एफ़टीआईआई को लेकर अभी मेरा कोई विज़न नहीं: अनुपम खेर

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बॉलीवुड एक्टर अनुपर खेर को भारतीय फ़िल्म एंड टेलिविज़न इंस्टीट्यूट (एफ़टीआईआई) पुणे का चेयरमैन बनाया गया है.

62 साल के अनुपम इसे एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं और कहते हैं कि इस ज़िम्मेदारी को वह पूरी निष्ठा के साथ निभाएंगे.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं 1978 में जनवरी से लेकर जून-जुलाई तक एफ़टीआईआई का छात्र था. उसी संस्थान का उत्तरदायित्व मिलना मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है."

अनुपम कहते हैं कि छोटे से शहर शिमला से जेब में 37 रुपये लेकर आए फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के क्लर्क को छात्रों के साथ मिलकर इस संस्थान को और भी ऊंचाइयों पर ले जाने का मौका मिला है.

बुधवार दोपहर को सरकार ने एफ़टीआईआई के नए अध्यक्ष की घोषणा की. उनसे पहले गजेंद्र चौहान इसके चेयरमैन थे, जिनका कार्यकाल काफ़ी विवादित रहा था.

अनुपम कहते हैं, "मुझे खुशी है कि लोगों को लगता है कि मैं इस पद के लायक हूं. मैं सफ़ेद स्लेट की तरह वहां जाना चाहता हूं."

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छात्रों को पढ़ाएंगे?

एफ़टीआईआई को लेकर विज़न के बारे में पूछने पर अनुपम कहते हैं, "इस बारे में बात करना अभी जल्दबाज़ी है. मेरा क्या विज़न है, मुझे पता नहीं है. मगर ये है कि निष्ठा से काम करने का फ़ैसला किया है, ऐसे में अपने आप कुछ न कुछ रास्ता निकलेगा. पहले से ही अवधारणा नहीं बनाना चाहता और न ही यह बोलना चाहता हूं कि झंडे गाड़ दूंगा."

एफ़टीआईआई के नए चेयरमैन ने कहा, "मैं वहां जाकर छात्रों से समझना चाहता हूं कि वे मुझसे क्या चाहते हैं. मैं अपने अनुभव को उनके साथ शेयर करना चाहता हूं, क्योंकि बाहर निकलने पर हम सभी को काम की ज़रूरत होती है. और काम एटीट्यूड से मिलता है, टैलेंट बाद में आता है."

अनुपम ने कहा कि वह भले ही अध्यक्ष के रूप में जा रहे हैं, मगर छात्रों को पढ़ाएंगे भी.

वह कहते हैं, "मुख्य तौर पर मैं टीचर हूं. मुझे पढ़ाने में बहुत मज़ा आता है. यह इकलौता ऐसा फ़ील्ड है, जहां टीचर को स्टूडेंट्स से सीखने को मिलता है.''

उन्होंने कहा, "मैंने 45 सालों में काम ही काम किया है. फिल्मों में 33 साल हुए हैं मगर थिएटर, ड्रामा स्कूल में भी मैंने काफ़ी कुछ किया है. फिल्मों में मैंने रीजनल से लेकर इंटरनेशनल लेवल तक काम कर चुका हूं और वेब सिरीज़ भी की है. इससे कहीं न कहीं जो मेरा ज्ञान बढ़ा है, उसे मैं बांटना चाहूंगा. छात्रों से भी मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा."

Image caption गजेंद्र चौहान

जिस गांव जाना नहीं...

गजेंद्र चौहान की नियुक्ति का छात्रों ने विरोध किया था और काफ़ी दिनों तक प्रदर्शन हुए थे. ऐसे में अपने लिए आने वाली संभावित चुनौतियों को लेकर अनुपम खेर कहते हैं कि जब ज़िंदगी आसान नहीं है तो चेयरमैनशिप कैसे आसान होगी.

उन्होंने कहा, "हर बड़े संस्थान में मोड़ आते हैं. ठीक उसी तरह, जैसे ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते हैं. मैं इस बात को मन में रखना ही नहीं चाहता कि वहां क्या हुआ था."

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि मुझे सरकार या किसी और की तरफ़ से काम करने की जरूरत पड़ेगी. उन बातों पर जाने से कुछ मिलने वाला नहीं है. मैं काम करने में यकीन रखता हूं, ज़्यादा सोचने में नहीं. मेरी मां कहती हैं- जिस गांव जाना नहीं है, वहां का रास्ता भी क्यों पूछना. अगर छात्रों को लगा है कि उनके साथ ठीक नहीं हुआ, तो उन्हें 'हील' करना जरूरी है. उन्हें समझाना है कि मैं उनकी तरफ़ हूं.''

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अपने मुख्य प्रोफ़ेशन और नई ज़िम्मेदारी के बीच तालमेल को लेकर किए गए सवाल पर अनुपम ने कहा, "दादा जी कहा करते थे कि व्यस्त आदमी के पास सभी चीज़ों के लिए समय होता है. जो खाली बैठता है, उसके पास ही समय नहीं होता है. अभी मुझे बस इतना पता है कि मैं काम करना चाहता हूं और एक फ़र्क दिखाना चाहता हूं."

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