कमलेश्वर: एक अध्याय का अंत

भारत के जाने-माने साहित्यकार और फ़िल्म लेखक कमलेश्वर का शनिवार की रात साढ़े आठ बजे निधन हो गया है.

उनका निधन हृदय गति रुक जाने के कारण हुआ. कमलेश्वर 75 वर्ष के थे. उनका निधन हिंदी साहित्य जगत को एक बड़ा नुक़सान है.

कमलेश्वर का लेखन केवल गंभीर साहित्य से ही जुड़ा नहीं रहा बल्कि उनके लेखन के कई तरह के रंग देखने को मिलते हैं.

उन्हें याद करते हुए हिंदी साहित्यिक पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादव कहते हैं, " कमलेश्वर का जाना मेरे लिए हवा-पानी छिन जाने जैसा है. साहित्य जगत में कमलेश्वर जैसे बहुमुखी और करिश्माई व्यक्तित्व के लोग कम ही हुए हैं."

अदीबों की अदालत की बात करता उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' हो या फिर भारतीय राजनीति का एक चेहरा दिखाती फ़िल्म 'आंधी' हो, कमलेश्वर का काम एक मानक के तौर पर देखा जाता रहा है.

साहित्य जगत को उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2006 में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया.

साहित्य अकादमी ने उन्हें उनके उपन्यास, 'कितने पाकिस्तान' के लिए 2003 में अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया था.

<b>लेखन यात्रा</b>

उन्होंने कई फ़िल्मों का स्क्रीन प्ले लिखे, कई पटकथाएँ लिखीं और दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक के रूप में भी काम किया.

उन्होंने क़रीब 10 उपन्यास, लघु कथाएँ, और कई किताबें लिखीं. इनमें विषय से लेकर शैली तक में विविधता देखने को मिलती है.

उनके कुछ ख़ास कामों में 'काली आंधी', 'लौटे हुए मुसाफ़िर', 'कितने पाकिस्तान', 'तीसरा आदमी', 'कोहरा' और 'माँस का दरिया' शामिल हैं.

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी ज़िले में छह जनवरी, 1932 को जन्मे इस साहित्यकार ने हिंदी साहित्य में नई कहानी को नई दिशा दी.

कमलेश्वर ने हिंदी की कई पत्रिकाओं का संपादन किया. पत्रिका 'सारिका' के संपादन को तो कई लोग आज भी मानक के तौर पर देखते हैं.

उन्होंने कई समाचार पत्रों के संपादन का भी काम किया और क़रीब 100 फ़िल्मों की पटकथाएँ लिखीं.

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