मन्ना डे को दादासाहब फालके पुरस्कार

मन्ना डे
Image caption मन्ना डे पचास और साठ के दशक में लोकप्रिय पार्श्वगायक रहे हैं

पचास और साठ के दशक में अगर हिंदी फ़िल्मों में कोई राग पर आधारित गाना होता, तो उसे गवाने के लिये संगीतकारों की पहली पसंद मन्ना डे ही होते थे.

चाहे वो मेरी सूरत तेरी आंखें का 'पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई' हो या दिल ही तो है का 'लागा चुनरी में दाग़', बुढ्ढा मिल गया का 'आयो कहां से घनश्याम' या बसंत बहार का 'सुर न सजे' मन्ना डे हर गाने पर अपनी छाप छोड़ जाते थे.

"शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ बहुत मज़बूत थी ही साथ ही लोकगीत गाने का अंदाज़ भी बढ़िया था." कहते हैं जाने-माने संगीतकार ख़य्याम. "जैसे चलत मुसाफिर मोह लियो रे."

"दो बीघा ज़मीन का मन्ना का गाया गाना अपनी निशानी छोड़ जा मुझे बेहद पसंद है. इसके अलावा पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई भी बढ़िया है".

लेकिन ऐसा नहीं कि मन्ना डे की आवाज़ सिर्फ़ गंभीर गानों पर ही सजती थी. उन्होंने 'दिल का हाल सुने दिल वाला', 'ना मांगू सोना चांदी' और 'एक चतुर नार' जैसे हल्के-फुल्के गीत भी गाये हैं.

गायिका कविता कृष्णमूर्ति ने मन्ना डे के साथ कई साल देश-विदेश में कांर्सट किये हैं. वो कहती हैं, "मन्ना डे को दादा साहब फालके पुरस्कार मिलना बहुत ख़ुशी की बात है. वैसे मैं तो कहूंगी कि ये उन्हें बहुत पहले ही मिल जाना चाहिये था."

"वो ऐसे कलाकार हैं जिन्हें शास्त्रीय संगीत की बहुत अच्छी समझ थी. उनके गाये हुए सभी गानों में एक शालीनता है."

मन्ना डे ने सभी संगीतकारों के लिये कभी शास्त्रीय, कभी रूमानी, कभी हल्के फुल्के, कभी भजन तो कभी पाश्चात्य धुनों वाले गाने भी गाए.

उनकी आवाज़ में एक अजीब सी उदासी भी सुनाई दे जाती थी. काबुलीवाला का 'ए मेरे प्यारे वतन' और आनंद का 'ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय' इसकी मिसाल हैं.

"मन्ना डे की आज अपनी एक जगह है. हर सांचे में ढल जाते थे वो. उनकी क्या तारीफ़ करूं. पानी की तरह वो किसी भी रंग में घुल जाते थे." कहते हैं लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल संगीतकार जोड़ी के प्यारेलाल.

हरफ़नमौला मन्ना डे 90 साल के हैं और उम्र के इस पड़ाव पर भी ज़िंदादिली वैसी ही.

डे को साल 2007 के दादा साहब फालके पुरस्कार से नवाज़ा गया है. उन्हें ये पुरस्कार 21 अक्टूबर को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार समारोह के दौरान दिया जाएगा.

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