सज्जाद हुसैन: जटिल धुनों की मधुरता का फ़नकार

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महान संगीतकार सज्जाद हुसैन साहब को उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में याद करना फ़िल्म संगीत के इतिहास में विमर्श के लिए बेहद सम्मान की बात है.

एक ऐसे समय में जब संगीत को लेकर प्रयोगों और तकनीकी की सबसे समृद्ध दशा में हमारा हिन्दी फ़िल्म संगीत पहुँच गया है, अपने दौर के उस फ़नकार को याद करना प्रासंगिक बन जाता है, जिसने तकनीकी को भी एक पक्ष की तरह अपनी कला-यात्रा में बाक़ी ज़रूरी चीजों की तरह ही साधा. जैसे, सुरों को बांधने के वक़्त तानपुरे की जवारी समेत सरगम और तान-पलटों को सम्भाला जाता है.

मेरे लिए यह जानना सुखद अनुभव रहा कि जब मैंने लता जी से लम्बी बातचीत के दौरान लगभग सारे ही संगीतकारों के बारे में बात की, तो जिन कुछ लोगों के लिए वे उत्साह से भरकर हर समय बात करती थीं, उनमें सज्जाद साहब प्रमुखता से शामिल रहे.

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अलग राह पकड़ी

अरबी शैली के संगीत के टुकड़ों से अपनी धुनें सजाने में माहिर सज्जाद हुसैन ने ऐसे ढेरों प्रयोग मौलिक तरह से ईज़ाद किये थे. ठीक उसी समय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के व्याकरण से चुनकर राग-रागनियों के स्वरों का इस्तेमाल भी उनका पसंदीदा काम रहा.

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प्रयोगों को मौलिकता देने वाला संगीतकार

वे इस मामले में लीक से हटे हुए संगीतकार रहे हैं, जिन्होंने अपने समकालीनों की राह से दूरी बरतते हुए कुछ तिरछा रास्ता पकड़ा. हिन्दी में जिस तरह शमशेर बहादुर सिंह और शास्त्रीय संगीत में उस्ताद अमीर खां साहब का मार्ग रहा है.

'संगदिल', 'सैयां', 'खेल', 'हलचल' और 'रुस्तम-सोहराब' जैसी फ़िल्मों से अनूठा संगीत देने में सफल रहे सज्जाद साहब, दरअसल उस ज़माने में पार्श्वगायकों व गायिकाओं के लिए कठिन फ़नकार थे, जिनकी धुनों को निभा ले जाना, सबके हौसले से परे की चीज़ थी. उनकी दुरूह संगीत-शब्दावली को समझना हर एक के बस की बात नहीं थी, फिर भी, अधिकांश कलाकारों ने उनकी तबीयत के हिसाब से ही अपना बेहतर देने का काम किया.

लता की उपलब्धि

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Image caption सज्जाद हुसैन, लता मंगेश्कर और सज्जाद के बेटे नसीर अहमद

स्वयं लता मंगेशकर जी ने मुझसे बताया था, जो 'लता सुर-गाथा' में दर्ज़ है, "मैं सज्जाद साहब की 'संगदिल' के गीतों को अपने करियर में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखती हूँ. मैं इतना ही कह सकती हूँ कि ऐसा म्यूज़िक, जो सज्जाद हुसैन बनाते थे और किसी ने बनाया ही नहीं है."

वे अपने पार्श्वगायन करियर में कुछ सबसे कठिन गीतों में एक बड़ा स्थान सज्जाद हुसैन की कम्पोजीशन 'ऐ दिलरुबा नज़रें मिला' को देती हैं, जो लगभग ऑफ़ बीट संगीत का सुन्दरतम उदाहरण है. यह फ़िल्म एक हद तक सज्जाद हुसैन द्वारा संगीतबद्ध सबसे उल्लेखनीय फ़िल्म के रूप में याद की जा सकती है, जिसमें संगीतकार ने लता जी के अलावा दो अन्य महत्वपूर्ण पार्श्वगायिकाओं से दो अप्रतिम गीत गवाए हैं.

इसमें सुरैया की आवाज़ में 'ये कैसी अज़ब दास्ताँ हो गयी है' और आशा भोंसले की आवाज़ में 'अब देर हो गयी वल्लाह' को याद किया जा सकता है.

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Image caption मोहम्मद रफी के साथ सज्जाद हुसैन

मैंडोलिन, एकॉर्डियन, गिटार, क्लैरोनेट, वॉयलिन, पियानो, बैंजो- लगभग सभी वाद्यों पर उनकी पकड़ देखने लायक थी. तानों, मींड़ और मुरकियों पर उनका प्रयोग फ़िल्मीं धुनों के सन्दर्भ में एक नए क़िस्म का असर पैदा करता है, जो लगभग हर दूसरी कंपोज़ीशन में आप आसानी से सुनकर पकड़ सकते हैं. उनके लिए नूरजहां भी एक बेहद ज़रूरी गायिका के रूप में उनकी संगीत-यात्रा में शामिल रही हैं.

1944 में आई 'दोस्त' फ़िल्म में उनका और नूरजहां का साथ कमाल का रंग लिए हुए था. इस फ़िल्म का एक गीत 'बदनाम मुहब्बत कौन करे' तो आज भी संगीतप्रेमियों के दिलों में एक महान गीत की तरह संरक्षित है.

सज्जाद साहब की दिवानगी

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सज्जाद साहब के गर्म और अक्खड़ स्वभाव के कई किस्से चर्चित रहे हैं, जो कहीं न कहीं से उनके संगीत के प्रति दीवानगी का सबब ही लगते हैं. एक किस्सा तो यह बहुत मशहूर रहा है कि वे नूरजहां और लता मंगेशकर के अलावा किसी और को गाने के लायक मानते ही न थे. यह अलग बात है कि उन्होंने कई गायक-गायिकाओं से अपनी संगीतबद्ध फ़िल्मों में कुछ बेहद सुन्दर गीत गवाए.

एक बड़े संगीतकार के जन्म-शताब्दी वर्ष में, इस ज़रूरी फ़नकार को याद करना तकनीकी, फन, मौसीकी और अभ्यास के कठिनतम सरोकारों को सहेजना है, जिसकी तमाम धुनों की स्वर-संगति के दोलन व कम्पन में फ़िल्म संगीत के कई अनसुलझे अध्याय बिखरे हुए हैं.

'संगदिल' से ही लता जी के गाए हुए इस गीत के मुखड़े को आप सभी से शेयर करते हुए सज्जाद साहब को दूर बादलों के पार हम संगीत रसिकों का सलाम पहुँचे- 'वो तो चले गए ऐ दिल, याद से उनकी प्यार कर.....

(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)

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