'पाठशाला अहम और अर्थपूर्ण फ़िल्म'

मशहूर कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपनी एक कविता में लिखा था- द चाइल्ड इज़ द फ़ादर ऑफ़ द मैन. आशय ये कि बचपन में हम जो सीखते हैं, पढ़ते हैं वही चीज़ें बड़े होकर हमारे अस्तित्व का आधार बनती हैं.

बच्चों और स्कूलों की शिक्षा प्रणाली से जुड़े कई अहम सवालों को उठाती निर्देशक मिलिंद उईके की फ़िल्म पाठशाला रिलीज़ के लिए तैयार है. इसमें शाहिद कपूर और नाना पाटेकर अहम भूमिकाओं में है. पेश है मिलिंद उईके से बातचीत.

आपकी फ़िल्म पाठशाला रिलीज़ होने वाली है.किस तरह की फ़िल्म है?

फ़िल्म पाठशाला स्कूलों में भारत की शिक्षा प्रणाली से संबंधित है, कैसे बच्चों को तनाव और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. वहीं ये फ़िल्म इस मुद्दे को भी सामने लाती है कि इस सब का कारण स्कूलों को व्यवसायीकरण हैं. स्कूलों को फ़ाइव स्टार होटलों की तरह बनाया जा रहा है जिसका बोझ बच्चों और उनके माता-पिता को उठाना पड़ता है. ऐसे मसलों को फ़िल्मों में उठाना ज़रूरी भी है और हमारी ज़िम्मेदारी भी.

इस फ़िल्म में आपने शाहिद को एक अहम भूमिका में लिया है. क्या किसी फ़िल्म में स्टार का होना ज़रूरी है.

अगर हम ये फ़िल्म शाहिद के बिना बनाते तो हमारी फ़िल्म का स्कोप कम हो जाता है और शायद कम ही लोग इसे देखते. फ़िल्म एक अहम मु्द्दे को लेकर बनी है और ज़रूरी है कि फ़िल्म हर शहर, हर थिएटर में रिलीज़ हो. ये तभी हो सकता है कि जब फ़िल्म की ख़ूब पब्लिसिटी हो और किसी स्टार के होने से इसमें मदद मिलती है.

Image caption पाठशाला का निर्देशन मिलिंद उइके ने किया है

ये आशंका नहीं है आपको कि तारे ज़मीं पर से तुलना होगी?

मुझे ऐसा कोई डर नहीं है बल्कि हमें फ़ायदा होगा. जब तारे ज़मीं पर रिलीज़ हुई थी तो उन्हें पता नहीं था कि ऐसी फि़ल्म को लोग स्वीकार करेंगे. हमारे लिए तो तारे जमीं का सफल होना अच्छी बात है क्योंकि अब हमें पता है कि ऐसी फ़िल्मों को लोग देखते हैं. पाठशाला की कहानी तारे ज़मीं पर से एक साल पहले सोची गई थी. इस फ़िल्म ने हमारे लिए रास्ता तैयार कर दिया है.

तारे ज़मीं पर में भी टीचर की अहम भूमिका दिखाई गई है. पहले कहते थे कि टीचिंग एज़ ए नोबल प्रोफ़ेशन. आजकल कम ही बच्चे बड़े होकर शिक्षक बनना चाहते हैं.

ये सच है कि आजकल जब कोई काम नहीं रहता तो लोग टीचिंग में आ जाते हैं. जो लोग बच्चों को पढ़ाते हैं, उन्हें सबसे कम तनख्वाह मिलती है. शिक्षकों के योगदान को फ़िल्म में संजीदगी से उठाया गया है. शिक्षक ही समाज का असली रोल मॉडल होता है.

कुछ अपने बारे मे बताएँ.सिनेमा की पाठशाला के स्टूडेंट आप कैसे बने.

मैने मकेनिकल इंजीनियरंग की लेकिन मन में ये इच्छा थी कि कुछ क्रिएटिव करना है. सो मैंने फ़िल्म इंस्टीट्यूट पूणे में पढ़ाई की और कई साल तक संजय लीला भंसाली के साथ काम किया. मराठी सिनेमा का हिस्सा बना. अब हिंदी में पाठशाला बना रहा हूँ.

आपने अपनी फ़िल्म में बच्चों के साथ काम किया है. बच्चों के साथ फ़िल्म शूट करना कैसा अनुभव रहा.

हम भाग्यशाली थे कि फ़िल्म में काम करने वाले मुख्य बच्चे जैसे अविका गौर, स्विनि खरे (चीनी कम), अली वगैरह सब प्रोफ़ेशनल हैं. अगर आप बच्चों के साथ तालमेल बिठा लें, आपको पता हो कि बच्चों से क्या चाहिए और आप उन्हें समझ लें तो बच्चों से बेहतर एक्टिंग शायद कोई कर ही नहीं सकता, बड़े-बड़े एक्टर भी नहीं.

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