'ऑस्कर में है पूरब-पश्चिम का फ़र्क'

भारत ने ऑस्कर पुरस्कारों के लिए विदेशी फ़िल्म की श्रेणी में मराठी फ़िल्म हरीशचंद्राची फ़ैक्ट्री को नामांकित किया है जो दादा साहेब फाल्के पर आधारित है. ऑस्कर के लिए अंतिम नामांकित फ़िल्मों की घोषणा दो फ़रवरी को की जाएगी.

ये निर्देशक परेश मोकाशी की पहली फ़िल्म है. फ़िल्म के विषय और निर्देशन के लिए परेश मोकाशी को काफ़ी प्रशंसा मिली है.

बीबीसी ने ऑस्कर नामांकन से पहले परेश मोकाशी से विशेष बातचीत की और ऑस्कर में एशियाई फ़िल्मों के प्रदर्शन जैसे मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी.

दादा साहेब तो भारतीय सिनेमा का पितामह कहा जाता है. लेकिन कभी किसी ने उन पर फ़िल्म नहीं बनाई ?

आज तक कभी किसी ने सोचा नहीं था कि दादा साहेब पर फ़िल्म बनाई जाए, इसीलिए मुझे लगा क्यों न मैं बनाऊँ.

लेकिन सबसे बड़ा कारण कुछ और था.मुझे एहसास हुआ कि मुझे भी फाल्के जी के बारे में उतनी जानकारी नहीं थी कि कैसे उन्होंने भारत की पहली फ़िल्म बनाई.. 1911 से 1913 तक. जिस साहस के साथ फाल्के जी ने पहली फ़िल्म बनाई- उस मनोरंजन साहस कथा के बारे में मुझे भी पढ़ने के बाद पता चला.

जब मैं फाल्के जी पर किताब पढ़ रहा था तभी मेरी आँखों के सामने पूरा चरित्र स्पष्ट हो गया था और मैने तय कर लिया था कि मुझे दादा साहेब पर फ़िल्म बनानी है.

फ़िल्म का नाम भी कुछ ख़ास है-हरिशचंद्राची फ़ैक्टरी. कोई ख़ास वजह ?

फाल्के जी ने जब फ़िल्म बनानी शुरु की, तब लोगों को पता भी नहीं था कि इसे आख़िर क्या कहना है. आज तो हम आसानी से फ़िल्म, मूवी, चित्रपट, टॉकिज़, पिक्चर आदि शब्दों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उस समय किसी को पता नहीं था कि फ़िल्म किसे कहते हैं.

फाल्के जी से जुड़े कलाकारों को बड़ी परेशानी होती थी कि लोगों को क्या बताएँ कि वो कहाँ काम करते हैं. फिर फाल्के जी ने कलाकारों को सलाह दी कि लोगों से बोलें फ़ैक्ट्री जा रहे हो क्योंकि उस समय फ़ैक्ट्री शब्द का इस्तेमाल बहुत होता था.

फाल्के जी अपने फ़िल्म सेट-अप को भी फ़ैक्ट्री ही कहते थे. इसीलिए मैने फ़िल्म में फ़ैक्ट्री नाम का प्रयोग किया और फ़िल्म राजा हरीशचंद्र की कहानी थी तो नाम पड़ गया हरीशचंद्राची फ़ैक्ट्री.

हरीशचंद्राची फ़ैक्ट्री नाम रखने का दूसरा कारण है फालके जी का व्यक्तित्व. समस्या प्रधानता, करुण रस, गंभीरता इसकी उनके जीवन में कोई गुंजाइश नहीं थी.

हमारी फ़िल्म भी एक मनोरंजक साहस कथा है जो फालके जी के गुणों को समेटे हुए है- मतलब हसते-खेलते समस्याओं को मात देना, काम करते रहना. ये भाव हमारी फ़िल्म के नाम में भी झलकना चाहिए. नाम से पता चलता है कि ये फ़िल्म हास्य रस से पूर्ण है. लोगों की भी उत्सुकता बढ़ी है कि क्या है इस फ़िल्म में.

आपकी फ़िल्म को भारत की ओर से ऑस्कर में नामांकित किया गया है. आप अमरीका के कई शहरों में फ़िल्म लेकर गए हैं. किस तरह की प्रतिक्रिया रही है ऑस्कर से पहले.

बड़ी प्रोत्हासक और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया रही है. मैं 20 दिन के लिए अमरीका गया था-न्यूयॉर्क,वाशिंगटन डीसी और लॉस एजेंलेस में हमने कुल छह शो किए. वहाँ के मीडिया ने भी काफ़ी सराहा.

आपको लगता है कि एशिया से ऑस्कर में जाने वाली फ़िल्में पहले से ही थोड़ी नुकसान में रहती हैं क्योंकि एशियाई फ़िल्मों और संस्कृति से ज्यूरी के लोग कम वाकिफ़ होते हैं.

मुझे लगता है कि नुकसान के नज़रिए से इसे नहीं देखना चाहिए. ये केवल सांस्कृतिक फ़र्क की बात है. इसीलिए बहुत ज़्यादा एशियाई फ़िल्मों ने ऑस्कर नहीं जीते हैं. ज़्यादातर यूरोपीय या अमरीकी फ़िल्मों ने ही ऑस्कर में अच्छा करके दिखाया है.

ज़ाहिर है अगर आप पश्चिमी देशों से हैं तो वहाँ की संस्कृति, वहाँ के मुद्दे, वहाँ की फ़िल्में आपको पहले प्रभावित करेगी और एशियाई फ़िल्मों को हज़म करने में थोड़ी सी तकलीफ़ तो होगी उन्हें.

इसलिए कभी-कभी हमारी फ़िल्मों को वहाँ दर्शक भी नहीं मिल पाते हैं. लेकिन इसमें कोई बड़ी बात नहीं है.

जैसे भारत में हमारे बड़े-बड़े सितारों की ही फ़िल्में चलती हैं, उनकी फ़िल्में उस तुलना में कम ही चलती हैं- चाहे विश्व का कितना भी बड़ा स्टार क्यों न हो. संस्कृतियों में अंतर के कारण कुछ न कुछ तो परिणामों पर असर पड़ेगा ही.

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