वीके मूर्ति को फाल्के सम्मान

गुरुदत्त की एक फ़िल्म का पोस्टर
Image caption दादा साहब फालके पुरस्कार पाने वाले वीके मूर्ति पहले सिनेमेटोग्राफ़र हैं.

'प्यासा', 'चौदहवीं का चाँद' और 'ज़िदगी' जैसी फ़िल्मों के सिनेमेटोग्राफ़र वीके मूर्ति को 2008 के दादा साबहब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना गया है.

दादा साहेब फाल्के पुरस्कारों की शुरुआत 1969 में हुई थी उसके बाद से यह पहला अवसर है जब इस सम्मान के लिए किसी सिनेमेटोग्राफ़र को चुना गया है.

भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों में योगदान के लिए दिया जाने वाला यह सर्वोच्च सम्मान है.

फ़िल्मों का सफ़र

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के मुताबिक़ यह पुरस्कार उन्हें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल प्रदान करेंगी. इसके तहत दस लाख रुपए, स्वर्ण कमल और शॉल भेंट की जाती है.

पुरस्कार के तारीख़ों की घोषणा अभी सरकार ने नहीं की है.

मूर्ति ने फि़ल्म 'बाज़ी', 'ज़ाल', 'चौदहवीं का चाँद', 'प्यासा', और 'ज़िदगी', जैसी फ़िल्मों के लिए सिनेमेटोग्राफ़ी की.

बॉलीवुड में क़रीब चार दशक तक काम करने के बाद मूर्ति आजकल बंगलूरु में ही रहते हैं.

अपने करिअर में उन्होंने गुरुदत्त की फ़िल्मों से लेकर श्याम बेनेगल के प्रसिद्ध टीवी धारावहिक ‘भारत एक खोज’ तक में काम किया.

मैसूर में 1923 में जन्मे मूर्ति ने बंगलूरु के एसजे पॉलिटेक्निक से सिनेमेटोग्राफ़ी में डिप्लोमा किया था.

इसके पहले गायक मन्ना डे को साल 2007 का दादा साहेब फ़ाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

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