विदेशी पर्दे, देसी चेहरे

हॉलीवुड
Image caption हॉलीवुड के एक सीरियल में आसिफ़ माँडवी

अमरीका में चाहे हॉलीवुड की फ़िल्में हों या टीवी सीरियल, सभी में अब दक्षिण एशियाई मूल के लोगों का भी योगदान बढ़ रहा है.

अमरीका के मनोरंजन उद्योग में चाहे वह अभिनेता या अभिनेत्री हों या फिर लेखक और निर्देशक हों सभी क्षेत्रों में अब दक्षिण एशियाई मूल के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और इनमें बड़ी संख्या भारतीय मूल के लोगों की है.

अभी कोई एक दशक पहले ही अमरीकी फ़िल्मों में या टीवी सीरियलों में दक्षिण एशियाई मूल के चेहरे इक्का-दुक्का ही देखने को मिलते थे और उन्हें भी तभी मौका मिलता था जब किसी विदेशी या एशियाई मूल के व्यक्ति का किरदार निभाने की ज़रूरत महसूस की जाती थी.

भारत में जन्मे नोएल डीसूज़ा को 1950 के दशक में कैलिफ़ोर्निया में थिएटर की पढ़ाई करने के बाद भी हॉलीवुड फ़िल्मों में सिर्फ़ लातिनी लोगों के ही रोल करने को मिलते थे जबकि उनके स्कूल में ही पढ़ाई करने वाले जीन हैकमैन और डस्टिन हॉफ़मैन अब हॉलीवुड के दिग्गजों में गिने जाते हैं लेकिन वहीं डीसूज़ा ने हालात से समझौता कर अभिनय छोड़ फ़िल्म पत्रकारिता अपना ली.

Image caption भारतीय मूल की पूजा कुमार को भी हॉलीवुड में जगह मिली है

ऐसी कई मिसालें मौजूद हैं... लेकिन यह तब था. अब 2009 में देखें तो हालात तेज़ी से बदलते नज़र आ रहे हैं.

अब अमरीका में बहुत से भारतीय मूल के कलाकार, लेखक और फ़िल्मकार और मनोरंजन की दुनिया से जुड़े अन्य लोग कई फ़िल्मों और टीवी शोज़ में अहम और विभिन्न भूमिकाओं में नज़र आते हैं.

अमरीकी फ़िल्मों और टीवी कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा का कौशल दिखाने वाले भारतीय मूल के कुछ मशहूर नामों में कल्पेन मोदी या कैलपेन, आसिफ़ मांडवी (द डेली शो), सेंथिल रामामुर्थी (हीरोज़), रेशमा शेट्टी (रॉयल पेंज़), परमिंदर नागरा (ई आर), पूजा कुमार (फ़्लेवर्स, बॉलीवुड हीरोज़) और जय चंद्रशेखर (ड्यूक ऑफ़ हैज़र्ड्ज़) शामिल हैं.

पाकिस्तानी मूल के बाबर अहमद ने रॉयल किल नामक फ़िल्म बनाई है. एक अन्य पाकिस्तानी मूल के एक्टर ने एक फ़िल्म – मैन पुश कार्ट में मुख्य किरदार निभाया है.

बंग्लादेशी मूल की एक फ़िल्म निर्माता अनादील हुसैन भी हॉलीवुड और बॉलीवुड की बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर काम करती हैं.

भारतीय मूल के हॉलीवुड डायरेक्टर मनोज नाईट श्यामलन ने तो अपना लोहा मनवा दिया है लेकिन भारतीय मूल के कलाकारों में कैलपेन को सबसे सफ़ल एक्टर माना जाता है. कैलपेन ने हाउस, 24 और हैरल्ड एंड कुमार फ़िल्मों में अहम भूमिकाएं की हैं. वह अब ओबामा प्रशासन में सार्वजनिक मामलों के निदेशक हैं.

