ग़ुलाम मुहम्मदः 'पाकीज़ा' का अमर संगीत रचने वाला फ़नकार

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ग़ुलाम मोहम्मद जिन्होंने 'मुग़ले आज़म' को टक्कर दी

कुछ फ़नकार ऐसे होते हैं, जो अपनी नितान्त मौलिक प्रतिभा और लीक से हटकर चुनी गई सृजनधर्मिता के बावजूद अपने रहते हुए ख़ुद की कला का उचित मूल्यांकन देख नहीं पाते.

ग़ुलाम मोहम्मद ऐसे ही संगीतकार थे, जिनकी शोहरत उस समय क़ामयाबी के शीर्ष पर पहुँची, जब उनका देहांत हो चुका था.

हममें से हर कोई इस विलक्षण संगीतकार के फ़न और 'पाकीज़ा' (1971) फ़िल्म के अमर संगीत से बखूबी वाकिफ़ है.

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मालूम नहीं कि 'पाकीज़ा' जैसी फ़िल्म को आगे आने वाले पचास सालों के दौरान किस रूप में देखा, समझा और परखा जाएगा, मगर इतना अवश्य तय है कि 'पाकीज़ा' फ़िल्म की तमाम अन्य ऊंचाइयों के प्रति जब भी जवाबदेही तय की जाएगी, उसमें अभिनय, पटकथा, संवाद, कला-सज्जा, छायांकन और निर्देशन के अलावा मुख्य रूप से संगीत का ज़िक्र आएगा.

यह देखना भी कम सामयिक नहीं ठहरेगा कि संगीत के माध्यम से हम जिस पारम्परिक कोठे के दृश्य का वातावरण रच रहे होंगे, वह ग़ुलाम मोहम्मद जैसे बेजोड़ संगीतकार के बग़ैर असम्भव होती दिखाई देगी.

एक तरह से ग़ुलाम मोहम्मद और पाकीज़ा आपस में कला के स्तर पर अभिव्यक्ति के तहत उसी तरह गुंथे हुए हैं, जिस तरह केएल सहगल के साथ 'देवदास' के गाने, राजकपूर के साथ मुकेश की आवाज़, नरगिस के साथ 'मदर इंडिया' का किरदार, 'शोले' के साथ सलीम-जावेद का नाम और ख़य्याम के साथ 'उमराव जान' का संगीत अन्तः सलिल भाव से टंका हुआ है.

नौशाद ने पूरा किया अधूरा काम

ग़ुलाम मोहम्मद और 'पाकीज़ा' के आपसी सहकार के बारे में बात करने से पहले यह जानना महत्वपूर्ण है कि इस संगीतकार ने नौशाद जैसे दिग्गज संगीत-निर्देशक के साथ बतौर सहायक काम किया था.

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Image caption प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद

नौशाद की 'संजोग' (1943) से लेकर 'आन' (1952) तक ग़ुलाम मोहम्मद ही उनके सहयोगी संगीत-निर्देशक रहे. इन फ़िल्मों में इस्तेमाल किये गए तबला और ढोलक के ठेकों के पीछे इन्हीं का योगदान शामिल है.

यह अकारण नहीं हैं कि कई बार ग़ुलाम मोहम्मद के संगीत में नौशाद की अनुगूंजें सुनाई पड़ती हैं, तो कई दफ़ा नौशाद के संगीत से ग़ुलाम साहब का स्वर आकार लेता हुआ ध्वनित होता है.

ग़ुलाम मोहम्मद के खाते में ऐसी तमाम उल्लेखनीय फ़िल्में दर्ज़ हैं, जिनके संगीत-निर्देशन का जिम्मा इसी संगीतकार के कन्धों पर था और जिसे उन्होंने अपनी अचूक सांगीतिक प्रतिभा द्वारा समृद्ध ढंग से व्यक्त होने दिया है. 'पगड़ी' (1948), 'शायर' (1949), 'परदेस' (1950), 'अम्बर' (1952), 'दिले नादां', 'लैला मजनूं' (1953), 'मिर्ज़ा ग़ालिब' (1954), 'सितारा' (1955), 'मालिक' (1958), 'दो गुण्डे' (1959), 'शमा' (1961), एवं 'पाकीज़ा' (1971) ऐसी ही चुनिंदा संगीतबद्ध फ़िल्में हैं.

