लोगों की रुचि बदली तो संगीत भी बदला

सुनिधि चौहान
Image caption सुनिधि कहती हैं कि जैसा संगीत लोग चाहते हैं वैसा परोसा जा रहा है

हिंदी गायन के क्षितिज पर 90 के दशक में सुनिधि चौहान नाम का एक नया सितारा आया और देखते ही देखते इस सितारे की चमक और आवाज़ की खनक ने सबको अपना मुरीद बना लिया.

फ़िल्म 'मस्त' की मस्त-मस्त आवाज़ हो, फ़िल्म 'धूम' में धूम मचाता उनका गाना 'धूम मचा ले' या फिर 'फ़ना' में देखो ना... सुनिधि के नाम हिट गानों को लंबी फ़ेहरिस्त है.

पेश हैं कुछ समय पहले लंदन में सुनिधि से बीबीसी संवाददाता वंदना की गई ख़ास बातचीत के अंश.

आपने शुरुआत की दहक और शस्त्र जैसी फ़िल्मों से. उसके बाद आई मस्त जिससे आपको नई पहचान मिली. इस साल तो फ़ना, चुप चप के जैसी कई हिट फ़िल्में आई हैं. तो कैसा रहा ये पूरा सफ़र?

सफ़र बहुत ही अच्छा रहा है. मैने सोचा भी नहीं था कि ये सब होगा. धीरे-धीरे अच्छे गाने गाकर मैं यहाँ तक पहुँची हूँ. बहुत अच्छा लगता है ये सब सोच कर. जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो विश्वास नहीं होता कि इतने साल बीत चुके हैं. मैं उम्मीद करती हूँ कि ऐसा ही चलता रहे. लोगों के आर्शीवाद और प्यार की वजह से ही हूँ मैं यहाँ.

बहुत ही छोटी उम्र से गाना शुरू कर दिया था आपने. क्या गायन का विधिवत प्रशिक्षण ले पाईं है आप? कितना अहम मानती हैं आप प्रशिक्षण को?

मुझे बदकिस्मती से प्रशिक्षण लेने का मौका नहीं मिल पाया. जब सीखना चाहती थी तो बहुत सारा काम आ गया और मैं व्यस्त हो गई. मैने जिनसे सोचा था सीखने का, उनके यहाँ मैं दो-तीन क्लास ही कर पाई. प्रशिक्षण बहुत ही अहम है. अगर प्रशिक्षण हो पाए तो उससे कोई नुकसान नहीं होता, फ़ायदा ही होता है.

आपके ज़्यादातर गाने ऊँची पिच वाले होते हैं. गायन शैली में कुछ प्रयोग करने या कुछ नया करने की कोशिश करती हैं आप?

मैं अलग करने के बारे में नहीं सोचती हूँ. बस जब माइक पर होती हूँ तो अलग हो जाता है- ऐसा सब कहते हैं. मेरे सब गाने ऊँची पिच वाले तो नहीं पर हाँ ज़्यादातर गाने 'रेसी' या तेज़ धुन वाले रहे हैं, डांस वाले रहे हैं.

जब आप हाँ बोलती हैं किसी गाने के लिए तो उस वक़्त कौन सी चीज़े मायने रखती हैं- संगीत निर्देशक, गीत के बोल, पैसा....?

मैं ज़्यादा सोचती नहीं हूँ और स्टूडियो में जाती हूँ- बस गाने के बोल ठीक होने चाहिए. बोल अश्ललील नहीं होने चाहिए. हम कोई नहीं होते ये बोलने वाले कि कोई गाना अच्छा है या बुरा.कभी कभी कोई गाना जो आपको इतना पसंद नहीं होता वो हिट हो जाता है. तो काम की स्पिरिट की वजह से मैं हर गाना गाती हूँ और अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करती हूँ.

आपने अश्लील गानों की बात की. अकसर तुलना की जाती है कि पुराने गानों और नए गानों की. कई लोगों का मानना है कि आज के गीतों का स्तर अच्छा नहीं है.

देखिए जो चल रहा है वो अच्छा है. पुराने गाने अच्छे थे वो बिल्कुल सही बात है. लेकिन ऐसी बात नहीं है कि आज के गाने अच्छे नहीं है- शायद उतनी संख्या में नहीं. पर कभी-कभी अच्छे गाने बन जाते हैं. और अगर औसत स्तर के गाने बन रहे हैं तो जो लोग चाहते हैं हम वही देते हैं. लोगों का सुनने का तरीका बदला है. गाने हल्के फ़ुल्के हो गए हैं और शास्त्रीय संगीत पर आधारित नहीं होते.

पसंदीदा गायक कौन से हैं आपके, ख़ासकर समकालीन गायकों में? बहुत सारे हैं- शान, सोनू निगम, केके, कुनाल गांजावाला. गायिकाओं में अल्का यागनिक सबसे ज़्यादा पसंदीदा है. इसके अलावा महालक्ष्मी और श्रेया घोषाल भी अच्छी गायिकाएँ हैं.

कई सालों से बॉलीवुड़ में हैं आप. बॉलीवुड की एक अलग सी छवि होती है लोगों के मन में. आपके लिए कितना मुश्किल या आसान रहा है प्रतियोगिता के बीच यहाँ टिक पाना?

मुझे बॉलीवुड ने बहुत कुछ दिया है. मेरे लिए तो छवि हमेशा अच्छी रहेगी. जितनी उम्मीद नहीं की थी उससे ज़्यादा मिल गया. कुछ लोग अच्छे नहीं है. लेकिन ऐसा हर जगह होता है- अच्छे और बुरे लोग होते हैं. तो हमें अच्छे लोगों के साथ काम करना चाहिए और बुरों को नहीं देखना चाहिए.

आख़िरी सवाल –अब तो आप मुंबई में बस गई हैं लेकिन दिल्ली से आपका गहरा नाता रहा है. दिल्ली की कुछ यादें बांटिए.

मैं 12 साल की थी जब मुबंई आ गई थी. लेकिन मेरी पैदाइश दिल्ली में हुई थी. सो काफ़ी गहरा रिश्ता रहा है दिल्ली से. दिल्ली जब भी जाती हूँ तो अच्छा लगता है और अपने पुराने दोस्तों से मिलती हूँ.