चित्रगुप्त: जिनके बिना लता की संगीत यात्रा अधूरी है

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पिछली सदी के साठ के दशक में सदाबहार धुनों के एक बड़े चितेरे के रूप में बिहार मूल के चित्रगुप्त श्रीवास्तव उर्फ़ 'चित्रगुप्त' का नाम बड़े संगीतकारों की ज़मात में उल्लेखनीय ढंग से उभरता है. यह अलग बात है कि उन्हें पहले पायदान के दिग्गज फ़नकारों में संगीत आलोचकों द्वारा कई बार स्वीकार भी नहीं किया गया.

पढ़े-लिखे संगीतकारों में चित्रगुप्त का नाम तो आदर से लिया जाता ही है, इस बात पर भी उन्हें प्रशंसा मिलती रही है कि उन्होंने बाक़ायदा पण्डित शिवप्रसाद त्रिपाठी से संगीत की शिक्षा ली थी और भातखण्डे संगीत विद्यालय, लखनऊ से संगीत के नोट्स मंगाकर रियाज़ किया करते थे.

पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम. ए. रहे चित्रगुप्त ने बम्बई की मायानगरी में आने के बाद भी अपनी संगीत की शिक्षा जारी रखी थी. सिनेमा की दुनिया में उन्हें 'बी' और 'सी' ग्रेड की फ़िल्मों के संगीतकार के रूप में ही याद किया जाता है.

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Image caption 1965 में आई 'आकाश दीप' चित्रगुप्त की कामयाब फ़िल्मों में गिनी जाती है

सदाबहार संगीत

यह अलग बात है कि इन फ़िल्मों का संगीत इतना कालजयी बन पड़ा है कि एक आम रसिक या संगीत-प्रेमी के स्मरण में तो वे गीत आज भी ज़िंदा हैं, मगर उन फ़िल्मों के नाम आज तक लोगों की ज़बान पर चढ़ नहीं सके हैं.

आशय यह कि चित्रगुप्त की उपस्थिति से 'बी' और 'सी' ग्रेड की फ़िल्मों का संगीत सुंदर ढंग से निर्मित होकर 'ए' ग्रेड के दायरे में पहुंचकर अमरता को पा गया है जिसके चलते फ़िल्म को अपनी औसत हैसियत से अधिक उम्र मिल सकी.

इस कारण ये फ़िल्में मात्र अपने गीत-संगीत की वजह से सदाबहार संगीत का ऐसा अनुपम उदाहरण बन गईं कि उनमें से अधिकांश को हिट या सुपर हिट होने के लिए अपने संगीत पर ही आश्रित होना पड़ा. एक लंबी सूची है ऐसी फ़िल्मों की जिनको प्रमुख रूप से चित्रगुप्त की पहचान के लिए याद किया जाता है.

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Image caption चित्रगुप्त की 1957 में आई 'भाभी' उस साल की सबसे कामयाब फ़िल्मों से एक थी

बॉक्स ऑफिस

ऐसे में- 'तूफ़ान क्वीन', 'इलेवन ओ क्लॉक', 'भक्त पुंडलिक', 'नीलमणि', 'साक्षी गोपाल', 'कल हमारा है', 'नाचे नागिन बाजे बीन', 'पुलिस डिटेक्टिव', 'चाँद मेरे आ जा', 'अपलम चपलम', 'सुहाग सिन्दूर', 'ज़बक', 'रामू दादा', 'रोड', 'बैंड मास्टर' और 'सैमसन' जैसी दर्ज़नों फ़िल्में आती हैं.

यह देखना अचंभित करता है कि कैसे बॉक्स ऑफिस के समीकरण को चित्रगुप्त ने संगीत के माध्यम से संतुलित ढंग से न केवल साधा हुआ था, बल्कि उसी छोटे से कैनवास में उत्कृष्टता की भी कई कहानियां लिख डाली थीं.

उनके रचे हुए अमर गीतों में प्रमुख रूप से 'लागी छूटे ना अब तो सनम' (लता-रफ़ी, फ़िल्म- काली टोपी लाल रुमाल), 'दगाबाज़ हो बांके पिया' (लता-उषा, फ़िल्म-बर्मा रोड), 'एक बात है कहने की आँखों से कहने दो' (लता-रफ़ी, फ़िल्म-सैमसन), 'आ जा रे मेरे प्यार के राही' (लता-महेंद्र, फ़िल्म-ऊँचे लोग), 'दिल का दिया जला के गया' (लता, फ़िल्म- आकाशदीप) जैसे गीत हैं.

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चित्रगुप्त को पहले पायदान के दिग्गज फनकारों में संगीत आलोचकों ने बहुत कम ही स्वीकार किया.

मेलोडी प्रधान

इसके अलावा 'दिल को लाख संभाला जी' (लता, फ़िल्म-गेस्ट हाऊस), 'हो नाज़ुक-नाज़ुक बदन मोरा' (लता-रफ़ी, फ़िल्म- औलाद), 'हाय रे तेरे चंचल नैनवा' (लता, फ़िल्म-ऊंचे लोग), 'पायल वाली देखना' (किशोर, फ़िल्म-एक राज़), 'एक रात में दो-दो चाँद खिले' (लता-मुकेश, फ़िल्म-बरखा), 'देखो मौसम क्या बहार है' (लता-मुकेश, फ़िल्म-ओपेरा हाउस) भी हैं.

