लता के मुक़ाबले आशा भोंसले का बेहतर इस्तेमाल करने वाले रवि

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हिंदी फिल्मों के अजातशत्रु संगीतकार रवि

रविशंकर शर्मा उर्फ़ 'रवि' हिन्दी फ़िल्म संगीत के ऐसे परिश्रमी संगीतकार के रूप में याद किये जाते हैं, जिनकी सहज धुनों ने सफलता के बड़े कीर्तिमान स्थापित किए.

रवि का आगमन भी बेहद रोचक तरीके से उनके हिन्दी ज्ञान के चलते फ़िल्मों की दुनिया में हुआ था. अपने शुरुआती दौर में हेमन्त कुमार जैसे बड़े संगीतकार के सहायक के रूप में वो फ़िल्म संगीत की दुनिया से जुड़े.

हेमन्त कुमार उनकी अच्छी हिन्दी के कारण उन्हें 'पण्डित जी' कहते थे और उनकी हिन्दी पर मज़बूत पकड़ के चलते अपने गीतों के लिए ज़रूरी सलाह भी लिया करते थे.

यह जानना सुखद है कि बचपन से संगीत के प्रति आसक्त रहे रवि, हेमन्त कुमार के साथ बतौर सहायक जिन फ़िल्मों से जुड़े रहे, उनमें 'शर्त', 'नागिन', 'दुर्गेशनन्दिनी' और 'एक ही रास्ता' जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्में शुमार हैं.

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रवि के बारे में जो महत्वपूर्ण बातें उन्हें एक सफल संगीतकार बनाती हैं, उनमें तमाम ऐसी चीज़ें भी शामिल रही हैं, जो उस दौर के अन्य बड़े संगीतकारों के यहाँ मुश्किल से मिलती थीं.

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मसलन यह कि वे ऐसे अजातशत्रु संगीतकार रहे, जिनकी मित्रता सभी ख़ेमे के लोगों से सामान्य आत्मीय धरातल पर रहीं या कि उनके लिए हर गायक-गायिका का एक ही स्तर पर सम्मानजनक स्थान रहा या फिर उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता बैनर और निर्देशक की रहती थी कि निर्देशक जैसी धुन और संरचना अपनी फ़िल्मों के लिए चाहता था, वे वैसा ही करने की हरसंभव और ईमानदार कोशिश करते थे.

रचानात्मक यात्रा

रवि की रचनात्मक-यात्रा हेमंत कुमार से आरंभ होकर, स्वतंत्र संगीतकार के रूप में काम दिलाने के लिए देवेंद्र गोयल तक जाती है, जिनकी फ़िल्म वचन (1955) से बतौर संगीतकार उन्होने अपने करियर की शुरूआत की.

इसके बाद इस राहगुज़र में प्रमुख रूप से एसडी नारंग, रामानंद सागर, ए ए नाडियाडवाला, एस एस वासन, ए वी मय्यपन, बी आर चोपड़ा, वासु मेनन, शिवाजी गणेशन एवं गुरुदत्त के नाम शामिल होते जाते हैं.

एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में रची गई लगभग अस्सी फ़िल्मों में से कुछ उल्लेखनीय फ़िल्में इस तरह हैं- 'घूंघट' (1960), 'घराना' (1961), 'गृहस्थी' (1963), 'औरत' (1967), 'समाज को बदल डालो' (1970), 'भरोसा' (1963), 'ख़ानदान' (1965) एवं 'नई रोशनी' (1967), 'दो कलियाँ' (1968) एवं 'मेहरबान' (1967).

अलग से बीआर चोपड़ा की ढेरों फ़िल्मों का नाम लिया जाना चाहिए, जिनमें 'ग़ुमराह' (1963), 'वक्त' (1965), 'हमराज़' (1967), 'आदमी और इंसान' (1969), 'धुंध' (1973), 'निक़ाह' (1982), 'आज की आवाज़' (1984), 'तवायफ़' (1985 निर्माता आर. सी. कुमार), 'दहलीज़' (1986) और 'अवाम' (1987) प्रमुख हैं.

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रवि के बारे में अलग से रेखांकित करने वाला एक तथ्य यह भी है कि उन्होंने लता मंगेशकर के मुक़ाबले आशा भोंसले के लिए ज़्यादा ख़ूबसूरत ढंग से तर्ज़ें बनाईं.

आशा भोंसले के गीतों की विरासत में हमेशा ओपी नैय्यर और आरडी बर्मन का नाम लिया जाता है, मगर जल्दी रवि के योगदान की चर्चा नहीं होती.