अपनी बहुत छोटी सी संगीत-निर्देशन की यात्रा में ग़ुलाम मोहम्मद ने उपर्युक्त एक दर्ज़न फ़िल्मों में अप्रतिम संगीत दिया है.

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यह जानना भी प्रासंगिक होगा कि इसमें उनकी आख़िरी फ़िल्म 'पाकीज़ा' के रिलीज़ के लगभग चार वर्ष पूर्व सन् 1968 में ही उनकी मृत्यु हो गयी थी.

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इसके उपरान्त उनके छूटे हुए काम को नौशाद ने पूरा किया था, तथा फ़िल्म का सारा बैकग्राउण्ड संगीत भी उन्हीं के कुशल निर्देशन में संपन्न हुआ.

व्यावसायिक सफलता के मोहताज

हम ग़ुलाम मोहम्मद की प्रतिभा के तहत मील के पत्थर के रूप में 'शायर', 'मिर्ज़ा ग़ालिब', 'शमा' और 'पाकीज़ा' जैसी फ़िल्मों के नाम ले सकते हैं.

ठीक इसी तरह इन तमाम फ़िल्मों के लिए रचे गए उनके कुछ बेहद सुरीले गीतों को भी याद करना यहाँ ज़रूरी जान पड़ता है, जो आज भी सुने और सराहे जाते हैं.

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इनमें मुख्य रूप से 'इक तीर चलाने वाले ने' (पगड़ी), 'मुहब्बत पर बहार आती' (शायर), 'मेरे घुंघर वाले बाल' (परदेस), 'हम तुम ये बहार देखो, रंग लाया प्यार' (अम्बर) 'आसमां वाले तेरी दुनिया से जी घबरा गया' (लैला मजनूं) 'ज़िन्दगी देने वाले सुन तेरी दुनिया से दिल भर गया' (दिले नादां), 'दिले नादां तुझे हुआ क्या है', 'नुक्ताचीं है गमे दिल उनको सुनाये न बने' (मिर्ज़ा ग़ालिब), 'भीगीं पलकें उठा मेरी ज़ां ग़म ना कर' (दो गुण्डे), 'तक़दीर की गर्दिश क्या कम थी' (सितारा), 'दिल ग़म से जल रहा है' (शमां) जैसे गीतों को याद कर सकते हैं.

ग़ुलाम मोहम्मद के सन्दर्भ में यह बात भी क़ाबिले ग़ौर है कि अपनी तमाम कर्णप्रिय धुनों, आर्केस्ट्रेशन पर महीन पकड़ एवं शास्त्रीय वाद्यों के साथ पाश्चात्य वाद्यों का दिलकश प्रयोग करने के बावजूद उनकी फ़िल्मों को वैसी अपेक्षित व्यावसायिक सफलता नहीं मिल पाती थी, जैसी किसी रचनाकार को अपना काम उस प्रवाह में बनाये रखने लिए आवश्यक होती है.

हालांकि संगीत के स्तर पर वे सराहे जाने के साथ-साथ प्रयोगधर्मी संगीतकार के रूप में जाने जाते थे.

दुःखद पहलू

फिर भी यह एक निर्मम सच्चाई है कि उनकी कला में व्यावसायिकता का वह रूप नहीं उभर पाता था, जो उनके समकालिन तमाम अन्य संगीतकार सफलतम स्तर पर अर्जित कर रहे थे.

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हालाँकि यह तथ्य उनकी उत्कृष्टता को किसी भी स्तर पर काम करके नहीं रखता. यह भी एक विचित्र संयोग है कि जब उनकी एकमात्र फ़िल्म 'पाकीज़ा' ने सफलता के सारे रेकॉर्ड ध्वस्त कर दिए, तब ऐसे समय वे उसकी व्यावसायिक पराकाष्ठा को देखने के लिए ज़िन्दा न थे.

यह ग़ुलाम मोहम्मद के जीवन का ऐसा दुःखद पहलू है, जिसके बारे में सोचकर मन हताशा में डूब जाता है. उनके कलात्मकता को पूरी बौद्धिकता से परखने के लिए हम 'पाकीज़ा' के बहाने ही आगे बढ़ सकते हैं.

एक ऐसी फ़िल्म के माध्यम से, जो भारतीय सिनेमा में अपने सांगीतिक उत्कर्ष का एक अलग सुनहरा अध्याय रखती है और जिसके सारे गीत-संगीत के वे जेवरात बन गए हैं, जिनकी हीरे-पन्नों जैसी आभा आज भी जगमगा रही है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं.)

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