मुंबई में जन्मे आसिफ़ मांडवी ने अमरीका में 1980 के दशक में अभिनय करना शुरू किया था और अब वह अमरीकी मनोरंजन उद्योग का जाना पहचाना नाम बन गए हैं.

नई नस्ल

अमरीकी टेलीविज़न के - द डेली शो - पर स्क्रीन पर आने के साथ-साथ वह लेखक के तौर पर भी काम करते हैं और अब मांडवी भारतीय मूल के मशहूर हॉलीवुड डायरेक्टर मनोज नाईट श्यामलन की नई फ़िल्म – द लास्ट ऐयरबेंडर - में भी अहम किरदार निभा रहे हैं लेकिन आसिफ़ मांडवी को वह दौर भी याद है जब अमरीकी फ़िल्मों और टीवी शोज़ में भारतीय मूल के कलाकार दाल में नमक के बराबर भी नहीं होते थे.

वह कहते हैं, “जब मैंने अमरीका में 1980 के दशक में अभिनय का काम शुरू किया तो देसी चेहरे तो बहुत ही कम देखने को मिलते थे. हॉलीवुड में और टीवी पर तो कोई रोल ही नहीं होता था भारतीय मूल के लोगों के लिए लेकिन मैं तो अभिनय ही करना चाहता था और कोई हुनर मुझमें था ही नहीं. इसलिए मजबूरन अभिनय में ही लगे रहे और हालात से जूझने की ठान ली थी.”

आसिफ़ कहते हैं कि उनके माता-पिता तो ऐक्टिंग को करियर चुने जाने पर सख़्त परेशान थे और सोचते थे कि गया लड़का काम से लेकिन अब क्या कहते हैं उनके माता पिता- आसिफ़ हँसते हुए कहते हैं, “अरे अब तो वह बहुत खुश हैं और गर्व करते हैं और मेरी फ़िल्मों और टीवी के शोज़ बराबर देखते हैं. मेरी माँ तो मुझे रोज़ाना टीवी पर देखती हैं और खुश होती हैं.”

इसी तरह पूजा कुमार भी न्यूयॉर्क में बसी हुई भारतीय मूल की अमरीकी अभिनेत्री हैं. उन्होंने फ़्लेवर्स नाम की एक फ़िल्म में काम किया और कई टीवी धारावाहिकों में भी काम कर चुकी हैं.

हाल में उन्होंने एचबीओ कंपनी के एक धारावीहिक – बॉलीवुड हीरो - में हॉलीवुड के क्रिस कटैन के साथ मुख्य किरदार निभाया.

पूजा का कहना है कि अमरीका में रहने वाले दक्षिण एशियाई समुदाय को अब संगठित होकर अपने कलाकारों, लेखकों और फ़िल्मकारों की मदद करनी चाहिए.

वह कहती हैं, “अब अमरीका में दक्षिण एशियाई समुदाय और हमारी क्षमताएं काफ़ी बढ़ गई हैं, इसलिए अब हमें मिलकर अपनी क्षमताओं का प्रयोग करके फ़िल्म और मनोरंजन के क्षेत्र पर भी ज़ोर देना चाहिए और उभरती हुई प्रतिभाओं, चाहे वह कलाकार हों या लेखक और फ़िल्मकार हों, सभी को प्रोत्साहन देना चाहिए. पश्चिम अब हमारी संस्कृति की ओर देख रहा है औऱ हमें इसका फ़ायदा उठाना चाहिए.”

Image caption श्री राव ने लेखन, निर्माण और निर्देशन में अपनी जगह बनाई है

पूजा अब बॉलीवुड औऱ हॉलीवुड में कुछ नई फ़िल्मों में भी नज़र आएंगी.

अमरीकी फ़िल्मों और टीवी के लिए स्क्रीन प्ले लेखन के क्षेत्र में भी भारतीय मूल के लेखकों की संख्या बढ़ रही है. इनमें सुनिल नायर (एचबीओ), श्री राव (जनरल हॉस्पिटल), मिंडी कलिंग और आसिफ़ मांडवी प्रमुख हैं.

