'सरदार जैसे रोल करना चाहता हूँ'

अपने करियर की शुरूआत में विलेन के तौर पर उभरे परेश रावल ने हास्य अभिनेता के रूप में ख़ासी सफलता हासिल की और वे 'सरदार' जैसी फ़िल्मों में

गंभीर अभिनय से अपना लोहा मनवा चुके हैं.

हेराफेरी, गरम मसाला और मालामाल वीकली जैसी फ़िल्मों में लोगों को गुदगुदा चुके परेश रावल कॉमेडी में महारत हासिल कर चुके हैं.

कॉमेडी भी ऐसी कि कभी-कभी तो कुछ बोलने की भी ज़रूरत नहीं, बस हाव-भाव ही काफ़ी हैं हँसाने-गुदगुदाने के लिए.

उनसे बात करके यही लगा कि वे असल ज़िंदगी में भी कम बोलने में यक़ीन रखते हैं.

फ़िल्म 'सर' में विलेन की भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है. 'सरदार', 'वो छोकरी' और 'तमन्ना' जैसी फ़िल्में उनकी अभिनय क्षमता की मिसाल हैं.

लंदन आए परेश रावल ने बीबीसी संवाददाता वंदना से विशेष बात की.

<b>आपकी नई फ़िल्म है चीनी कम, अपने रोल के बारे में बताइए.</b>

इस फ़िल्म में मैं तब्बू के पिता का रोल कर रहा हूँ. गाँधीवादी व्यक्ति है वो. हर वो बाप जिसकी बेटी ज़्यादा उम्र के पुरुष से शादी करने जा रही हो, वो बाप कैसे हड़बड़ा जाएगा, उसी किस्म का रोल है.

उसके सामने बेटी का प्यार है, थोड़ी समझदारी है, तजुर्बा भी है. उसे ये भी लगता है कि बड़ी उम्र के व्यक्ति से शादी करके बेटी पछताएगी. इस तरह के जज़्बात हैं.

<b>ये तो बात हुई फ़िल्म की, असल ज़िंदगी में ऐसा हो जाए तो क्या करेंगे आप?</b>

बेटी का ही दिल रखने पड़ेगा. बेटी का दिल तोड़कर तो बात बन नहीं सकती. समझाने की कोशिश ज़रूर करूँगा. पर अगर बेटी नहीं मानी, तो फिर ठीक है.

<b>हंगामा, हचचल, हेरी फेरी जैसी बेहतरीन कॉमेडी फ़िल्मों में काम किया है आपने. कॉमेडी वाले किरदार विशेष तौर पर पसंद हैं आपको ?</b>

हाँ मुझे अच्छी कॉमेडी पसंद है. लेकिन बेवकूफ़ाना किस्म की कॉमेडी मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती.

<b>आपके अपने पसंदीदा कॉमेडियन कौन-कौन से हैं?</b>

कई कॉमेडियन अच्छे लगते हैं. कॉमेडी करने वाले अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन और नसीरुद्दान शाह बेहतरीन हैं.

<b>आपने काफ़ी साल पहले सरदार पटेल पर बनी फ़िल्म 'सरदार' में भी काम किया था. क्या फिर से उस तरह का रोल करना चाहेंगे?</b>

बिल्कुल करना चाहूँगा. मैं तड़प रहा हूँ ऐसे रोल के लिए.

<b>रोल का चयन करते समय किन बातों पर ग़ौर करते हैं?</b>

कई चीज़ें पर ग़ौर करता हूँ. रोल का चयन करते वक़्त मैं सबसे पहले रोल पर ध्यान देता हूँ.

फिर निर्देशक और उसके बाद निर्माता. ये देखता हूँ कि वो फ़िल्म को अच्छी तरह से रिलीज़ कर पाएगा या नहीं, उसका वितरण करेगा या नहीं, अच्छी फ़िल्म बना पाएगा या नहीं.

<b>हर अभिनेता का अपना एक्टिंग स्टाइल होता है. कुछ को हम स्वाभाविक अभिनेता कहते हैं और कुछ को मैथड एक्टर. आप किस विधा से काम करते हैं.</b>

कभी-कभी मैथड से एक ख़ास तरीके से काम होता है. कभी स्वाभाविक भी होता है. ये तो कला है. कुछ चीज़ें आसानी से आप कर सकते हैं, ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत नहीं पड़ती.

<b>आज की तारीख़ में कई तरह के फ़िल्मी पुरस्कार समारोह होते हैं. आपको भी कई पुरस्कार मिले हैं. आप इन समारोहों में कम दिखाई देते हैं.</b>

मैं कतई पसंद नहीं करता फ़िल्म पुरस्कारों को. मेरे हिसाब से पुरस्कारों का कुछ मतलब नहीं है अपने आप में. मिला तो ठीक, नहीं मिला तो भी ठीक. न कोई खुशी होती है न कोई ग़म होता है.

<b>आने वाली कोई फ़िल्म जिसे लेकर आप उत्साहित हैं?</b>

चीनी कम तो है ही. फिर 'नो स्मोकिंग' आ रही है. मज़ा आया अनुराग कश्यप के साथ काम करके. दर्शकों को भी मज़ा आएगा.

<b>आपका तो थिएटर से गहरा वास्ता रहा है. थिएटर को मिस करते हैं?</b>

मैं थिएटर करता ही रहता हूँ. फ़िल्मों के साथ-साथ लगातार चालू है थिएटर.

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