वहीं शास्त्रीय संगीत के बड़े अधिवेशनों को ख़ास तौर से 'हरवल्लभ संगीत सम्मेलन' के माध्यम से सुनते हुए वे जवान हुए. उनकी रगों में जैसे शास्त्रीय रागों की अनगिनत स्नेहिल छायाएं किशोरवय से ही अपना प्रभाव रचने लगी थीं.

इसके अलावा बचपन में जिस संगीत विद्यालय में उन्होंने पहली बार सरगम सीखना आरम्भ किया था, वह पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा स्थापित विद्यालय था. उन्हें सन् 1943 में अल्मोड़ा में पण्डित उदयशंकर का भी सान्निध्य मिला, जो हर प्रकार से उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ.

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अपने शुरुआती दौर में बम्बई प्रवास के दौरान उन्हें जावकर बंधुओं से शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को सीखने का मौक़ा मिला, जो स्वयं किराना घराने की गायन शैली में निपुण लोग थे.

साथ ही, कुछ दिनों तक पण्डित बरकत राय के पास रहकर संगीत के आन्तरिक तत्वों और उसके व्याकरण को सीखा. इन सबके अलावा कई फ़िल्मों में बचपन से लेकर युवावस्था तक छोटे-मोटे रोल करते हुए भी जयदेव को पार्श्व संगीत और सिनेमा में प्रयोग की जाने वाली ध्वनियों के बारे में अपनी समझ विकसित करने में मदद मिली.

इनमें कुछ साधारण फ़िल्मों के अलावा वाडिया मूवीटोन की प्रसिद्ध नाडिया अभिनीत स्टंट फ़िल्में भी शामिल हैं. इन सब जगहों से होते हुए, एक यात्री की तरह जयदेव ने अपने संगीत की दुनिया की आधारशिला रखी. वे लीक से दूरी बरत कर चलने वाले संगीतकार के रूप में बीसवीं शताब्दी के पचास-साठ के दशक में उभरे, जिसकी नक़ल या छाया लेकर कोई दूसरा संगीतकार पैदा नहीं हुआ.

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इस लिहाज़ से जयदेव अकेले ऐसे संगीतकार के रूप में प्रतिष्ठा पाते दिखाई पड़ते हैं, जिनकी पहले के और परवर्ती दोनों ही परम्पराओं में कोई प्रतिस्पर्धी नहीं मिलता. वे जिस जगह खड़े हैं, वहीं से उनकी प्रतिभा का समर्थन और विरोध एकसाथ उन्हीं के द्वारा तय होता नज़र आता है.

इस कारण वो एक ऐसे अनूठे फनकार की कैफ़ियत रखे हुए सामने आते हैं, जिसने अपनी ही बनाई शैली का बार-बार परिमार्जन किया है अथवा उस सांचे को ही तोड़ दिया है, जिसने उन्हें काम और प्रसिद्धि दोनों दिलायी.

हम आसानी से उनकी संगीतबद्ध कुल चालीस फ़िल्मों में से कुछ को चुनकर यहाँ याद कर सकते हैं, जो उनके बिल्कुल अलग मिजाज़ के संगीत को पूरी पारदर्शिता के साथ व्यक्त करता है.

ऐसे में उनके काम की सार्थक छवियों वाली फ़िल्मों में से 'अंजलि' (1957), 'हम-दोनों' (1961), 'किनारे-किनारे', 'मुझे जीने दो' (1963), 'रेशमा और शेरा', 'दो बूंद पानी' (1971), 'मान जाइये' (1972), 'प्रेम पर्बत' (1973), 'परिणय' (1974), 'आन्दोलन' (1975), 'आलाप', 'घरौंदा' (1977), 'गमन', 'तुम्हारे लिए' (1978), 'अनकही' (1984) और 'जुम्बिश' (1986) का नाम पूरे आदर के साथ लिया जा सकता है.

इन एक से बढ़कर एक एक्सपेरिमेंटल म्यूजिक से सजी फ़िल्मों को संगीत के लिहाज़ से परखते हुए ये देखा जा सकता है कि हिन्दी फ़िल्मों में आज से आधी सदी पहले कितने प्रयोगधर्मी स्तर पर काम हो रहा था.

इन सारी फ़िल्मों के ढेरों अवयवों को एक साथ रखकर ही जयदेव की सांगीतिक चेतना को प्रासंगिक तौर पर उकेरा जा सकता है. इस कारण भी वो अकेले ऐसे चितेरे हैं, जो हर बार एक नयी पग-बाधा ख़ुद के काम के लिए खड़ी करते हैं.

जयदेव ने एक प्रयोगधर्मी काम ये किया था कि जब लता और आशा जैसी सुमधुर आवाज़ें उन्हें गायन के लिए उपलब्ध थीं, ऐसे दौर में भी उन्होंने नई और अलग से अपना स्वर-संस्कार रखने वाली आवाज़ों को पर्याप्त मौक़े उपलब्ध कराए.

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उनके यहाँ फ़िल्मों के छोटे से कैटालॉग में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार और आशा भोंसले के अतिरिक्त परवीन सुल्ताना, हीरा देवी मिश्र, छाया गांगुली, भूपेन्द्र, सरला कपूर, रूना लैला, शर्मा बन्धु, राजेन्द्र मेहता, दिलराज कौर, मधु रानी, यशुदास, फय्याज़, हरिहरन, मीनू पुरुषोत्तम, पीनाज मसानी, लक्ष्मी शंकर एवं नीलम साहनी जैसे कलाकारों के नाम शामिल हैं.

यह भी देखना कम दिलचस्प नहीं कि इन आवाज़ों ने भी कई मक़बूल गीत फ़िल्मी दुनिया को उपलब्ध कराए हैं.

हम आसानी से इनमें कुछेक का स्मरण कर सकते हैं- 'रात पिया के संग जागी रे' (मीनू पुरुषोत्तम, 'प्रेम-पर्बत'), 'पीतल की मोरी गागरी' (परवीन सुल्ताना एवं मीनू पुरुषोत्तम, 'दो बूँद पानी'), 'आजा सांवरिया तोहे गरवा लगा लूँ' (हीरा देवी मिश्र, 'गमन'), 'तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है' (रूना लैला, 'घरौंदा'), 'कवि रे कवि' (राजेन्द्र मेहता, 'परिणय'), 'आपकी याद आती रही रात भर' (छाया गांगुली, 'गमन'), 'फिर तेरी याद नये दीप जलाने आयी' (भूपेन्द्र, 'आयी तेरी याद') और 'मैं तो कब से तेरे शरण में हूँ' (नीलम साहनी एवं हरिहरन, 'रामनगरी') जैसे सदाबहार गीत.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)

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