व्यक्तित्व का कोमल पक्ष

आशा भोंसले की विविधतापूर्ण संगीत के धरातल का मूल्यांकन हम रवि की उन श्रेष्ठतम धुनों से कर सकते हैं, जो उनके संगीतकार व्यक्तित्व का एक अलग ही कोमल पक्ष को व्यक्त करती हैं.

आप भी इन गीतों को गुनगुनाना चाहेंगे- 'चन्दा मामा दूर के' (वचन), 'तुम संग लागी बालम मोरी अंखियां' (अलबेली), 'बहार ले के आई क़रार ले के आई' (जवानी की हवा), 'इस तरह तोड़ा मेरा दिल', 'पवन मोरे अंगना में धीरे-धीरे आना' (शहनाई), 'सितारों आज तो हम भी तुम्हारे साथ' (राखी), 'तोरा मन दरपन कहलाए', 'मेरे भइया मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन' (काजल), 'दिल की कहानी रंग लाई है' (चौदहवीं का चाँद), 'कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी', 'चेहरे पे खुशी छा जाती है', 'आगे भी जाने न तू' (वक्त), 'शीशे से पी या पैमाने से पी' (फूल और पत्थर), 'ये रास्ते हैं प्यार के' (ये रास्ते हैं प्यार के), 'मत जइयो नौकरिया छोड़ के', 'जब चली ठंडी हवा' (दो बदन), 'सैयां ले गयी जिया तेरी पहली नज़र' (एक फूल दो माली), 'ज़िन्दगी इत्तेफ़ाक़ है' (आदमी और इंसान), 'हुज़ूर आते आते बहुत देर कर दी' (तवायफ़) एवं 'कैसी मुरली बजाई घनश्याम' (अवाम).

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हालांकि आशा भोंसले के समानांतर रवि द्वारा रचे गए लता मंगेशकर के एकल गीतों की बेहद दिलचस्प सूची भी यहाँ रेखांकित की जा सकती है, जो इस संगीतकार की ऐसी शीर्षस्थ गायिका की अदम्य प्रतिभा के प्रति प्रणति निवेदन जैसी लगती है.

ऐसे में, उदाहरण के तौर पर याद रखे जाने वाले कुछ गीत इस तरह हैं-

'ऐ मेरे दिले-नादां तू ग़म से न घबराना' (टावर हाऊस), 'वो दिल कहां से लाऊं तेरी याद जो भुला दे' (भरोसा), 'लागे न मोरा जिया', 'मोरी छम-छम बाजे रे पायलिया' (घूँघट), 'बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं' (चौदहवीं का चाँद), 'तुम्हीं मेरे मन्दिर, तुम्हीं मेरी पूजा' (ख़ानदान), 'सपने हैं सपने, कब हुए अपने' (नयी रोशनी), 'टिम-टिम करते तारे' (चिराग कहाँ रोशनी कहाँ), 'लो आ गयी उनकी याद' (दो बदन), 'ग़ैरों पे करम, अपनों पे सितम' (आँखें), 'दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दीया' (एक महल हो सपनों का), 'बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आँख के तारे' (दो कलियाँ) जैसे तमाम सदाबहार ढंग से कंपोज़ किये गए कर्णप्रिय गीत.

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ताज़गी भरा एहसास

रवि के लिए उनके संगीतकार पक्ष को लेकर जो सर्वाधिक महत्व की बात सामने आती है, उसमें यह जानना ज़रूरी है कि उनका संगीत उस हद तक ही आधुनिक होने की मांग करता हैं, जिसमें उसकी पूर्ववर्ती परम्परा की अनुगूंजों का समावेश भी संतुलित ढंग से शामिल माना जाए.

वे ऐसी स्वच्छंदता के पैरोकार हैं, जहाँ पूर्वजों का अनुसरण और समकालीन प्रेरणा भी महत्व रखती आई है. शायद इसीलिए उनकी फ़िल्मों के ज़्यादातर गीत अपने दौर की नुमाइंदगी में ताज़गी-भरे एहसास के साथ अपनी सरलता व परम्परा की छाया को भी प्रभावी रूप में व्यक्त करते हैं.

हिन्दी फ़िल्म संगीत में सफलता के तमाम झंडे गाड़ने के बाद, दक्षिण की फ़िल्मों में भी 'बॉम्बे रवि' के नाम से उतनी ही लोकप्रियता अर्जित कर पाना, उनकी अचूक रचनात्मकता पर मुहर ही लगाता है.

(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)

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