'तेरी दुनिया से दूर चले हो के मज़बूर' (लता-रफ़ी, फ़िल्म-ज़बक), 'जय-जय हे जगदम्बे माता' (लता, फ़िल्म- गंगा की लहरें), 'ये पर्वतों के दायरे ये शाम का धुआं' (लता-रफ़ी, फ़िल्म- वासना), 'दीवाने तुम दीवाने हम' (लता, फ़िल्म-बेज़ुबान), 'खिंचे-खिंचे से नज़र से नज़र चुराए हुए' (लता, फ़िल्म-काबली ख़ान) एवं 'चल उड़ जा रे पंछी' (रफ़ी, फ़िल्म-भाभी) जैसे कर्णप्रिय गीत बरबस याद आते हैं.

इसमें अभी सैकड़ों ऐसे मधुर गानों को जोड़ा जा सकता है जिनको लता मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर, आशा भोंसले एवं उषा मंगेशकर की आवाज़ों में स्वरबद्ध किया गया है. चित्रगुप्त ने अपनी हरेक फ़िल्म को अनोखे ढंग से मेलोडी प्रधान बनाया है, चाहे वह किसी भी बैनर की फ़िल्म क्यों न रही हो.

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Image caption काली टोपी लाल रुमाल, 1959 का एक दृश्य

बड़ा बैनर

यह देखना इस संदर्भ में तथ्यपरक है कि वे शायद अकेले ऐसे संगीतकार रहे हैं जो बैनर या निर्देशक के छोटे-बड़े होने से सर्वथा निरपेक्ष रहता आया है. उनके पूरे करियर में केवल एक ही बड़े बैनर, एवीएम प्रोडक्शन, मद्रास ने उन्हें बतौर संगीतकार साइन किया जिसके लिए चित्रगुप्त ने 'शिव भक्त', 'मैं चुप रहूँगी' और 'भाभी' का संगीत रचा.

शेष सारी फ़िल्में, जो उनके हिस्से आईं और अपनी सांगीतिक प्रतिभा का लोहा मनवाने में सफल रहीं, वे सभी साधारण बैनरों के तहत ही आती थीं. चित्रगुप्त का एक अलग महत्वपूर्ण मुक़ाम उन अत्यंत सुरीले गीतों की वजह से भी बनता है जो उन्होंने भोजपुरी फ़िल्मों के लिए संगीतबद्ध किए.

उनकी उल्लेखनीय भोजपुरी फ़िल्में 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो', 'लागी नाहीं छूटे राम', 'भौजी' और 'गंगा' हैं. उनकी इस तरह की फ़िल्मों में एक विशेष प्रकार का लोक-तत्व दिखता है जिसका इस्तेमाल उन्होंने कई बार हिन्दी फ़िल्मों के गीतों में छाया की तरह किया है.

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अलग किस्म की मिठास

इसी कारण शायद वे लोक-रंग का हल्का-सा स्पर्श या बघार लगाते हुए गीत को अतिरिक्त कोमलता दिलाने में अचूक साबित हुए हैं. यह इसलिए भी संभव है कि उनकी सांस्कृतिक जड़ें बिहार की देशज संस्कृति से सीधे जुड़ी रहकर लोक-परम्परा में निहित थीं.

जिसके चलते भोजपुरी के संस्कारों की ज़्यादा सटीक बुनावट का काम उनके संगीत का एक उल्लेखनीय पहलू बनकर भी उभर सका. यही कारण है कि उनके गीतों में अलग किस्म की मिठास सदैव बनी रहती थी. आज संगीत के शोधार्थी और गंभीर विश्लेषक इस बात पर सहमत हैं कि चित्रगुप्त का उनके समय में उचित आकलन नहीं हुआ.

वे हर दौर में, लोकप्रिय व मुख्य-धारा के संगीतकारों की तुलना में आलोचकों द्वारा खारिज़ ही किए जाते रहे. इससे एक नुक़सान यह हुआ कि उनके द्वारा बनाई हुई तमाम धुनों को वैसा प्रचार सुलभ नहीं हो सका जिसकी वे सब कलात्मक दृष्टि से सर्वथा पात्र थीं.

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Image caption लता मंगेशकर के एकल गीतों की समृद्ध विरासत में चित्रगुप्त का एक बड़ा भाग शामिल है

समृद्ध विरासत

आप स्टंट व सामाजिक फ़िल्मों से युगल-गीत चुनें या धार्मिक, पौराणिक फ़िल्मों के आँगन से कोई भजन, प्रार्थना या लोरी गीत- सभी जगह उनका काम लाजवाब क़िस्म का ठहरता था. लता मंगेशकर के एकल गीतों की समृद्ध विरासत में चित्रगुप्त का एक बड़ा भाग शामिल है.

हम जब भी लता मंगेशकर की संगीत-यात्रा का विमर्श जुटाने बैठते हैं तो वहाँ नौशाद, सी रामचन्द्र, शंकर-जयकिशन, हेमन्त कुमार, एसडी बर्मन, रोशन, मदन मोहन एवं लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के बनाये हुए गीतों को ही एकांगी भाव से इस मूल्यांकन का आधार चुन लेते हैं, जबकि सच्चाई यह भी है कि इस फ़ेहरिस्त में चित्रगुप्त को शामिल किये बग़ैर यह विमर्श पूरा होता हुआ दिखाई नहीं देता है.

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