अमरीका में जन्मे श्री राव ने अमरीकी टीवी सीरियल -जनरल हॉस्पिटल- और व्हाट गोज़ ऑन के लिए मुख्य लेखक को तौर पर काम किया है.

श्री राव कहते हैं कि अब भारतीय कलाकारों और लेखकों के साथ-साथ मनोरंजन उद्योग से जुड़े एक्ज़ेक्यूटिव और प्रोड्यूसरों के लिए टीवी के क्षेत्र में बहुत काम है.

“अब अमरीकी टीवी जगत में यह बात घर कर चुकी है कि अब उन्हें टीवी सीरियलस में विविधता लानी है. इसलिए अब विभिन्न नस्लों के लोगों को काम दिया जा रहा है. अब अमरीकी स्टूडियोज़ और टीवी कंपनियां कहानियां भी नई और नए ढंग से सुनाना चाहते हैं, वह दस बीस साल पहले वाले अमरीका की घिसी पिटी कहानियां नहीं सुनाना चाहते. और इसलिए दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के लिए तो यह बहुत ही अच्छा समय है टीवी में काम करने का.”

बदलता माहौल

अमरीका में भारतीय मूल के लोगों के प्रति बदलते माहौल का वैश्विक कारण भी बताया जाता है. पिछले एक दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और विश्व अर्थवयवस्था में भारत का मुकाम काफ़ी बढ़ा है. इससे देश की साख बढ़ी है और उसके साथ-साथ अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को भी अलग नज़र से देखा जाने लगा है.

इसके अलावा मनोरंजन की दुनिया में स्लमडॉग मिलियनेयर की ऑस्कर में कामयाबी और मीरा नायर और दीपा मेहता जैसी निर्देशिकाओं की फ़िल्मों से भी भारत का प्रचार मनेरंजन जगत में हुआ.

अब हॉलीवुड की कई कंपनियां भारत की कंपनियों के साथ मिलकर भी फ़िल्में बनाने लगी हैं.

Image caption सबरीना ने मॉनसून वेडिंग की पटकथा लिखी थी, वो न्यूयॉर्क में सिनेमा पढ़ाती हैं

मीरा नायर की मशहूर फ़िल्म मानसून वेडिंग की कहानी लिखने वाली सबरीना धवन अब न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में फ़िल्म लेखन पढ़ाती हैं.

सबरीना धवन कहती हैं कि पिछले लगभग 10 वर्षों में अमरीका में काफी बदलाव आ गया है औ उनके छात्रों में भी अब बहुत से दक्षिण एशियाई मूल के हैं.

सबरीना धवन कहती हैं, “1996 में मैं जब न्यूयॉर्क में फ़िल्म की पढ़ाई करती थी तो पूरे कोर्स में मेरे अलावा सिर्फ़ एक और लड़की दक्षिण एशियाई मूल की थी लेकिन अब मैं पढ़ाती हूँ तो मेरी कक्षाओं में हर साल 6 या 7 दक्षिण एशियाई मूल के छात्र होते हैं. अमरीका में मनोरंजन की दुनिया में अब बहुत बदल गया है माहौल.”

सबरीना कहती हैं कि अब अमरीका में जन्मे बच्चों को उनके माँ-बाप डॉक्टर और इंजीनियर बनाने पर ज़ोर तो देते हैं लेकिन अन्य क्षेत्रों में खासकर मनोरंजन उद्योग में भी करियर बनाने का उतना विरोध नहीं करते जितना आज से कुछ साल पहले तक करते थे.

दक्षिण एशियाई या भारतीय मूल के कलाकार, लेखक और फ़िल्मकार भले ही अब फ़िल्मों और टीवी धारावाहिकों में पहले से ज़्यादा दिखने लगे हों लेकिन बहुत से कलाकार अब भी ये सपना देखते हैं कि वह समय कब आएगा कि जब वो भी हॉलीवुड की मुख्यधारा की फ़िल्मों में मुख्य भूमिका निभा सकेंगे.

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