हुसैन पर फ़िदा

एमएफ़ हुसैन
Image caption एमएफ़ अर्से से देश के बाहर रह रहे हैं

भारत में चित्रकला के सबसे बड़े नाम मक़बूल फ़िदा हुसैन 17 सितंबर को 94 साल के हो गए.

हुसैन भारत के एक प्रतिष्ठित पेंटर हैं जिनकी कलाकृतियों कला के जानकार आश्चर्यजनक क़ीमत पर ख़रीदते हैं. अमरीका की फॉर्ब्स पत्रिका उन्हें भारत का पिकासो कहती है.

लेकिन देश के अंदर उनकी कुछ कलाकृतियां विवाद में रही हैं. इसी वजह से वो अरसे से देश के बाहर रह रहे हैं.

उनके जन्मदिवस के अवसर पर बीबीसी ने मक़बूल फ़िदा हुसैन को क़रीब से जानने वाले कुछ लोगों से बात की और उनके व्यक्तित्व और भारतीय चित्रकला को उनके योगदान के बारे में जाना.

ख़ुशमिजाज़

मशहूर भारतीय पेंटर अपर्णा कौर कहती हैं कि वो देश के बाहर रहने के लिए मजबूर होते हुए भी हमेशा मुस्कराते रहते हैं.

अपर्णा कौर ने बीबीसी को बताया, ''देश के बाहर रहने के बावजूद वो हमेशा प्रसन्नचित रहते हैं. मैं जानती हूं कि वो इस देश से, इसकी संस्कृति से बेहद प्यार करते हैं और इसलिए इस देश और संस्कृति से दूर रहना उन्हें दुखी कर रहा होगा लेकिन वो ये दुख कभी अपने चेहरे पर नहीं आने देते.''

अपर्णा कौर का कहना था कि हुसैन ज़िंदगी को आख़ीर तक जोश के साथ जीना चाहते हैं. वो कहतीं हैं कि उनके साथ कुछ सांप्रदायिक सोच वाले लोगों का व्यवहार वाकई ग़ैरज़रुरी है.

अपर्णा ने बचपन से ही हुसैन और एक अन्य प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल के काम से प्रेरणा ली है.

वो कहती हैं कि 1984 के सिख विरोधी दंगों पर उनकी एक पेंटिग हुसैन के स्टाइल से प्रभावित थी.

ऊर्जा

भारतीय चित्रकार वीर मुंशी कहते हैं कि उन्हें पेंट करते देखना अपने आप में एक अनुभव है.

वीर मुंशी कहते हैं कि हुसैन एक किवदंती हैं और उनकी कला का आयाम और विविधता बेजोड़ है.

उन्होंने बीबीसी को बताया,''हुसैन की कला यात्रा काफ़ी लंबी रही है और उसमें सभी कुछ है जिसकी आप कल्पना कर सकते हैं. 94 साल की उम्र में उनमें जो ऊर्जा है वो देखते ही बनती है.''

वीर मुंशी ने एमएफ़ हुसैन से जुड़ा एक क़िस्सा कुछ यूँ सुनाया- "एक बार अचानक हुसैन साहब कॉफ़ी हाउस में आए, जहां संयोग मैं भी बैठा हुआ था. बैठते ही उन्होंने कुछ स्केच बनाए. उसके बाद वहीं, कॉफ़ी हाउस में ही, उन्होंने वो सारे स्केच लोगों में बांट दिए. मेरे लिए उन्हें ऐसा करते देखना बहुत प्रेरणादायक था".

वीर मुंशी कहते हैं कि हुसैन एक बेहद बढ़िया इंसान हैं जो अलग-अलग किस्म के लोगों से मिलने में रुचि रखते हैं और अपनी काफ़ी सारी कलाकृतियां दान में भी देते रहते हैं.

मुंशी कहते हैं, ''वो जिस तरह से कैनवस पर जगह का इस्तेमाल करते हैं वो अद्भुत है. वो बहुत तेज़ी से अपना ब्रश चलाते हैं और कैनवस के एक कोने से शुरु कर दूसरे कोने में पहुंच जाते हैं और कभी पलट कर वापिस नहीं आते. वो अपने काम में बहुत ही दक्ष हैं.''

कला-यात्रा

के बिक्रमजीत सिंह प्रसिद्ध भारतीय डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मकार और आलोचक हैं जिन्होंने एमएफ़ हुसैन पर एक पुस्तक भी लिखी है.

अपनी किताब मक़बूल फ़िदा हुसैन के बारे में बिक्रमजीत सिंह का कहना है, ''ये किताब 1947 से 2007 तक हुसैन साहब के काम नज़र डालती है. इसमें विस्तार से उनका कला के प्रति नज़रिया है, जैसे उनकी रामायण में रुचि वगैरह. लेकिन मेरी रुचि उनके व्यक्तित्व के बजाय उनकी कला और उसके विकास में ज़्यादा है.''

बिक्रमजीत सिंह कहते हैं,''हुसैन इतने बड़े कलाकार होते हुए ही दंभ या घमंड से कोसों दूर हैं और सबसे मिलते हैं".

उन्होंने कहा कि हुसैन को फ़िल्मों और शायरी के बारे गहरी जानकारी है.

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