बड़े पर्दे की हिट कहानियों की छोटे पर्दे पर नकल

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कॉपी कैट की आदत इन दिनों सिर्फ बॉलीवुड तक ही सीमित नहीं रह गई है. छोटे पर्दे पर वैसे धारावाहिक दिखाए जा रहे हैं जो बड़े पर्दे पर हिट साबित हो चुके हैं.

मराठवाड़ा के इतिहास पर आधारित डायरेक्टर संजय लीला भंसाली की 'बाजीराव मस्तानी' एक कामयाब फिल्म साबित हुई. अब सोनी चैनल पर 'पेशवा बाजीराव' नाम से एक सीरियल दिखाया जा रहा है.

हालांकि 'पेशवा बाजीराव' के लेखक फैज़ल अख्तर का मनना है कि 'छोटा पर्दा बड़े पर्दे को हूबहू कॉपी नहीं करता है, लेकिन बड़े भाई की तरह मार्गदर्शन ज़रूर लेता है. पेशवा बाजीराव में कहानी सिर्फ बाजीराव पर ही नहीं बल्कि पेशवा के आसपास के लोगों को भी दिखाया गया है.'

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बड़े पर्दे पर...

ज़िंदगी चैनल पर दिखाए गए धारावाहिक 'अगर तुम साथ हो' भी फ़िल्म 'डर' पर आधारित है. इस सीरियल में ठीक वैसा ही दिखाया गया है जैसा शाहरुख़ खान और जूही चावला स्टारर 'डर' में दिखाया गया था. धारावाहिक 'अगर तुम साथ हो' में भी एक साइको लवर है.

'इंतज़ार और सही' (दूरदर्शन), 'शगुन' (स्टार प्लस) और 'उड़ान' (कलर्स) जैसे धारावाहिकों के लेखक राजेश सक्षम बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं, "कई बड़ी फिल्में छोटे-छोटे शहरों के सिनेमाघरों तक पहुंच भी नही पाती हैं. तो ऐसे में बड़े पर्दे पर दिखाई जा चुकी फिल्मों पर आधारित धारावाहिक लोगों तक पहुंचाने का सही तरीका भी होता है और लोग उसे देखना भी पसंद करते हैं."

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मिलती-जुलती कहानी

वहीं 'एंड टीवी' पर प्रसारित हो रहे सीरियल 'बढ़ो बहू' में फिल्म 'दंगल' का सीक्वल देखने को मिला. सीरियल में ठीक वैसा ही दिखाया गया जैसा 'दंगल' में आमिर ख़ान अपनी बेटियों को पहलवानी करने के लिए प्रेरित करते थे.

हालाकि ये कहना भी गलत नहीं होगा कि सीरियल 'बढ़ो बहू' 2015 में बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुके डायरेक्टर शरत कटारीया की फ़िल्म 'दम लगा के हइसा' से मिलती-जुलती है.

डायरेक्टर उमेश शुक्ला के निर्देशन में बनी फ़िल्म 'ओएमजी' ने 2012 में बड़े पर्दे पर खूब सुर्खियां बटोरी और इसी फ़िल्म पर आधारित धारावाहिक 'नीली छतरी वाले' ज़ी टीवी पर अगस्त 2014 में शुरू हुआ.

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नीली छतरी वाले

सीरियल 'नीली छतरी वाले' में फ़िल्म अभिनेता यशपाल शर्मा भगवान दास के किरदार में नज़र आए.

'अतिथि तुम कब जाओगे' और 'सन ऑफ सरदार' के डायरेक्टर अश्विनी धीर धारावाहिक 'नीली छतरी वाले' के निर्माता हैं.

साल 2001 में बॉक्स ऑफिस पर रिलीज़ हो चुकी फ़िल्म 'अशोका' की तर्ज पर 2015 में 'चक्रवर्ती अशोक सम्राट' धारावाहिक बना जिसे कलर्स पर प्रसारित किया गया.

इतिहास की सबसे यादगार लव स्टोरी पर बनी फ़िल्म 'जोधा अकबर' ज़ी टीवी पर धारावाहिक के रूप में पेश की गई.

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ऐतिहासिक कहानी

लेखक राजेश सक्षम कहते हैं, "फिल्मों में ढाई से तीन घंटे में कहानी खत्म हो जाती है, लेकिन धारावाहिक में सिर्फ एक ही किरदार मुख्य भूमिका में नहीं होता बल्कि हरेक पहलू पर, हर एक चरित्र का चित्रण किया जाता है और कोशिश की जाती है जो बात अब तक सामने नही आई हो उसे भी दर्शकों तक पहुचाया जा सके."

वैसे छोटे पर्दे का चर्चित धारावाहिक 'रानी लक्ष्मीबाई' भी दर्शकों को अपनी ऐतिहासिक कहानी की वजह से जोड़े रखा.

लेकिन यहाँ मामला थोड़ा उल्टा है क्यूंकि सीरियल 2009 से शुरू हुआ और 2011 तक चला. अब आने वाले साल में 'मणिकर्णिका-द क्वीन ऑफ़ झाँसी' बड़े पर्दे पर दस्तक देगी.

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दर्शकों की सराहना

हालांकि अगर फिल्मों के इतिहास पर नज़र डालें तो साल 1953 में ही 'झाँसी की रानी' पर फिल्म बनाई गई जो सबसे पहली टेक्नो फिल्म की लिस्ट में शामिल है.

साल 1976 में बड़े पर्दे रिलीज़ हुई फिल्म 'नागिन' जितनी सुर्ख़ियों में रही, ठीक वैसे ही पिछले साल कलर्स पर प्रसारित हो चुके धारावाहिक 'नागिन' को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया.

महेश भट्ट के निर्देशन में बानी फिल्म 'ज़ख्म' को खुद महेश भट्ट ने धारावाहिक 'नामकरण' के नाम से स्टार प्लस पर धारावाहिक का रूप दिया.

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जमाई राजा

1990 में आई अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित की 'जमाई राजा' के नाम से एक सीरियल ज़ी टीवी पर लम्बे वक़्त तक चली.

अभी से 10 साल पहले बड़े पर्दे पर हिट हुई फिल्म 'परदेस' पर भी एक सीरियल बना 'परदेश में है मेरा दिल.' इसकी कहानी भी उसी 'परदेस' से इंस्पायर्ड है.

वहीं इंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट श्राबंती बनर्जी कहती हैं, "इन दिनों धारावाहिकों में शॉर्टकर्ट का फॉर्मूला अपनाया जा रहा है. बॉक्स ऑफिस पर सक्सेस हो चुकी फ़िल्मों पर आधारित धारावाहिकों को दर्शक आसानी से मिल जाते हैं, और दर्शक जुटाने का दबाव ख़त्म हो जाता हैं."

फिल्मों पर आधारित धारावाहिकों की लिस्ट और भी लम्बी है लेकिन इतना ज़रूर है कि बड़े पर्दे पर सुर्खियां बटोर चुकी फिल्में छोटे पर्दे के लिए मार्गदर्शक ज़रूर होती हैं.

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