निर्देशन के प्रति गंभीर हैं नंदिता

नंदिता दास
Image caption नंदिता दास अभिनय, निर्देशन के साथ-साथ सामाज सेवा में सक्रिय हैं.

अपने निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म ‘फ़िराक़’ को मिली सराहना और पुरस्कारों से उत्साहित अभिनेत्री नंदिता दास निर्देशन के प्रति गंभीर हैं. वे अभिनय और निर्देशन एक साथ जारी रखना चाहती हैं. हां, अभिनय के लिए फ़िल्मों के चयन में वे अब पहले के मुक़ाबले ज़्यादा सावधानी बरत रही हैं.

वे कुछ और फ़िल्मों का निर्देशन करना चाहती हैं. लेकिन किसी हड़बड़ी में नहीं हैं. ‘आई एम...’ सिरीज़ की फ़िल्म ‘आई एम आफ़िया’ के लिए क़रीब एक सप्ताह से कोलकाता के विभिन्न इलाक़ों में शूटिंग चल रही है. इसी दौरान नंदिता दास ने फ़िराक़ की कामयाबी और अपनी भावी योजनाओं के बारे में पीएम तिवारी से विस्तार से बातचीत की. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश.

अपने निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म की कामयाबी से कैसा महसूस हो रहा है?

चार वर्गों में फ़िल्मफेयर अवार्ड पाकर मैं खुद ही आश्चर्यचकित हूं. मुझे इतने पुरस्कारों की उम्मीद नहीं थी. मैं पहली बार इस समारोह में मौजूद थी. मुझे खुशी इस बात की है कि दर्शक इस फ़िल्म को उसी तरह की कहानी के तौर पर देख रहे हैं जैसा मैं उनको बताना चाहती थी.

इन पुरस्कारों का फ़िल्म की कामयाबी पर कितना असर होता है?

इससे फ़िल्म से जुड़े लोगों का उत्साह तो बढ़ता ही है. यह दरअसल, फ़िल्म को एक मान्यता दिलाता है. खासकर बिना किसी शोर-शराबे के रिलीज़ होने वाली फ़िल्मों (मसलन फ़िराक़) के लिए तो यह संजीवनी का काम करता है. पुरस्कार मिलने के बाद लोगों में फ़िल्म के प्रति नए सिरे से उत्सुकता पैदा होती है. रिलीज़ के समय फ़िराक़ की कोई खास प्रमोशन नहीं हुई थी इस वजह से उस समय ज़यादा लोग नहीं देख सके थे. इसकी डीवीडी रिलीज़ होने के बाद पहले के मुक़ाबले अब ज़्यादा दर्शक इसे देख रहे हैं.

कैमरे के पीछे रहने के बाद अब दोबारा उसके सामने आने पर कैसा लग रहा है?

मैं हमेशा चीज़ों को अलग तरीक़े से करने में यकीन रखती हूं. मैं खुद को पूर्णकालिक अभिनेत्री भी नहीं मानती. इसलिए कैमरे के पीछे से आगे आना कोई बड़ी बात नहीं है.

Image caption फ़िल्म फ़ायर से नंदिता दास सुखियों में आईं थीं.

फ़िराक़ के बाद किसी और फ़िल्म के निर्देशन की योजना है?

ज़रूर. निर्देशन का काम बेहद मुश्किल और चुनौतीपूर्ण होता है. लेकिन संतोष इस बात का है कि आप अपनी कहानी खुद अपने तरीके से कह रहे होते हैं. यह एहसास रोमांचक है. मेरे जेहन में कई कहानियाँ हैं. मैं अगली फ़िल्म के बारे में सोच रही हूं.

अगली फ़िल्म की पटकथा भी खुद लिखेंगी या किसी और की पटकथा पर फ़िल्म का निर्देशन करेंगी?

निर्देशक के तौर पर मुझे कई प्रस्ताव मिल रहे हैं. मैंने अब तक दूसरे की पटकथा पर फ़िल्म के निर्देशन की बात सोची नहीं है. लेकिन इस संभावना को खारिज भी नहीं किया जा सकता. अपनी पटकथा पर बन रही फ़िल्म के हर चरित्र और लोकेशन के बारे में पता होने की वजह से निर्देशन में काफी सहूलियत होती है.

अभिनय और निर्देशन में किसे तरजीह देंगी ?

यह तो फ़िल्म और कहानी पर निर्भर है. पहली नज़र में कहानी जंचते ही मैं अभिनय के लिए हां कर देती हूं. हां, अगर दिलचस्प प्रस्ताव नहीं मिले तो कोई भी फ़िल्म हाथ में नहीं लूंगी. मैं पहले भी काफ़ी सोच-समझ कर फ़िल्में करती थी. अब और भी सावधानी से फ़ैसला करती हूं. इसके साथ निर्देशन भी चलता रहेगा. काम वही करना चाहिए जिससे गहरा सुकून मिले. मैंने निर्देशन के दूसरे प्रोजक्ट के लिए कहानी पर विचार शुरू कर दिया है. लेकिन इससे हक़िकत का जामा पहनाने में अभी समय लगेगा.

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