क़व्वाली की कला प्रभावित

पाकिस्तान में बढ़ रहे आतंकवाद और चरमपंथ के कारण जहाँ सामान्य जन-जीवन को नुक़सान पहुँचा है वहीँ क़व्वाली की कला पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा है.

Image caption पाकिस्तान में क़व्वाली धीरे धीरे विलुप्त होती जा रही है.

भारत में तो इस कला को कोई ख़तरा नहीं है लेकिन पाकिस्तान में क़व्वाली धीरे धीरे विलुप्त होती जा रही है. देश में सुरक्षा की बिगड़ती स्थिति, आत्मघाती हमलों और बम धमाकों ने लोगों में डर पैदा कर दिया है.

क़व्वाली की महफ़िलें आमतौर पर दरगाहों पर लगती हैं लेकिन सुरक्षा के कारण सरकार ने अधिकतर दरगाहों को या तो बंद कर दिया है या फिर वहाँ क़व्वाली की महफ़िलों पर ही प्रतिबंध लगा दिया है.

इस बिगड़ी हुई स्थिति से पाकिस्तान के क़व्वाल काफी परेशान हैं. कराची में रहने वाले क़व्वाल इरफान साबरी का कहना है कि डर की वजह से लोग क़व्वाली की महफ़िलों में भाग नहीं ले रहें हैं.

उन्होंने कहा, "बड़ी इमाम सरकार इस्लामाबाद में हैं, हम लोग वहाँ हर साल मेलों में जाते थे लेकिन डर की वजह से इस साल नहीं जा सके. हम को डर था कि कहीं बम धमाका न हो जाए."

उनके अनुसार अब लोगों ने दरग़ाहों पर भी आना बंद कर दिया है.

चरमपंथ का असर

कुछ साल पहले देश के छोटे बड़े हर शहर में दरगाहों पर बड़ी भीड़ हुआ करती थी और कव्वाली की महफ़िलें भी हुआ करती थीं. बड़े बड़े गायक भी कव्वाली गाया करते थे. कई तो इस कला में बहुत लोकप्रिय भी हुए.

Image caption हाशिम अली अजमेरी कहते हैं कि डर और भय के कारण उनके रोज़गार पर असर पड़ा है.

जब से चरमपंथियों ने मस्जिदों और दरगाहों को निशाना बनाना शुरू किया है तब से क़व्वाली की कला काफी प्रभावित हुई है.

महफ़िलें न होने के कारण कव्वाल भी परेशानी में जीवन बिता रहे हैं. कराची के एक और क़व्वाल हाशिम अली अजमेरी ने कहा कि डर और भय के कारण उनके रोज़गार पर बहुत असर पड़ा है.

उन्होंने बताया, "जो हालात चल रहे हैं, इस में हम भूखे मर जाएंगे, बताओ बच्चों को क्या खिलाएँगे."

उन्होंने कहा, "आत्मघाती हमलों की वजह से अब लोग भी महफ़िलें नहीं करवा रहे हैं."

हाशिम अली अजमेरी और उन के साथी कुछ साल पहले काफी महफ़िलें किया करते, दरगाहों पर जा कर कव्वाली गाते थे. इसके अलावा लोग कव्वाली के लिए उनको घर पर भी बुलाते थे, लेकिन आजकल वह काफी बुरी स्थिति में हैं.

कव्वाली की शिक्षा

डर और भय के इस माहौल में भी कुछ कव्वाल अपनी नई पीढ़ी को कव्वाली की शिक्षा दे रहे हैं.

Image caption क़व्वाली की शिक्षा ले रहे हैं नौशाद.

20 वर्षीय मोहम्मद नौशाद भी उन लड़कों में शामिल हैं जो अपने घर पर कव्वाली सीख रहे हैं.

नौशाद अपने पिता से कव्वाली सीख रहे हैं. उनके पिता बुरहानुद्दीन पाकिस्तान के बड़े कव्वालों में से एक हैं. नौशाद भविष्य में बड़े कव्वाल बनना चाहते हैं.

नौशाद पाकिस्तान में बढ़ते हुए चरमपंथ और आतंकवाद से काफी परेशान हैं. उन्होंने कहा, "कभी भी बंदूक के ज़ोर पर इस्लाम को नहीं फैलाया गया बल्कि इसके लिए प्रेम की ज़रूरत होती है."

उन्होंने कहा कि हमारे बुज़ुर्गों ने भी प्रेम से इस को सरअंजाम दिया. उनके अनुसार समाज को एकजुट रखने में कव्वाली काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

बुरहान साबरी, पाकिस्तान के मशहुर साबरी परिवार के सदस्य हैं और वे आजकल क़व्वाली गाते हैं. उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में कुछ लोग क़व्वाली को सही नहीं मानते और इसका काफ़ी विरोध करते हैं.

उन्होंने कहा कि क़व्वाली ही है जो देश में शांति और अमन का संदेश देती है लेकिन कुछ तत्व नहीं चाहते कि देश में शांति हो.

गौरतलब है कि पाकिस्तान में बरेल्वी मुसलमान कव्वाली को अच्छा मानते हैं जबकि देवबंदी मु्सलमान इसको नहीं मानते हैं और इसका समय समय पर विरोध भी करते रहते हैं.

कराची में रहने वाले कव्वाल समय-समय पर इस कला को बचाने के लिए सरकार से मांग करते रहते हैं लेकिन आज तक सरकार की ओर से कोई उचित क़दम नहीं उठाए गए हैं.

बुरहान साबरी ने कहा, "क़व्वाली को बचाने के लिए उचित क़दम उठाए जाएँ ताकि यह कला विलुप्त होने से बच जाए."

उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने इस स्थिति में इस कला को सहारा नहीं दिया तो यह ख़त्म ही हो जाएगी.

इस स्थिति में क़व्वालों के रोज़गार का तो नुकसान हो ही रहा है साथ ही यह कला भी अपनी आख़री सांसें ले रही है. यह एक ऐसी कला है जो समाज से चरमपंथ या वैमनस्य को ख़त्म कर प्रेम को बढ़ावा देती है.

सरकार और धर्मंनिरपेक्ष तत्वों को चाहिए कि इस कला को बचाने में अपनी भूमिका अदा करें.

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