पंडित रवि शंकर: 'नीचा नगर' से 'पाथेर पांचाली' तक

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भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक नक्षत्र की तरह स्थापित सितार के अप्रतिम कलाकार पंडित रविशंकर का जीवन कला के अर्थों में अपनी शास्त्रीयता संजोने के साथ-साथ फ़िल्म संगीत की दुनिया का भी पथिक रहा है.

एक ऐसा कलाकार, जिसकी स्तरीयता को सितार के क्षेत्र में विश्व स्तरीय प्रशंसा प्राप्त है और जिनका होना पश्चिम में भारतीय संगीत का सबसे प्रमुख चेहरा माना जाता है.

हिंदी फ़िल्म संगीत में अपनी कुछ एक फ़िल्मों के चलते पंडित रविशंकर ने जो शिखर उपस्थिति अर्जित की है, उसकी तुलना किसी भी दूसरे पूर्ववर्ती या समकालीन संगीतकार से हो ही नहीं सकती.

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'नीचा नगर'

पंडित रविशंकर ने अपने आरंभिक दिनों में यथार्थवादी फ़िल्मों के माध्यम से फ़िल्म संगीत का एक नया व्याकरण गढ़ना शुरू किया था, जब वे पहले-पहल चेतन आनंद निर्देशित प्रगतिशील फ़िल्म 'नीचा नगर' (1946) के माध्यम से फ़िल्मों की दुनिया में आए.

उस दौर में जब नाटकीयता और भारी आवाज़ों के द्वारा फ़िल्म संगीत रचने का काम एक रूटीन ढंग का स्वरूप अख्तियार कर चुका था, ऐसे में रविशंकर शास्त्रीय रागों के सहारे धुनों में प्रगतिशील बुनावट का काम अनूठे ढंग से सिरज रहे थे.

'नीचा नगर' का गीत 'कब तक घिरी रात रहेगी' इस मामले में एक आदर्श उदाहरण है, जिसे यू-टूयूब पर सुनकर समझा जा सकता है.

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सितार की ज़मीन

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एक ऐसा कलाकार, जिसकी स्तरीयता को सितार के क्षेत्र में विश्व स्तरीय प्रशंसा प्राप्त है.

वे अपनी फ़िल्मों के संगीत में धुन रचते वक्त उसके साउण्ड ट्रैक को तमाम पार्श्वध्वनियों से भी समृद्ध कराते थे, जिनमें आलापों, तानों और सितार के बहलाव की छोटी-छोटी युक्तियाँ भी असरकारी दिखाई देती थीं.

उनके द्वारा यह काम 'नीचा नगर' और 'धरती के लाल' से लेकर सत्यजित रे की 'पाथेर पांचाली' तक में देखा जा सकता है.

एक दिलचस्प तथ्य यह भी गौरतलब है कि जहाँ अधिकांश संगीतकार अपनी धुनों को रचने का काम पियानो, आर्गन और हारमोनियम को आधार बनाकर करते थे, वहीं पंडित रविशंकर की अधिकांश धुनें सितार की ज़मीन से विकसित होती थीं.

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Image caption गायक और गीतकार जॉर्ज हैरीसन के साथ पंडित रवि शंकर

लता की आवाज़

उनके माध्यम से सृजित लगभग हर धुन को सितार की स्वरावली पर गुनगुनाकर देखा जा सकता है. रविशंकर के संगीत से सन्दर्भित तीन फ़िल्में हिन्दी सिनेमा में अमर संगीत का पर्याय बन चुकी हैं, जिनके माध्यम से हम एक पूरा 'रविशंकर-युग' बनता हुआ देख सकते हैं.

ऐसे में, 'अनुराधा', 'गोदान' और 'मीरा' को याद करना प्रासंगिक होगा. तीनों ही फ़िल्मों के द्वारा वे लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी और वाणी जयराम की आवाज़ों का नव-प्रवर्तन करते हैं, जिसके पहले यह काम किसी दूसरे संगीतकार ने सम्भव नहीं किया था.

'अनुराधा' को तो पंडित रविशंकर की सबसे महानतम रचना के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें लता मंगेशकर की आवाज़ भी अद्भुत ढंग से कोमलता और शास्त्रीयता के बीच दोलन करती है.

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रवि शंकर की 'मीरा'

'कैसे दिन बीते कैसे बीते रतियाँ, पिया जाने ना' की भावनात्मक कोमलता और सहज दोलन को देखना अभूतपूर्व है.

मांझ-खमाज, तिलक-कामोद, जन-सम्मोहिनी, जयजयवन्ती, मल्हार, गुर्जरी तोड़ी, देश और भैरवी जैसे रागों पर आधारित करके उन्होंने इन तीनों फिल्मों में जो विलक्षण संगीत रचा, वह कहीं न कहीं उनकी शास्त्रीय तैयारी और मैहर घराने की उस परम्परा को रेखांकित करता है, जिसमें उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब की सोहबत और तालीम मिली हुई थी.

'मीरा' के माध्यम से उन्होंने इस विरहिणी कवयित्री के भजनों का जो प्रामाणिक संगीत रचा है, वह बार-बार सुनने को प्रेरित करता है.

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मैहर घराना

राजस्थानी सन्दर्भों का शास्त्रीय ढंग से आत्मसात करते हुए, जिस तरह पंडित रविशंकर ने 'बाला मैं बैरागन हूँगी', 'प्यारे दर्शन दीजो आज', 'श्याम मने चाकर राखो जी', 'मैं सँवारे के रंग राची', 'बादल देख डरी' और 'मेरे तो गिरधर गोपाल' जैसी अमर धुनें और गीत रचे, वह हिन्दी फ़िल्म संगीत को उनके महानतम योगदान के रूप में स्थापित करता है.

पंडित रविशंकर के संगीत को इसी अर्थ में देखने की ज़रूरत है कि वह शास्त्रीयता, लोक-व्याप्ति और परम्परा के बीच में गमन करते हुए अपनी एक बिलकुल नई ज़मीन तैयार करता है, जहाँ मैहर घराने का सितार अपने पूरे सौंदर्य में मौजूद है.

'अनुराधा', 'गोदान' और 'मीरा' के बहाने पंडित रविशंकर का स्थान भी स्थाई तौर पर एक मौलिक संगीतकार के रूप में हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास में सुनहरे हर्फों में दर्ज़ रहेगा. अलग से, उनके संगीत का शास्त्रीय वैभव तो आकाश में चमकते रवि की तरह युगों तक असंदिग्ध बना ही रहेगा.

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